इमरजेंसी: जब एक ईमानदार जज ने भारत के PM को दिखायी थी कानून की हनक
नई दिल्ली, 25 जून। इस देश में कानून और संविधान ही सर्वोच्च है। शासन व्यवस्था में कोई कितना भी महत्वपूण पद क्यों न हो वह कानून के दायरे में आता है। कानून से ऊपर कोई नहीं है। प्रधानमंत्री भी नहीं। हाईकोर्ट के एक ईमानदार और साहसी जज ने भारत प्रधानमंत्री को दिखाया था कि कानून की हनक क्या होती है। उस जज को प्रलोभन देने की कोशिश की गयी। परोक्ष रूप से धमकी दी गयी। प्रधानमंत्री के कई दूतों ने दबाव बनाया। जासूसी की। लेकिन सत्य के मार्ग पर अटल रहने वाले जज महोदय को कोई डिगा नहीं पाया।

इस जज महोदय के ऐतिहासिक फैसले ने भारत की राजनीतिक तकदीर बदल दी थी। उनके फैसले के बाद देश में आपातकाल के लिए परिस्थितियां तैयार हो गयीं थीं। इमरजेंसी 25 जून 1975 को लगी थी। लेकिन इसकी पटकथा लिखी गयी थी 11 जून 1975 की रात को। 11 से 25 जून के बीच बहुत कुछ घटित हुआ। एक प्रधानमंत्री ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए न जाने कितने प्रपंच किये। लेकिन न उनकी शक्ति काम आयी और न ऊंची हैसियत। ये कहानी है इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन सिन्हा की जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कानून का पाठ पढ़ाया था। प्रतिष्ठित पत्रकार कुलदीन नैयर ने इमरजेंसी की त्रासदी भोगी थी। उन्होंने आपातकाल से जुड़े कई प्रसंग लिखे हैं।

इमरजेंसी लागू होने के पहले की कहानी
25 जून 1975 को इमरजेंसी क्यों लागू हुई, इसकी वजह समझने के लिए इस कहानी की तह में जाना पड़ेगा। इंदिरा गांधी ने 1971 का लोकसभा चुनाव रायबरेली से जीता था। उनके खिलाफ राजनारायण ने चुनाव लड़ा था। राजनारायण ने इस जीत के खिलाफ एक याचिका दाखिल की थी जिसमें इंदिरा गांधी पर सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन सिन्हा की अदालत में यह मामला आया। करीब चार साल तक इस मामले की सुनावई चली। जस्टिस जगमोहन सिन्हा अलग ही मिट्टी के बने हुए थे। शरीर तो दुबला-पतला था लेकिन इरादे फौलाद की तरह मजबूत थे। धर्म और सत्य की राह पर चलने वाले व्यक्ति थे। जब वे राजनारायण की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे तब वे पक्ष और विपक्ष से बहुत ही नपे तुले सवाल पूछते थे। उनकी तटस्थता देख कर कोई भी उनके मन की थाह नहीं ले पा रहा था। 23 मार्च 1975 को इस मामले की सुनवाई पूरी हुई। अब फैसला सुनाने की बारी थी। जैसे ही इस मामले की सुनवाई पूरी हुई जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने खुद को अपने घर कैद कर लिया। उन्होंने घर से निकलना छोड़ दिया। अगर किसी का फोन आता तो जवाब नहीं देते। जज महोदय की इस चुप्पी पर प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसर चिंता में पड़ गये। वे सोचने लगे कि आखिर जस्टिस सिन्हा क्यों इतनी गोपनीयता बरत रहे हैं ? उन्हें कुछ खटकने लगा।

जस्टिस सिन्हा ईमानदारी की मिसाल
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कुछ वफादार नेता यह सोचते थे कि हर इंसान की एक कीमत होती है। बस बोली लगाने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन ये उनका भ्रम था। वे जस्टिस सिन्हा के बारे में गलत अंदाजा लगा रहे थे। उन्हें न खरीदा जा सकता था न झुकाया जा सकता था। इंदिरा गांधी के एक नजदीकी सांसद इलाहाबाद गये हुए थे। उन्होंने बातचीत के दौरान जस्टिस सिन्हा से पूछ दिया, क्या आप पांच लाख रुपये में मान जाएंगे ? जस्टिस सिन्हा ने उन्हें घूर कर देखा । सांसद महोदय उनके तेवर देख कर वहां से चले गये। जस्टिस सिन्हा सांसद की इस हरकत से बहुत नाराज हो गये। इस बीच गृह मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ टस्टिस से मुलाकात की। उन्होंने चीफ जस्टिस से अनुरोध किया कि किसी तरह इस फैसले को कुछ समय के लिए टाल दिया जाय। प्रधानमंत्री अभी विदेश में हैं और इस दौरान अगर कोई प्रतिकूल फैसला आएगा तो यह पूरे देश के लिए अपमानजनक होगा। प्रधान न्यायाधीश ने यह संवाद जस्टिस सिन्हा तक पहुंचा दिया। रिश्वत की पेशकश के कारण जस्टिस जगमोहन सिन्हा पहले से नाराज थे। चीफ जस्टिस की पैरवी ने उन्हें और भड़का दिया। उन्होंने तुरंत कोर्ट के रजिस्ट्रार को फोन लगाया और कहा वे घोषित करें कि राजनारायण की याचिका से संबंधित केस में 12 जून को फैसला सुनाया जाएगा। अब ये तय हो गया कि 12 जून 1975 को कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा। प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसर हरकत में आ गये।

जज महोदय के बंगले के बाहर साधु के वेश में जासूस
फैसले की तारीख के एलान के बाद जस्टिस सिन्हा और सख्त हो गये। उन्होंने अपने स्टेनोग्राफर नेगी राम निगम को घर पर बुला लिया। 11 जून की रात उन्होंने अपने फैसले की कॉपी टाइप करायी। किसी को मालूम नहीं कि क्या फैसला होने वाला है। ये बात सिर्फ जज महोदय और उनके स्टेनोग्राफर को ही मालूम थी। 11 जून से पहले इंजेलिजेंस ब्यूरो के कुछ अफसर इलाहाबाद में डेरा जमाये हुए थे। उन्होंने जज महोदय के स्टेनोग्राफर से ये राज जानने की कोशिश की लेकिन वे भी जज जगमोहन सिन्हा की तरह बेहद ईमानदार थे। आइबी की कोशिश नाकाम रह गयी। जस्टिस सिन्हा एक धर्मपरायण व्यक्ति थे। वे सुबह पूजा-पाठ के बाद ही अपनी दिनचर्या शुरू करते थे। इस बात को जानकर आइबी ने एक साधु को जासूस बना कर उनके घर के बाहर तैनात कर दिया था। वे कहीं से भी कुछ जानकारी पाना चाहते थे। लेकिन 11 जून की रात फैसला टाइप करने के बाद स्टेनोग्राफर निगम ने खुद को छिपा लिया। वे गायब हो गये। जज महोदय भी अपनी पत्नी के साथ कहीं और चले गये। उन्हें कोई संतान नहीं थी। बाद में जब खुफिया विभाग के लोग पहुंचे तो घर पर कोई नहीं था। 12 जून 1975 को जस्टिस जगमोहन सिन्हा नियत समय पर कोर्ट में पहुंचे। फिर उन्होंने वह ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसमें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द कर दिया गया था। लेकिन जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश पर 20 दिनों के लिए रोक लगा दी थी। इसकी वजह से इंदिरा गांधी तत्काल इस्तीफा देने से बच गयीं। उन्हें कुछ मोहलत मिल गयी। वे किसी कीमत पर सत्ता में बनी रहना चाहती थीं। अपनी निरंकुश सत्ता को बचाने के लिए उन्होंने उन्होंने देश पर इमरजेंसी लाद दी।
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