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रोजर बिन्नी : जब बेटे के सेलेक्शन की बात चलती तो मीटिंग छोड़ देते थे

अपने समय के बेहतरीन ऑलराउंडरों में शुमार रहे रोजर बिन्नी का भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का 36वां अध्यक्ष बनना लगभग तय हो गया है. बिन्नी 18 अक्टूबर को होने वाली बीसीसीआई की वार्षिक साधारण सभा बैठक के बाद सौरव गांगुली से यह ज़िम्मेदारी संभाल सकते हैं.

story of Roger Binny

रोजर बिन्नी ने बीसीसीआई के अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन भर दिया है. नामांकन भरने की आख़िरी तारीख 12 अक्टूबर थी . आधिकारिक तौर पर नामांकनों की जांच 13 अक्टूबर को होनी थी.

14 अक्टूबर तक नामांकन वापस लिए जाने थे और 15 अक्टूबर को चुनाव लड़ने वालों की सूची जारी की जानी थी. जरूरी होने पर 18 अक्टूबर को चुनाव होगा. लेकिन माना जा रहा है कि वे निर्विरोध इस पद पर चुने जाएंगे.

कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव संतोष मेनन का नाम वार्षिक साधारण सभा में भाग लेने वाले प्रतिनिधि के तौर पर नाम नहीं आने और रोजर बिन्नी को यह जिम्मेदारी दिए जाने से ही उनका अध्यक्ष बनना तय माना जाने लगा था.

बीसीसीआई के चुनावों में किन लोगों को पदाधिकारी चुना जाए, इसको लेकर पिछले पूरे हफ्ते राजधानी दिल्ली में चर्चाओं का दौर चला था, जिसमें रोजर बिन्नी को अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनी थी. यह कहा जा रहा है कि बृजेश पटेल के समर्थन की वजह से यह संभव हो सका है.

इस बात की भी चर्चा है कि सौरव गांगुली दूसरे कार्यकाल के लिए अध्यक्ष बनना चाहते थे. लेकिन यह कहा जा रहा है कि पूर्व में किसी भी अध्यक्ष के दो कार्यकाल नहीं रहने की परंपरा नहीं होने पर उन्हें अध्यक्ष बनाने पर सहमति नहीं बन सकी.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में बीसीसीआई के पदाधिकारियों के लिए लगातार दो कार्यकाल की व्यवस्था की अनुमति दे दी थी.

इस अनुमति का फ़ायदा अब केवल बीसीसीआई सचिव जय शाह को मिल पाएगा.

बिन्नी हैं 1983 के विश्व कप के हीरो

वैसे तृणमूल कांग्रेस ने गांगुली के मामले को राजनीतिक रंग भी दे दिया है, टीएमसी ने आरोप लगाया है कि बीजेपी ज्वाइन नहीं करने के चलते सौरव गांगुली दोबारा बीसीसीआई का अध्यक्ष नहीं बन सके हैं. लेकिन बीजेपी ज्वाइन किए बिना वे एक कार्यकाल पूरा भी कर चुके हैं.

भारत के इस ऑलराउंडर को 1983 के विश्व कप में भारत की जीत के हीरो के तौर पर पहचान होती है. कपिलदेव की अगुआई में भारत द्वारा इस जीते विश्व कप में बिन्नी ने आठ मैचों में सबसे ज्यादा 18 विकेट निकाले थे.

ये विश्व कप में चेम्सफोर्ड में 20 जून को खेला गया ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच में उनके प्रदर्शन को कैसे भुलाया जा सकता है. भारत को आगे जाने के लिए यह मैच जीतना ज़रूरी था. भारत ने पहले बल्लेबाजी करके 247 रन बनाए. इसमें बिन्नी ने 21 रनों का योगदान किया.

ऑस्ट्रेलिया की जवाबी पारी को रोजर बिन्नी और मदनलाल की जोड़ी ने 129 रन पर ढहाकर भारत को 118 रन से जीत दिलाई थी. बिन्नी ने इस मैच में 29 रन देकर चार विकेट और मदनलाल ने 20 रन देकर चार विकेट निकाले थे.

विश्व कप ही नहीं रोजर बिन्नी को 1985 में ऑस्ट्रेलिया में हुई वर्ल्ड सिरीज चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन के लिए भी जाना जाता है. इस सिरीज़ में उन्होंने 17 विकेट निकालकर भारत को चैंपियन बनाने में अहम भूमिका निभाई थी.

बिन्नी क्षमता से कम मैच खेले

रोजर बिन्नी बेहतरीन ऑलराउंडर रहे हैं. असल में वह उस दौर में खेले हैं, जब पेस गेंदबाजों का इस्तेमाल सिर्फ़ गेंद की चमक उतारने के लिए किया जाता था और फिर गेंद स्पिन तिकड़ी को थमा दी जाती थी.

यह सच है कि बिन्नी जिस क्षमता के खिलाड़ी रहे, उन्हें कहीं ज़्यादा टेस्ट मैचों और वनडे मैचों में खेलना चाहिए था. लेकिन वह सिर्फ 27 टेस्ट 72 वनडे मैच ही खेले.

यह सही है कि बिन्नी की गेंदबाज़ी में बहुत गति नहीं थी. लेकिन वह स्विंग का अच्छा इस्तेमाल करके बल्लेबाजों को परेशान करने में सफल रहते थे. वह जिस तरह की गेंदबाज़ी और बल्लेबाज़ी करते थे, उसे देखते हुए लगता है कि उन्हें और मौके मिलने चाहिए थे.

उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय कॅरियर में कई बार उच्चक्रम के फ्लॉप हो जाने पर सैयद किरमानी के साथ बेहतरीन बल्लेबाज़ी से भारत को संकट से निकालने में अहम भूमिका निभाई.

भारत के लिए टेस्ट खेलने वाले पहले एंग्लो इंडियन

रोजर बिन्नी ने अपने घरेलू मैदान बेंगलुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम पर 1979 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ टेस्ट क्रिकेट में पर्दापण किया. इस तरह वह भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले पहले एंग्लो इंडियन बन गए. बिन्नी स्कॉटिश मूल के भारतीय हैं.

बिन्नी को नैसर्गिक प्रतिभा वाला एथलीट माना जाता था. वह स्कूली दिनों में क्रिकेट के अलावा फुटबॉल और हॉकी भी खेला करते थे. यही नहीं वह एथलेटिक्स में जेवेलिन थ्रो में भी इतने उम्दा थे कि इसमें भी कॅरियर बना सकते थे.

उन्होंने जेवेलिन में बालक वर्ग में राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाया था. लेकिन वह गेंदबाजी भ़ी उम्दा करते थे. इसलिए जब कॅरियर बनाने की बात आई तो उन्होंने क्रिकेट को चुना.

चयनकर्ता के रूप में मिसाल पेश की

रोजर बिन्नी को 2012 में बीसीसीआई का चयनकर्ता चुना गया. यह वह दौर था, जब उनके बेटे स्टुअर्ट बिन्नी भारत के लिए खेलने के दावेदार हो गए थे. इस स्थिति में रोजर पर पक्षपात के कुछ आरोप लगे. लेकिन रोजर बिन्नी ने अपने निष्पक्ष होने की ऐसी मिसाल पेश की, जिसके जितनी भी सराहना की जाए, कम है.

चयन के समय जब भी स्टुअर्ट के चयन की बात आती थी, तो रोजर चर्चा शुरू होने से पहले ही मीटिंग रूम को छोड़ देते थे. रोजर बिन्नी अपने खेलने के दिनों में सबसे ज़्यादा किसी खिलाड़ी के करीब थे, तो वह थे, गुंडप्पा विश्वनाथ. दोनों की दोस्ती के तमाम किस्से मशहूर हैं.

रोजर बिन्नी ने बीसीसीआई में चयनकर्ता के अलावा कोच की भूमिका भी निभाई. वह 2000 में अंडर-19 विश्व कप में भारतीय टीम के कोच थे. भारत पहली बार इस विश्व कप में चैंपियन बना था. इस विश्व कप ने भारत को मोहम्मद कैफ़ और युवराज सिंह जैसे क्रिकेटर दिए, जिन्होंने आगे चलकर भारत का नाम रोशन किया.

सही मायनों में रोजर बिन्नी ने संन्यास लेने के बाद भी क्रिकेट से अपने जुड़ाव को जारी रखा. एशियाई क्रिकेट परिषद विभिन्न देशों में क्रिकेट को बढ़ावा देने का काम भी करती है. रोजर बिन्नी ने उसके डेवलपमेंट अधिकारी के तौर पर विभिन्न देशों में जाकर युवाओं को क्रिकेट सिखाई है.

रोजर बिन्नी उम्दा क्रिकेटर रहने के साथ ही बेहतरीन इंसान भी हैं. साथ ही वह साफ-सुथरी छवि के भी हैं. लोढा समिति के उनके बीसीसीआई चयन समिति के सदस्य रहने के दौरान उनके ऊपर हितों के टकराव का आरोप लगाया तो उन्होंने तुरंत चयन समिति से इस्तीफ़ा दे दिया था.

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