अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट ने किया साफ- 'जम्मू कश्मीर में नहीं हो सकता ब्रेक्जिट जैसा जनमत संग्रह'
मोदी सरकार ने 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया था। इस फैसले की वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में लगातार सुनवाई हो रही है। इस दौरान मंगलवार को कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की, जिसमें उसने साफ कहा कि जम्मू-कश्मीर में ब्रेक्जिट जैसे जनमत संग्रह का कोई सवाल नहीं उठता है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कपिल सिब्बल पेश हुए। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करना राजनीतिक कदम था। ये ठीक उसी तरह से है, जैसे ब्रेक्जिट हुआ था। वहां पर ब्रिटिश नागरिकों से जनमत संग्रह करवाया गया था।

सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि जब ब्रेक्जिट में जनमत संग्रह हुआ, तो सरकार ने उसको खुद करवाया, जबकि उसकी मांग करने वाला कोई संवैधानिक प्रावधान इंग्लैंड में नहीं था। कई बार जब आप किसी से रिश्ता खत्म करना चाहते हैं, तो लोगों की राय लेनी चाहिए। ये निर्णय केंद्र ने लिया, इसमें जम्मू-कश्मीर की जनता से कुछ भी नहीं पूछा गया।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल से साफ कहा कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को लेकर ब्रेक्जिट जैसे जनमत संग्रह का कोई सवाल नहीं है। कोर्ट बस इस बात को सुनिश्चित करना चाहता है कि केंद्र का कदम संवैधानिक रूप से सही है या नहीं।
कोर्ट ने आगे कहा कि भारत एक संवैधानिक देश है, यहां पर लोगों की राय जानने का काम स्थापित संस्थाओं के जरिए किया जाना चाहिए। हालांकि खंडपीठ ने ये माना कि ब्रेक्जिट एक राजनीतिक फैसला था।
क्या एमपी-बिहार भी बन सकते हैं केंद्र शासित प्रदेश?
सिब्बल ने कहा कि सरकार चाह कर भी एमपी-बिहार को केंद्र शासित प्रदेश नहीं बना सकती है। वो लोकतंत्र में जनता की आवाज हैं। ऐसे में जम्मू-कश्मीर में लोगों की आवाज कहां है? पांच साल हो गए, लेकिन संसद और विधानसभा में वहां की जनता का कोई प्रतिनिधि नहीं है।
क्या है ब्रेक्जिट?
दरअसल युनाइटेड किंगडम पहले यूरोपीय संघ का हिस्सा था, लेकिन उसके बीच में अनबन हो गई। ऐसे में उसने संघ को छोड़ने का फैसला लिया। यूके के बाहर निकलने की ये प्रक्रिया ब्रेक्जिट नाम से जानी जाने लगी। वहीं इस फैसले से पहले यूके ने जनमत संग्रह करवाया था, जिसमें जनता की राय वोटिंग के जरिए ली गई थी।












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