सुप्रीम कोर्ट ने "हलाल" पर रोक लगाने की याचिका खारिज की, बोली ये बात
सुप्रीम कोर्ट ने "हलाल" पर रोक लगाने की याचिका खारिज की, बोली ये बात
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुस्लिम समुदाय द्वारा जानवरों के वध में पालन किए जाने वाले हलाल के तरीके पर प्रतिबंध लगाने की याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठाया और यह भी कहा कि अदालत लोगों की भोजन करने की आदतों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। "कोर्ट यह निर्धारित नहीं कर सकता कि कौन शाकाहारी होगा कौन मांसाहारी हो सकता है। जो लोग हलाल मांस खाना चाहते हैं वे हलाल मांस खा सकते हैं। जो लोग झटके का मांस खाना चाहते हैं वे झटके का मांस खा सकते हैं।

हलाल और झटका बलि में क्या हैं अंतर
सोमवार को अदालत ने अखंड भारत मोर्चा संगठन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए ये बात कहीं। इस याचिका में पशु क्रूरता निवारण अधिनियम की धारा 28 के तहत चुनौती दी गई थी। उक्त धारा यह प्रदान करती है कि किसी भी समुदाय के धर्म के लिए आवश्यक तरीके से पशु की हत्या अधिनियम के तहत अपराध नहीं होगा। जानवरों की हत्या के विभिन्न रूप, जैसे हलाल, जिसमें जानवर की नस नस को धीरे-धीरे रेत कर काटा जाता है, जिससे जानवरों का खून निकल जाता है, जिससे जानवर की मौत हो जाती है और झटका जहां जानवर को सिर पर गंभीर चोट लगने के लिए तलवार की एक भी प्रहार से तुरंत मार दिया जाता है, उसको अधिक तकलीफ नहीं होती है । जबकि हलाल मुसलमानों द्वारा किया जाता है और वो वहीं मांस खाते हैं जबकि झटका मांस हिंदुओं द्वारा खाया जाता है।
"आपकी याचिका चरित्र में शरारती है"
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि हलाल पद्धति से जानवरों की हत्या जानवरों के लिए बेहद दर्दनाक है और धर्मनिरपेक्ष देश में धारा 28 के तहत इस तरह की छूट की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।"हलाल बेहद दर्दनाक है। हलाल के नाम पर जानवरों के साथ होने वाले अमानवीय वध की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यह भी बताया गया कि झटका जानवरों के लिए कष्ट का कारण नहीं है क्योंकि यह वध की ऐसी पद्धति में तुरंत मर जाता है, जबकि हलाल में पशु की दर्दनाक मौत हो जाती है।हालांकि, पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा, "आपकी याचिका चरित्र में शरारती है।"












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