#StatueOfUnity: 52 कमरे, 3 स्टार होटल, ऑडिटोरियम का भी निर्माण
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट स्टेच्यू ऑफ यूनिटी का उद्घाटन करेंगे। इस प्रस्ताव को वर्ष 2010 में बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कैबिनेट में पेश किया था। इस मेगा प्रोजेक्ट के साकार होने को लेकर भारतीय जनता पार्टी और और गुजरात प्रदेश की ईकाई को शक था। लेकिन नरेंद्र मोदी को इस बात का पूरा यकीन था कि वह इसे पूरा कर सकते हैं। मुख्य सचिव जेएन सिंह का कहना है कि लोगों के भीतर संदेह हो सकता था इस प्रोजेक्ट को लेकर नरेंद्र मोदी को यह पता था कि इसे जरूर पूरा कर सकते हैं।

नरेंद्र मोदी को था पूरा विश्वास
जेएन सिंह बताते हैं कि नरेंद्र मोदी इस प्रोजेक्ट को लेकर पूरी तरह से स्पष्ट थे, उन्हें पता था कि इस मूर्ति का कहां लगाना है, इसे स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दोगुना बड़ी होगी। वह इसकी लंबाई से लेकर उंचाई तक के बारे में आश्वस्त थे। इस प्रोजेक्ट पर चर्चा उस वक्त ही शुरू हो गई थी जब 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किए जाने की चर्चा चल रही थी। 31 अक्टूबर 2013 को इस प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी गई थी और ठीक 5 साल बाद आज इसका उद्घाटन किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट को पीएम मोदी के 2019 के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के तौर पर भी देखा जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी की अपील
इस प्रोजेक्ट के लिए पीएम मोदी ने देशभर के लोगों से लोहे का एक हिस्सा दान देने के लिए कहा था। पीएम ने एक भारत श्रेष्ठ भारत का नारा देते हुए लोगों से यह आह्वाहन किया था। जिसके बाद सात लाख गांव से लोगों ने इसके निर्माण के लिए लोहा भेजा था, जोकि कुल 135 टन था। इस प्रोजक्ट के तहत ना सिर्फ मूर्ति बल्कि 52 करे, 3 स्टार होटल, ऑडिटोरियम का भी निर्माण होगा। जेएन सिंह बताते हैं कि इसे भारत की एक नई पहचान के तौर पर देखा जाएगा, यहां तमाम राज्यों के भवन भी होंगे।

काफी मशक्कत की गई है
इस मूर्ति के निर्माण से पहले कई इतिहासकार, कलाकार, शिक्षाविदों ने सरदार पटेल की देशभर में मूर्ति के बारे में अध्ययन किया, जिसके बाद नोएडा के मूर्तिकार राम सुतार ने इसके डिजाइन को अंतिम रूप दिया। अहमदाबाद एयरपोर्ट पर सरदार पटेल की मूर्ति लगी है और स्टेच्यू ऑफ यूनिटी इसी का बड़ा स्वरूप है। इस मूर्ति के बारे में राम सुतार के बेटे अनिल सुतार कहते हैं कि इस मूर्ति में सरदार पटेल के चेहरे का भाव, मुद्दा उनके व्यक्तित्व को दर्शाती है, साथ ही उनके दयालू स्वभाव की भी इसमे झलक मिलती है। सिर उपर, कंधे पर शॉल, हाथ की मुद्रा ऐसी जैसे चलने वाले हो।

आसान नहीं था अंतिम रूप देना
इस मूर्ति के बनने से पहेल 3 फीट, 18 फीट और 30 फीट की मूर्ति को बतौर सैंपल बनाया गया था। जब 30 फीट के सैंपल को हरी झंडी दी गई तो उसके निर्माण का काम चीन की कंपनी फॉड्री जियाग्सी टॉगक्विंग हैंडीक्राफ्ट कंपनी लिमिटेड को दिया गया। जिसने ताबें में इसके बाहरी ढांचे की ढलाई की थी। सुतार बताते हैं कि 2013 से 2018 के बीच तकरीबन 10 बार वह चीन इस मूर्ति को देखने के लिए गए, ताकि इसके स्वरूप में किसी भी तरह का बदलाव नहीं आए, सरदार पटेल के चेहरे की झुर्रियां, शॉल , नाखून, सैंडल का आकार आदि काफी अहम था, जिसपर हम पूरी नजर रख रहे थे। मूर्ति को अंतिम स्वरूप को फाइनल करने के लिए हमने 10वीं मंजिल से इसकी तरह दूसरी थर्माकोल से बनी मूर्ति की तस्वीर ली।

चाइनीज नहीं है यह मूर्ति
जिस तरह से विपक्ष यह आरोप लगाता है कि यह मूर्ति मेड इन चाइना है, इसपर जेएन सिंह कहते हैं, मूर्ति के निर्माण में 5000 तांबे के पैनल लगे हैं जोकि चाइनीज हैं, यह मूर्ति पर कुल खर्च का सिर्फ 8 फीसदी है। प्रतिमा बनाने में कुल 2,989 करोड़ रुपए का खर्च आया है। जिसमें 1,347 प्रतिमा निर्माण पर खर्च हुआ है जबकि जबकि 235 करोड़ रुपये प्रदर्शनी हॉल और सभागार केंद्र पर खर्च किये गये हैं। इसके अलावा 657 करोड़ रुपए निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अगले 15 साल तक प्रतिमा के रखरखाव के लिए खर्च किए जाएंगे। जबकि 83 करोड रुपए की लागत से पुल का निर्माण किया गया है।
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