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Supreme Court ने राष्ट्रपति को लेकर की टिप्पणी, 3 महीने में लें फैसला, जानें क्या है मामला?

Supreme Court: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि को तब फटकार लगाई थी जब उन्होंने विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लंबित रखने के निर्णय को अवैध और मनमाना करार दिया है। यह फैसला राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच अधिकारों को लेकर चल रहे विवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।​

अब इसी कड़ी में सुप्रिम कोर्ट ने राष्ट्रपति को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। इसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति किसी भी बिल को तीन महीने से ज्यादा नहीं रोक सकता है। अगर बिल को मंजूरी देने में देर हुई तो उसका कारण भी बताना होगा।

Supreme-Court

Supreme Court ने क्या कहा?

8 अप्रैल 2025 को, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल को विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित रखने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए एक निश्चित समय सीमा के भीतर कार्य करना चाहिए। यदि कोई विधेयक विधानसभा द्वारा पुनः पारित किया जाता है, तो राज्यपाल को उसे एक महीने के भीतर मंजूरी देनी चाहिए, जब तक कि विधेयक में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन न हुआ हो।​

इसी संदर्भ में बेंच ने अपने फैसले में इस बात को स्वीकार किया है कि जब किसी बिल पर विचार करना होता है तो राष्ट्रपति के लिए कोई समय तय नहीं की जा सकती है लेकिन इस पर निष्क्रिय रहने का कारण नहीं माना जा सकता है। सुनवाई के दौरान बेंच ने सरकारिया कमिशन का भी जिक्र किया था जिसमें कहा गया है कि किसी भी बिल पर एक समय सारणी होनी चाहिए जिससे समय रहते है बिलों को मंजूरी मिल सके।

Supreme Court: क्या कहता है अनुच्छेद 200 और 201

कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 की व्याख्या करते हुए कहा कि इन अनुच्छेदों में विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित रख सकते हैं। राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना चाहिए और विधेयकों पर समयबद्ध निर्णय लेना चाहिए।​

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह राज्य की स्वायत्तता और संघीय ढांचे की रक्षा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय अन्य राज्यों में भी राज्यपालों और सरकारों के बीच अधिकारों को लेकर चल रहे विवादों में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।​

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