सुप्रीम कोर्ट में लगाई सांसदों, विधायकों की पेंशन रद करने की याचिका, मिला ये जवाब
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक याचिका की सुनवाई करते हुए सांसदों के वेतन और भत्ता तय करने के मुद्दे पर टिप्पणी की। शार्ष अदालत ने कहा कि सांसदों को अपना वेतय खुद ही तय करना नैतिकता का मुद्दा है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सांसदों की पेंशन और अन्य सुविधाओं पर खर्च होने वाली राशि का आंकड़ा मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में कहा गया था कि सांसद खुद ही अपना वेतन और भत्ते कैसे तय करते हैं? इसके लिए कोई स्थायी आयोग होना चाहिए।
साथ ही याचिका में कहा गया था कि पूर्व सांसदों और विधायकों को आजीवन पेंशन दे जाती हैं वहीं अगर नियमों की बात की जाए तो नियमों में ऐसा कुछ नहीं हैं। याचिका में पूर्व सांसदों और विधायकों की पेंशन रद्द करने की मांग की गई थी।
इसी याचिका की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने जस्टिस जे चेलमेश्वर और संजय किशन कौल की पीठ को बताया कि वित्त विधेयक 2018 में सांसदों के वेतन और भत्ते से संबंधित प्रावधान हैं।
कोर्ट में कहा गया कि मूल्यवृद्धि सूचकांक के आधार पर हर पांच साल में सांसदों और विधायकों के भत्तों की समीक्षा की भी व्यवस्था की जाती है। पांच सदस्यीय जजों की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए वेणुगोपाल ने कहा, याचिका में उठाए गए मुद्दों को वृहद पीठ देख रही है। सांसदों के वेतन और भत्ते तय करने के लिए स्वतंत्र प्रणाली गठित करने के अदालत के सवाल पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि वेतन तय करने को विस्तृत प्रक्रिया का पहले ही पालन किया जा रहा है।
याचिकार्ता ने अपनी याचिका में पूर्व सांसदों और विधायकों को पेंशन देने पर अन्य सुविधाएं देने से 'राजस्व पर बोझ' का मुद्दा उठाया था। इस पर कोर्ट ने पूछा, 'क्या आपके पास कोई आंकड़ा है कि इस पर कितनी राशि खर्च हुई है? वकील ने इस पर कहा कि वो आंकड़े पेश करेंगे।
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