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Subrata Roy Sahara: एक खत जिसने सहारा को आसमान से जमीन पर ला पटका, 'सहाराश्री' को पहुंचा दिया जेल

Subrata Roy Sahara News: बिहार के छोटे से कस्बे अररिया में बहुत ही सामान्य परिवार में जन्मे सुब्रत रॉय सहारा ने कुछ ही दशकों में देश-विदेश में जो बिजनेस एम्पायर खड़ा किया, उसकी कहानी अद्भुत है।

लेकिन, सहारा समूह के पतन का सिलसिला भी उससे कम चौंकाने वाला नहीं है। 2010 में जब उनकी लाखों करोड़ रुपए की बादशाहत को पहली चुनौती दी गई थी, तो शायद उन्हें भी एहसास नहीं रहा होगा कि सहारा समूह की कथा का अंत शुरू हो चुका है।

subrata roy sahara

एक खत से शुरू हुआ सहारा समूह का पतन
2010 में इंदौर के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट रोशन लाल ने नेशनल हाउसिंग बैंक (NHB)को एक खत लिखा। इसमें सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन (SIREC) और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेंट कॉर्पोरेशन (SHIC) की ओर से जारी हाउसिंग बॉन्ड की जांच करने की गुजारिश की गई थी। यह चिट्ठी कैपिटल मार्केट रेगुलेटर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) को फॉर्वर्ड कर दिया गया, क्योंकि नेशनल हाउसिंग बैंक के पास इसकी जांच का अधिकार नहीं था।

सेबी की जांच में सामने आया बड़ा घोटाला
सेबी ने रोशन लाल की चिट्ठी के आधार पर इस मामले की जांच का आदेश दिया। लेकिन, इस जांच में बाधाएं पैदा हुईं। क्योंकि, सहारा समूह की दोनों कंपनियां स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड नहीं थीं। संयोग की बात है कि सहारा समूह की ही एक और रियल एस्टेट कंपनी सहारा प्राइम सिटी ने आईपीओ के लिए ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DHRP)दायर किया।

सेबी ने दोनों कंपनियों से जारी किए गए बॉन्ड से जुड़ी जानकारियों की समीक्षा की, जिसका जिक्र डीआरएचपी में ही किया गया था। यहीं पर छोटे से सबूत मिले, जो आगे चलकर बहुत बड़ा घोटाला साबित हुआ

सेबी ने सहारा की दोनों कंपनियों के पैसे जुटाने पर रोक लगा दी
जांच में सेबी ने पाया कि सहारा समूह की दोनों कंपनियों एसएचआईसी और एसआईआरईसी ने वैकल्पिक रूप से पूर्ण परिवर्तनीय बॉन्ड (OFCDs)के जरिए पैसे जुटाकर कंपनी ऐक्ट का उल्लंघन किया। इसके साथ ही सेबी ने आदेश जारी किया कि आगे से ये कंपनियां इस तरह से और पैसे नहीं जमा करेंगी।

सहारा को सुप्रीम कोर्ट से लगा आखिरी झटका
इसके बाद यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) होते हुए आखिरकार फिर से सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। इस जांच प्रक्रिया और कानूनी लड़ाई में करीब चार साल गुजर गए। कभी सेबी को झटका लगा तो कभी सहारा समूह को मुंह की खानी पड़ी। लेकिन, आखिरकार सुप्रीम कोर्ट का फैसला सहारा समूह के लिए एक तरह से ताबूत का आखिरी कील साबित हुआ।

इस लंबी कानूनी लड़ाई में एक समय ऐसा भी आया जब सहारा समूह ने दावा किया कि निवेश और निवेशकों से जुड़े दस्तावेजों से भरे उसके सौ से भी ज्यादा ट्रक सेबी मुख्यालय के बाहर खड़े हैं, लेकिन उसे अंदर जाने की इजाजत नहीं मिल रही है।

सहारा को 24,000 करोड़ से ज्यादा रकम लौटाने का आदेश हुआ
लेकिन, 2012 के अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह को आदेश दिया कि वह 15% ब्याज के साथ 24,000 करोड़ से ज्यादा रकम 3 करोड़ से अधिक निवेशकों को तीन महीने के भीतर वापस करे।

उसी साल दिसंबर में कंपनी को तीन किश्तों में रकम देने की मोहलत दी गई, जिसमें 5,120 करोड़ रुपए तत्काल देने थे। बाद में सेबी ने अदालत को बताया कि अंतिम दोनों किश्तों का भुगतान नहीं हुआ है। फिर सुप्रीम कोर्ट ने अदालत के आदेशों की अवहेलना करने पर सेबी को सहारा समूह की दोनों कंपनियों के अकाउंट फ्रीज करने और संपत्तियां कुर्क करने की अनुमति दे दी।

इसके बाद सेबी ने सहारा के पुणे के पास मौजूद एंबे वैली की जमीन और मुंबई, दिल्ली और गुड़गांव की भूमि भी कुर्क करनी शुरू कर दी। सेबी ने सुब्रत रॉय और और समूह के तीन डारेक्टरों के सभी बैंक और डीमैट अकाउंट फ्रीज करने के भी आदेश दे दिए। आखिरकार 2014 में लखनऊ पुलिस ने सुब्रत रॉय को भी गिरफ्तार कर लिया। जो करीब दो साल तिहाड़ में गुजारने के बाद ही बाहर निकल सके थे।

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