सामने आई वायरल फोटो वाले इस मजदूर की कहानी, सुनकर कांप जाएगा कलेजा

दिल्ली में बेटे की मौत, बिहार में अकेला परिवार, सामने आई वायरल फोटो वाले इस मजदूर की कहानी...

नई दिल्ली। देश में कोरोना वायरस का कहर सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूरों पर टूट रहा है। पिछले करीब डेढ़ महीने से भी ज्यादा समय से लागू लॉकडाउन के चलते प्रवासी मजदूरों के रोजगार पर भारी संकट खड़ा हो गया है और बड़ी संख्या में लोग अपने-अपने घरों को लौट रहे हैं। ट्रेन और बस की बड़ी-बड़ी सरकारी घोषणाओं के बावजूद प्रवासी मजदूर हजारों किलोमीटर लंबा सफर पैदल ही तय करने के लिए मजबूर हैं। हाल ही में इंटरनेट पर देश की राजधानी दिल्ली की एक तस्वीर काफी वायरल हुई, जिसमें एक प्रवासी मजदूर सड़क किनारे बैठकर रो रहा था। इस तस्वीर को जिसने भी देखा, उसका कलेजा कांप गया। अब इस प्रवासी मजदूर की रुला देने वाली कहानी भी सामने आई है।

दिल्ली में मिली नवजात बेटे की मौत की खबर

दिल्ली में मिली नवजात बेटे की मौत की खबर

तस्वीर में नजर आ रहे शख्स का नाम रामपुकार पंडित है, जिन्हें रविवार को बिहार के बेगुसराय में एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में भर्ती होने के बाद रामपुकार अपनी 9 साल की बेटी और पत्नी से मिल पाए। कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए रामपुकार अपनी बेटी को सीने से भी नहीं लगा पाए और कुछ दूरी से ही उन्होंने उससे बात की। 38 साल के रामपुकार पेश से मजदूर हैं और अपने परिवार से दूर दिल्ली में दिहाड़ी मजदूरी कर अपना और परिवार का गुजर-बसर कर रहे थे। दिल्ली में रामपुकार को पता चला कि उनके नवजात बेटे की मौत हो गई है।

एक महिला ने दिए 5500 रुपए और बुक कराई ट्रेन की टिकट

एक महिला ने दिए 5500 रुपए और बुक कराई ट्रेन की टिकट

बेटे की मौत की खबर सुनने के बाद लॉकडाउन के बीच ही रामपुकार को दिल्ली से बिहार में बेगुसराय पहुंचना था, लेकिन इसके लिए उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। जब रामपुकार को अपने घर जाने के लिए कोई साधन नहीं मिला तो वो निजामुद्दीन पुल पर सड़क किनारे बैठकर किसी से फोन पर बात करते हुए रो रहे थे। उसी दौरान पीटीआई के फोटोग्राफर अतुल यादव ने उन्हें देखा और उनकी मदद करने की कोशिश की। रामपुकार की फोटो वायरल हुई और आखिरकार एक महिला ने उनकी मदद की। महिला ने रामपुकार को खाना, 5500 रुपए और उनके लिए दिल्ली से बेगुसराय तक की ट्रेन की टिकट बुक की।

तीन दिन तक निजामुद्दीन पुल पर फंसे रहे रामपुकार

तीन दिन तक निजामुद्दीन पुल पर फंसे रहे रामपुकार

मदद मिलने से पहले रामपुकार तीन दिन तक निजामुद्दीन पुल पर ही फंसे रहे। एक दिन एक गाड़ी आई और उन्हें अस्पताल लेकर गई, जहां उनका कोरोना वायरस का टेस्ट किया गया। हालांकि उनकी रिपोर्ट नेगेटिव आई। इसके बाद श्रमिक स्पेशल ट्रेन के जरिए रामपुकार दिल्ली से बेगुसराय पहुंचे। बेगुसराय पहुंचने के बाद सरकारी अधिकारी रामपुकार को क्वारंटाइन सेंटर ले गए।

'आंखें खोलता हूं तो मेरा सिर घूमता है'

'आंखें खोलता हूं तो मेरा सिर घूमता है'

अस्पताल में रामपुकार ने रोते हुए बताया, 'मैं जब अपनी आंखें खोलता हूं तो मेरा सिर घूमता है और काफी कमजोरी महसूस होती है। शनिवार दोपहर को कुछ अधिकारी क्वारंटाइन सेंटर से मुझे कार में अस्पताल लेकर आए और मेरा कोरोना वायरस का टेस्ट कराया। उसकी रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है। अस्पताल में ही मेरी बेटी पूनम और पत्नी मिलने आए, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि वो मेरे पास नहीं आ सकते और मैंने दूर से उन लोगों को देखा। मेरी पत्नी और बेटी रविवार को 4 बजे के आसपास आए। दोनों ने मास्क लगाया हुआ था और मेरे बेड से काफी दूर खड़े थे।'

'बेटी मेरे लिए सत्तू, चूड़ा और खीरा लाई थी, लेकिन खा नहीं सकता'

'बेटी मेरे लिए सत्तू, चूड़ा और खीरा लाई थी, लेकिन खा नहीं सकता'

रामपुकार ने आगे बताया, 'हम तीनों रो रहे थे और एक दूसरे को गले लगाना चाहते थे। मैं अपनी बेटी को अपने पास बुलाना चाहता था, लेकिन मुझे केवल कुछ मीटर की दूरी और 10 मिनट की मुलाकात ही मिल पाई। मेरी पत्नी और बेटी, मेरे लिए सत्तू, चूड़ा और खीरा लाए थे, लेकिन मैं इतना कमजोर हो गया हूं कि खुद उठकर खा भी नहीं सकता। मेरा एक दोस्त भी आज मेरे गांव बरियारपुर से मुझसे मिलने आया। मेरी ऐसी हालत देखकर मेरे बच्चे भी खाना नहीं खा रहे हैं। मैं अपने परिवार में अकेला कमाने वाला हूं और मैं ही इस हालत में हूं। मैं सरकार से अपील करता हूं कि इस कठिन समय में मेरी और मेरे जैसे बाकी लोगों की मदद करे। वरना हम गरीब लोग तो मर ही जाएंगे।'

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