Vikram-S Rocket वाली साइंटिस्ट्स की वो टीम, जिनके दम पर भारत ने रचा इतिहास, दिन- रात कर दिया था एक
शुक्रवार के एक विक्रम- एस रॉकेट लांच करने के साथ एक नया इतिहास रच दिया। आइए जानते हैं इस सफल लांच के पीछे साइंटिस्ट्स की उस टीम के बारे में जिसने दिन- रात एक करके भारत को इस मुकाम पर पहुंचाया है।
Vikram-S Rocket Launch: भारतीय अंतरिक्ष अंनुसंधान संगठन( Indian Space Research Organization) ने शुक्रवार के एक विक्रम- एस रॉकेट लांच करने के साथ एक नया इतिहास रच दिया। दरअसल, विक्रम- एस भारत की पहली निजी तौर पर निर्मित रॉकेट है जिसे चेन्नई से लगभग 115 किमी दूर श्रीहरिकोटा में इसरो ने अपने स्पेसपोर्ट से लॉन्च किया। आइए जानते हैं इस सफल लांच के पीछे साइंटिस्ट्स की उस टीम के बारे में जिसने दिन- रात एक करके भारत को इस मुकाम पर पहुंचाया है।

साइंटिस्ट्स की टीम ने की दिनरात की मेहनत
हैदराबाद की स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस शुक्रवार को श्रीहरिकोटा में इसरो के स्पेसपोर्ट में साउंडिंग रॉकेट कॉम्प्लेक्स से एक रॉकेट - विक्रम-एस, एक छोटा, सिंगल-स्टेज लॉन्च वाहन लॉन्च करने वाली पहली भारतीय कंपनी बन गई। IIT-खड़गपुर के पूर्व छात्र पवन कुमार चंदना ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री और थर्मल साइंस और इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। इससे पहले उन्होंने इसरो की प्रमुख रॉकेट निर्माण सुविधा, विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC)में छह साल तक काम किया। जिस परियोजनाओं में वे शामिल थे, उनमें जीएसएलवी-एमके3 (LMVM3) शामिल था, जो इसरो द्वारा निर्मित अब तक का सबसे बड़ा रॉकेट था।

साइंटिस्ट्स टीम में सभी एक्सपर्ट
पवन कुमार चांदना के अलावा ज्ञानगांधी वी, ईश्वरन वीजी, सेल्वाराजू एस, इस टीम में शामिल थे। ज्ञानगांधी वी के पास 40 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे पद्म श्री पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें भारत में क्रायोजेनिक रॉकेट प्रौद्योगिकी के अग्रदूतों में से एक माना जाता है। जबकि ईश्वरन वीजी दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ठोस ईंधन वाले रॉकेट चरण (GSLV-Mk3 या LVM3 पर) के पूर्व परियोजना निदेशक थे। सेल्वाराजू के पास पास 50 से अधिक मिशन लॉन्च की गुणवत्ता परखने की विशेषज्ञता है। वे इसरो मुख्यालय में सिस्टम्स विश्वसनीयता और गुणवत्ता निदेशालय के पूर्व निदेशक हैं।

इसरो की अगली योजना
कंपनी अब विभिन्न प्रणालियों के परीक्षणों पर फोकस करने जा रही है। विक्रम-I के तरत पहला पूर्ण विकसित रॉकेट लॉन्च करने की योजना पर कार्य किया जा रहा है। फर्म की भविष्य में कई लॉन्च मिशन योजना है। साल 2026 में 18 लॉन्च करने के लिए करीब 100 मिलियन डॉलर बजट पर कार्य होगा। 2023 में चार, 2024 में आठ और 2025 में 12 लांच मिशन को पूरा करने का लक्ष्य है।

ISRO ने क्या कहा?
इसरो ने कहा कि लॉन्च व्हीकल विक्रम की तकनीकी संरचना मल्टी-ऑर्बिट इंसर्शन और इंटरप्लेनेटरी मिशन के लिए सक्षम है। सांइंटिस्ट्स इस रॉकेट लांच को एक प्रदर्शन बताया है। उनका कहना है कि कंपनी उद्देश्य अभी अभी सभी स्पेस मिशन के सभी पैमानों पर खरा उतरने वाले सबऑर्बिटल लॉन्च करना है। स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक पवन कुमार चंदनम ने कहा, "हमने आज भारत का पहला निजी रॉकेट लॉन्च कर इतिहास रच दिया। यह नए भारत का प्रतीक और देश के उज्ज्वल भविष्य का प्रारंभ है"।

विक्रम- एस रॉकेट अहम क्यों?
ऑर्बिटल क्लास स्पेस लॉन्च व्हीकल्स (Obital Class Space Launch Vehicles) विक्रम सिरीज की अधिकतर तकनीकों परीक्षण करने में सहायक होगा। जिसके कारण इसे विक्रम- एस रॉकेट लांच को मिशन को स्काईरूट एयरोस्पेस के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है। प्रक्षेपण यान का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक स्वर्गीय डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया। यह उन्हें सम्मान और श्रद्धांजलि के लिए किया गया। स्काईरूट के एक अधिकारी ने कहा कि छह मीटर लंबी रॉकेट दुनिया की चुनिंदा रॉकेट्स में से एक है, जिसमें लॉन्च वाहन की स्पिन स्टेबिलिटी के लिए 3-डी प्रिंटेड सॉलिड थ्रस्टर्स लगे हैं।












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