पतंजलि को सुप्रीम कोर्ट से राहत, भ्रामक विज्ञापन केस हुआ बंद, IMA ने डाली थी याचिका
Patanjali misleading ads Case: योग गुरु बाबा रामदेव और उनकी कंपनी पतंजलि आयुर्वेद को भ्रामक विज्ञापन मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) द्वारा पतंजलि आयुर्वेद और इसके संस्थापकों बाबा रामदेव व आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ दायर भ्रामक विज्ञापन मामले को समाप्त कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इस मामले को समाप्त करने का आदेश दिया। इस मामले में पहले सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया था। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने पतंजलि आयुर्वेद और उसके संस्थापकों के खिलाफ याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि कंपनी ने भ्रामक विज्ञापन जारी किए, जिनमें आधुनिक चिकित्सा पद्धति को गलत तरीके से पेश किया गया था।

क्या था पतंजलि के खिलाफ भ्रामक विज्ञापन का मामला?
साल 2022 में IMA ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। आरोप था कि पतंजलि आयुर्वेद ने ऐसे विज्ञापन जारी किए, जिनमें आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) को बदनाम किया गया और यह दावा किया गया कि उनके उत्पाद उच्च रक्तचाप, अस्थमा, डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों का स्थायी इलाज कर सकते हैं। IMA का कहना था कि ये दावे न सिर्फ झूठे और बिना वैज्ञानिक प्रमाण के हैं, बल्कि लोगों को भ्रमित भी करते हैं।
कोर्ट की कार्यवाही
- फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ अवमानना (Contempt) की कार्यवाही शुरू की थी।
- अगस्त 2024 में, दोनों ने बिना शर्त माफी मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया और अवमानना की कार्यवाही बंद कर दी।
- अब 11 अगस्त 2025 को, जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि इस केस में अब सुनवाई की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अदालत पहले ही कई आदेश देकर याचिका के उद्देश्य पूरे कर चुकी है।
Rule 170 और AYUSH मंत्रालय का फैसला
🔹 IMA ने केंद्र सरकार द्वारा ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 के Rule 170 को हटाने के खिलाफ भी आपत्ति जताई थी। यह नियम AYUSH उत्पादों के विज्ञापन के लिए राज्य सरकार से पूर्व-स्वीकृति अनिवार्य करता था, ताकि भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लग सके।
🔹 आयुष मंत्रालय (जो आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी प्रणालियों की देखरेख करता है) ने 1 जुलाई 2024 को एक नोटिफिकेशन जारी करके ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 के Rule 170 को हटा दिया। इस नियम के तहत कंपनियों को किसी भी आयुर्वेदिक, यूनानी या सिद्ध दवा का विज्ञापन करने से पहले राज्य के लाइसेंसिंग अधिकारियों से पूर्व-स्वीकृति लेनी पड़ती थी। यह नियम भ्रामक या गलत विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए बनाया गया था। लेकिन अब, इस नियम के हटने के बाद कंपनियों को ऐसे विज्ञापनों से पहले कोई अनुमति नहीं लेनी होगी।
🔹 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अब राहत की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मंत्रालय और कोर्ट के पहले के आदेशों से IMA की अधिकांश मांगें पहले ही पूरी हो चुकी हैं। जस्टिस बीवी नागरथना ने भी कहा कि IMA द्वारा उठाए गए ज्यादातर मुद्दों का समाधान पहले ही हो चुका है। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत के पास वह शक्ति नहीं है कि वह केंद्र द्वारा हटाए गए नियम को फिर से बहाल कर दे। इसलिए मामले को और खींचने की जरूरत नहीं है।
2024 में जस्टिस हिम कोहली और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने भी बार-बार यह जोर दिया था कि विज्ञापन संबंधी दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन होना चाहिए और जो उत्पाद झूठे दावे करते हैं, उन्हें तुरंत बाजार से हटाना चाहिए।
🔹 अदालत ने IMA और अन्य पक्षों को यह छूट दी है कि अगर भविष्य में कोई नई समस्या आती है, तो वे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
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