देशद्रोह कानून पर, सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों पर फैसला करने के लिए केंद्र को दिया 24 घंटे का समय
नई दिल्ली, 10 मई: सुप्रीम कोर्ट में आज राजद्रोह कानून मामले की सुनवाई हुई। देशद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों पर फैसला करने के लिए केंद्र को 24 घंटे का समय दिया है।सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को यह सूचित करने के लिए 24 घंटे का समय दिया कि क्या वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तब तक निर्देश जारी करेगा जब तक कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124 ए की समीक्षा करने की सरकार की प्रस्तावित कवायद पूरी नहीं हो जाती।
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मंगलवार को दौरान केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इसे कार्यपालिका के स्तर पर पुनर्विचार की आवश्यकता है क्योंकि राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता शामिल है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से देशद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई टालने की मांग की। उन्होंने कहा कि, वह मामले पर दोबारा विचार कर रही है और सुनवाई को टाला जा सकता है।
सरकार के तर्क को काटते हुए याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि इस न्यायालय की कवायद को केवल इसलिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि विधायिका को छह महीने या एक साल के लिए पुनर्विचार करने में समय लगेगा। सिब्बल ने अदालत से देशद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता की जांच करने के लिए कहा है।
सरकार की दलील पर चीफ जस्टिस एन वी रमण ने कहा कि हमारी नोटिस महीनों पहले की है। पहले आपने कहा कि दोबारा विचार की जरूरत नहीं है। अब आपने हलफनामा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार करने में कितना समय लगेगा? केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब दिया कि कानून पर पुनर्विचार की प्रक्रिया चल रही है।
चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि, कि केंद्र के हलफनामे में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नागरिक स्वतंत्रता से संबंधित मुद्दों से अवगत हैं और उनका मानना है कि स्वतंत्रता के 75 वें वर्ष के समय, राष्ट्र पुराने औपनिवेशिक कानूनों सहित औपनिवेशिक बोझ को छोड़ना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को बताया कि देशद्रोह कानून के दुरुपयोग की चिंताएं हैं। एन वी रमना ने कहा कि यह भी देखना होगा कि बेवजह मुकदमे से लोगों को कैसे बचाया जाए। उस दिन एटॉर्नी जनरल ने बताया कि हनुमान चालीसा पढ़ने के लिए किसी पर राजद्रोह का केस दर्ज हो गया। इसपर सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि यह राज्यों की ज़िम्मेदारी है।
चीफ जस्टिस ने पूछा कि, आप कैसे ऐसे लोगों को सुरक्षा देंगे। जिन पर केस चल रहा है। जिन पर भविष्य में दर्ज होगा, उनके बारे में निर्देश लेकर बताइए। क्या आप ऐसे सभी केस स्थगित रखने का निर्देश देंगे? सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि सभी केस अपने-अपने राज्य की हाई कोर्ट के सामने हैं।हम हर केस के तथ्य नहीं जानते।
कोर्ट ने आगे कहा- हलफनामे में ही कहा गया है कि कानून का दुरुपयोग होता है, आप इसे कैसे संबोधित करेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को देशद्रोह कानून पर पुनर्विचार का काम 3-4 महीने में पूरा करने का सुझाव दिया है। सर्वोच्च अदालत ने केंद्र को निर्देश दिए कि वह राज्य सरकारों को यह निर्देश क्यों नहीं देती कि 124A के तहत मामले को तब तक स्थगित रखे जाएं जब तक कि केंद्र पुनर्विचार की प्रक्रिया पूरी नहीं कर लेता है। इसके लिए उनसे केंद्र को 24 घंटे का समय दिया है।












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