चुनाव से पहले नेताओं को विभीषणों से खतरा, जासूसों की ले रहे हैं मदद

जी हां इस बार लोकसभा चुनाव में निजी जासूसी एजेंसियों की चांदी हो रही है, क्योंकि चुनाव में भाग्य आजमाने जा रहे उम्मीदवार और अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों पर नजर रखने के लिए बड़े पैमाने पर इन एजेंसियों की सेवा ले रहे हैं।
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हलांकि ये कोई पहली बार नहीं हो रहा है। इससे पहले भी कई चुनावों में ऐसा हो चुका है, किन इस बार राजनीतिक तहकीकात मत प्रबंधन पैकेज में बदल गई है। आंकड़ों की बात करे तो देश में 15,000 से अधिक जासूसी एजेंसियां कार्यरत हैं जिसमें से कम से कम 50 एजेंसियों को राजनीतिक जासूसी में महारत हासिल है।
दिल्ली आधारित एक जासूसी एजेंसी की माने तो इस बार न केलव प्रतिद्वंदी उम्मीदवार की जानकारी हासिल करने के लिए बल्कि चुनाव संबंधी विशेष कार्यों के लिए ही जासूसी एंजेंसियों की सेवा ली गई है। जैसे कि मतदान स्तर की सूचना, मतदाताओं की अपेक्षाओं, रणनीतियों, अन्य राजनीतिक उम्मीदवारों की कार्य प्रणाली की जानकारी लेने के लिए जासूसों की मदद ली जा रही है।
जानकार मानते है कि राजनीतिक दल तीन स्तरों पर जासूसी कंपनियों की सेवा लेते है। पहले चरण में उम्मीदवारों के चयन के लिए, ताकि उनके जीतने की संभावना का पता चल सके, दूसरे चरण में धोखे बाजों पर नजर रखने के लिए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि पार्टी का कोई सदस्य धोखा या प्रतिद्वंद्वियों को महत्वपूर्ण सूचनाएं तो नहीं दे रहा और तीसरा अन्य दलों की चुनावी रणनीति एवं गतिविधियों पर नजर रखने के लिए। खर्च की बात करे तो इस तरह के कामों के लिए ये जासूसी कंपनियां 5 से लेकर 25 लाख रुपए तक खर्च करती है।












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