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SC-ST Reservation: जस्टिस पंकज मित्तल का आरक्षण प्रणाली पर पुनर्विचार का आह्वान, जानें फैसले में क्या कहा?

Supreme Court SC-ST Reservation: देश की सर्वोच्च अदालत ने अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) कोटे में कोटा यानी रिजर्वेशन में सब कैटेगरी बनाने पर मुहर लगाते हुए ऐतिहासिल फैसला सुनाया है। अभी अनुसूचित जाति (एससी) को 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 7.5 फीसदी आरक्षण मिलता है।

लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एससी और एसटी की जातियों के इसी 22.5 प्रतिशत के आरक्षण में ही राज्य सरकारें एससी-एसटी के कमजोर वर्गों का अलग से कोटा तय कर सकेंगी।

Justice Pankaj mittal

सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ ने 6-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि इन जातियों में ज्यादा जरूरतमंदों को आरक्षण का लाभ देने के लिए राज्य सरकारें इसमें सब कैटेगरी बना सकती है।

जस्टिस पंकज मित्तल ने जानिए क्या कहा?

आरक्षण के लिए कोटे में कोटे पर अहम फैसला सुनाने वाली 7 जजो की संविधान पीठ में शामिल रहे जस्टिस पंकज मित्तल ने मौजूदा आरक्षण नीति के तमाम पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने सामाजिक-आर्थिक आधार पर दलितों, पिछड़ों, वंचितों की पहचान पर जोर देते हुए आरक्षण नीति के पुनर्वलोकन की आवश्यकता बताई।

अनुसूचित जातियों के सब कैटेगरी की अनुमति देने के बहुमत के दृष्टिकोण से सहमत होते हुए सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस पंकज मित्तल ने आरक्षण प्रणाली पर पुनर्विचार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि SC/ST/OBC श्रेणियों के बीच दलितों के उत्थान के लिए अन्य तरीकों की आवश्यकता है।

'टुकड़ों में बदलाव करने के बजाय...'

उन्होंने अपने सहमति वाले फैसले में कहा कि आरक्षण नीति चाहे वह सफल हो या विफल ने सभी स्तरों पर न्यायपालिका पर भारी मुकदमेबाजी का बोझ डाला है। अगर टुकड़ों में बदलाव करने के बजाय शुरू से ही मजबूत आरक्षण नीति का पालन किया जाता तो इससे बचा जा सकता था।

इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी आंदोलन आम तौर पर हिंसक हो जाते हैं, जिससे पूरे देश की शांति और सौहार्द भंग होती है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस मित्तल ने कहा, "आंदोलन, उपद्रव, हिंसा, मुकदमेबाजी और कमियों का जिक्र करते हुए मेरा यह सुझाव देने का इरादा नहीं है कि दलितों के उत्थान का कार्य समाप्त कर दिया जाए या सरकार को आरक्षण नीति छोड़ देनी चाहिए। लेकिन मुद्दा यह है कि सभी के लिए समानता और विकास लाने की प्रक्रिया को कैसे अंजाम दिया जाए? तथाकथित दलित वर्गों या दलितों की पहचान कैसे की जाए और उनके उत्थान के लिए उठाए जाने वाले कदमों का स्वरूप क्या हो।"

उन्होंने कहा आगे कहा कि सिर्फ कुछ जातियों के बच्चे, जो पहले से ही समृद्ध या शहरीकृत हैं, उच्च शिक्षा और आरक्षण का लाभ प्राप्त करने में सक्षम हैं।

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