गुलमर्ग के पहाड़ों में सैनिकों के लिए 'पूर्व चेतावनी' देने वाले दोस्त होते हैं आवारा कुत्ते, जानिए कैसे ?
कुत्तों का इंसान का अच्छा साथी माना जाता रहा है। लेकिन, कश्मीर में गुलमर्ग के पहाड़ों में आवारा कुत्ते सैनिकों के लिए जिस तरह से काम आते हैं, उसपर यकीन करना मुश्किल है। वह उनके आंख-कान और नाक होते हैं।

आवारा कुत्ते आजकल शहरों के लिए बहुत बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं। पिछले कुछ समय में ऐसी अप्रिय घटनाएं हुईं हैं, जिसके चलते काफी दहशत की स्थिति बनी है। लेकिन, जब भारतीय सेना के जवान कश्मीर के गुलमर्ग जैसे इलाकों में मौसम की विपरीत परिस्थियों में भारत माता की रक्षा के लिए तैनात किए जाते हैं तो ऐसे आवारा कुत्ते उनके सबसे अच्छे साथी बनकर हर मुश्किल में उनका साथ निभाते हैं। आवारा कुत्तों की यह दिल छूने वाली सच्चाई खुद उन जवानों और सेना के अधिकारियों ने बताई है, जो आवारा कुत्तों को पहाड़ों पर बर्फ में ड्यूटी देने वाले सैनिकों के लिए 'पूर्व चेतावनी' देने वाले दोस्त बताते हैं।

सैनिकों के लिए 'अर्ली वार्निंग सिस्टम' का काम करते हैं
जम्मू-कश्मीर की ऊंचाई वाले सीमावर्ती इलाको जैसे कि गुलमर्ग के पहाड़ों में कुत्ते भले ही स्थानीय लोगों के लिए आवारा जानवर हों, लेकिन सैनिकों के लिए वह ऐसे सच्चे दोस्त होते हैं, जो हर चुनौती के समय उनके साथ डटे रहते हैं। यह आवारा कुत्ते सेना के उन जवानों के लिए 'अर्ली वार्निंग सिस्टम' की तरह काम करते हैं, जो मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में नियंत्रण रेखा पर गश्त करते हैं। सेना के ये जवान अपने कर्तव्य पथ पर चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं और जिन्हें लोग आवारा कुत्ते समझते हैं, वह भी उनके आसपास ही मुस्तैदी के साथ लगे रहते हैं। एक सैनिक ने कहा, बर्फ हो या धूप, वे हमेशा नियंत्रण रेखा (LoC) पर गश्त कर रहे जवानों के साथ होते हैं।

सीमा पर सैनिकों के सबसे अच्छे दोस्त होते हैं आवारा कुत्ते
ठंड के दिनों गुलमर्ग में तापमान माइनस 10 डिग्री तक गिर सकता है और जब बहुत ही सर्द हवाएं चलती हैं और कई फीट बर्फ जम जाती है तो जवानों के लिए पेट्रोलिंग करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। लेकिन, जवानों का कहना है कि कुत्ते फिर भी उनका साथ नहीं छोड़ते और भौंक कर आगे के खतरों के प्रति उन्हें पहले ही आगाह कर देते हैं। पाकिस्तान के साथ सटी नियंत्रण रेखा के फॉरवर्ड क्षेत्र में स्की-पेट्रोल के लिए जा रहे एक सैनिक ने उनसे आगे-आगे चल रहे कुत्तों के एक छोटे झुंड के बारे में कहा, 'अगर आगे कुछ भी अप्रिय होने की स्थिति है तो यह हमारे अर्ली वार्निंग सिस्टम का काम करते हैं। ये हमारी बहुत ही सहायता करते हैं।'

परिवार के हिस्से की तरह सैनिक उनका ख्याल रखते हैं
उस सैनिक ने बताया कि चाहे जैसा भी मौसम हो, ये श्वान जवानों के लिए रास्ता बनाते हैं और कई बार उनके कैंप तक पीछे-पीछे आ जाते हैं। वो बोले, 'ये कुत्ते आज हमारे साथ हैं, कल यह किसी अगली यूनिट (जिसकी उस इलाके में तैनाती होगी) के साथ होंगे।' सेना के एक अधिकारी ने कहा कि इन श्वानों की जवान ऐसे तरह से ख्याल रखते हैं, जैसे वह उनके परिवार के हिस्से हों।

अपना पानी और बिस्किट देते हैं जवान
सैन्य अधिकारी ने कहा कि ऊंचाई वाले क्षेत्र जो बर्फ से ढंके होते हैं, वहां सिर्फ पैदल ही पहुंचा जा सकता है, सैनिक अपने सीमित बिस्किट और पानी श्वानों के साथ साझा करते हैं। इससे उनके बीच के मजबूत संबंधों और उसकी प्रकृति का अंदाजा मिलता है। शायद स्थानीय होने की वजह से ये कुत्त वहां के वातावरण में बहुत ही आसानी से खप जाते हैं, जिससे वह अनजाने में ही देश की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं।
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'सर्दियों के सबसे अच्छे साथी होते हैं'
सेना के 19 इन्फेंट्री डिविजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल अजय चांदपुरिया ने कहा कि सैनिकों और श्वानों के बीच दोस्ती में कुछ भी असामान्य नहीं है। उन्होंने कहा, 'कुत्ते को इंसान का सबसे अच्छा दोस्त माना जाता है और यह खासकर सर्दियों के लिए सच है। जब हालात बिगड़ जाते हैं और बहुत ज्यादा बर्फ होती है, वह सर्दियों के सबसे अच्छे साथी होते हैं।'(इनपुट पीटीआई)












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