खुदा बंदे ये खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है ? ज्ञान की अलख जगा रहे शिक्षक, संवर रही है बच्चों की तकदीर
किसी भी बच्चे में कौन सा गुण खास है, कौन सी क्वालिटी उसे स्पेशल बनाती है, इसकी पहचान बहुत कठिन है। कर्नाटक के स्कूल में 'बच्चों की खास बात' तराशने का काम किया जा रहा है।

Special Children कहते ही आमिर खानी की फिल्म 'तारे जमीं पर' और उसका किरदार दर्शिल सफारी याद आते हैं। दरअसल, किसी भी शिक्षा प्रणाली में छात्रों की क्वालिटी की पहचान जो उसे खास बनाती है, बहुत जरूरी है। हर बच्चा अपने आप में स्पेशल होता है, उसके भीतर की क्वालिटी को निखारने के लिए कर्नाटक के एक स्कूल में खास एफर्ट किया जा रहा है। स्कूल में बच्चों को उनके इंट्रेस्ट के हिसाब से सिलाई-कढ़ाई जैसी गतिविधियों की ट्रेनिंग दी जा रही है। जानिए समाज में बदलाव की प्रेरक कहानी (सभी तस्वीरें साभार- (www.opschoolsahas.org/gallery)

खास बच्चों के लिए बना स्कूल
कर्नाटक के मडिकेरी में कोडागु विद्यालय अपॉर्च्युनिटी स्कूल (Kodagu Vidyalaya Opportunity School, in Short KVOS) के खुशनुमा माहौल में मुस्कुराते हुए बच्चे अनुशासन, सहानुभूति, सादगी और शांति से भरे होते हैं। विशेष रूप से विकलांग बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोडागु में अपनी तरह का पहला संस्थान स्थापित किया गया है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कोडागु विद्यालय स्वर्गीय बिददंड एस कुशलप्पा (Biddanda S Kushalappa) द्वारा स्थापित किया गया था।

बच्चों की जरूरतों को पूरा करने का हरसंभव प्रयास
जैसे-जैसे इस संस्थान का विकास हुआ कुशलप्पा के बेटे और दिवंगत आध्यात्मिक विभूति बिदंड सुबिया ने विकलांग / दिव्यांग बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस अनोखे स्कूल की कल्पना की। KVOS की स्थापना 1996 में बीके सुबैया, मीना करियप्पा और अन्य समान विचारधारा वाले दूरदर्शी लोगों ने की। स्थापना के बाद से KVOS जिले के हजारों विकलांग बच्चों को मुफ्त, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर चुका है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में प्राचार्य गीता श्रीधर बताती हैं कि जिले में विशेष रूप से विकलांग बच्चों की जरूरतों को पूरा करने का हरसंभव प्रयास करते हैं। उन्होंने बताया कि ज्यादातर बच्चे कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों से हैं।

मुख्यधारा में शामिल होने का मौका
इस स्कूल ने परोपकारियों और दानदाताओं की मदद से मुफ्त शिक्षा की दिशा में प्रयास शुरू किए। 26 साल से ज्ञान की अलख जगाने में जुटी इस संस्था को ट्रस्टियों और आर्थिक योगदान करने वाले लोगों से मिलने वाली मदद से अलावा राज्य सरकार से भी मदद मिलती है। कर्नाटक सरकार संस्था को न्यूनतम अनुदान देती है। एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक संस्था वर्तमान में विशेष जरूरतों वाले 61 छात्रों का पोषण करती है। इन्हें मुख्यधारा में शामिल होने का मौका मिलता है।

10 विशेष शिक्षकों की टीम बच्चों को समर्पित
बदलते दौर में समावेशी समाज को अभी भी दूर का सपना माना जाता है। ऐसे में KVOS को छात्रों को बौद्धिक तरीकों के अलावा, आत्मविश्वास और रचनात्मकता के साथ प्रतिस्पर्धी दुनिया का सामना करना सिखाया जाता है। संस्थापक मीना करियप्पा और वीना चेंगप्पा, और गीता श्रीधर के मार्गदर्शन में, 10 विशेष शिक्षकों की टीम बच्चों को तैयार करती है। टीम में बौद्धिक अक्षमता से निपटने में प्रशिक्षित विशेषज्ञ भी शामिल हैं। 2021 में इस संस्था का पूर्ण नवीनीकरण हुआ। गोविंद भट और मीनाक्षी भट मेमोरियल ट्रस्ट से दान के बाद यहां के छात्र शांत वातावरण में खेल गतिविधियों के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन पा रहे हैं। सैकड़ों बच्चे और युवा विशेष ओलंपिक और अन्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में भाग ले चुके हैं। पदक भी जीते हैं।

जरूरत के मुताबिक स्टडी प्लान
प्राचार्य गीता श्रीधर के अनुसार "संस्थान ऑटिज्म, सेरेब्रल पल्सी, सुनने और बोलने की अक्षमता वाले छात्रों सहित विशेष रूप से विकलांग सभी बच्चों की जरूरतों को पूरा करता है। हम बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए शुरुआती जरूरतों पर जागरूकता पैदा करते हैं। गीता बताती हैं कि विशेष शिक्षक प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसकी जरूरत के मुताबिक स्टडी प्लान तैयार करते हैं। बच्चों के साथ संवाद करने के लिए सहायक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। परिसर में एक कंप्यूटर लैब, कार्यात्मक रसोई, फिजियोथेरेपी और संवेदी कक्ष, ऑडियोमेट्री कक्ष के साथ एक ऑडियोलॉजी इकाई और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र भी हैं।

किस तरह के काम करते हैं बच्चे
KVOS के स्पेशल टीचर बच्चों की क्षमता को पहचानते हैं। फिर उपयुक्त व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है। संस्था में विभिन्न ट्रेनिंग सेक्शन हैं, इनमें एक स्टेशनरी यूनिट भी शामिल है। यहां बच्चे नोटपैड समेत कई रोचक और इस्तेमाल में आने वाली वस्तुएं बनाना सीखते हैं। खानपान वाली इकाई में बच्चे बेक करना सीखते हैं। सिलाई से जुड़े कामों के लिए बनाई गई इकाई में छात्र कपड़े के थैले और अन्य जरूरी सामान बनाना सीखते हैं। फिनाइल उत्पादन और बागवानी यूनिट भी हैं। यहां बने उत्पादों की मार्केटिंग स्कूल परिसर और मडिकेरी में जीटी सर्कल के पास एक आउटलेट पर की जाती है। वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन में कुशल न होने के बावजूद इन खास बच्चों को प्रकृति का सम्मान करना भी सिखाया जाता है।

उत्साह बढ़ाने वाली कहानियां
कोडागु विद्यालय अवसर स्कूल (KVOS) बच्चे को किसी की प्रेरणा का स्रोत बना सके, इसमें संस्था को काफी गर्व का एहसास होता है। 14 वर्षीय कल्पनानाथ 1996 में इस स्कूल में शामिल हुए। उनकी क्षमताओं को विशेष शिक्षकों ने पहचाना। ट्रेनिंग के बाद इन्होंने अलास्का में विशेष ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया और देश के लिए पदक जीता। आज, कल्पनानाथ व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र पर विशेष प्रशिक्षक के रूप में काम करते हैं।

आशा और विश्वास का संचार
संस्था बच्चों को विशेष ओलंपिक में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करती है और अब तक कुल छह छात्रों ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में पदक जीते हैं। कई छात्रों ने 10वीं कक्षा की परीक्षा भी पास की है। कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर आभूषण डिजाइन तक के क्षेत्रों में प्राइवेट कंपनियों में इन होनहार बच्चों को रोजगार भी मिल चुके हैं। KVOS कई दिव्यांग / विकलांग बच्चों के जीवन में आशा, विश्वास और नया अर्थ का संचार कर रहा है। एक्सप्रेस की रिपोर्ट में ट्रस्टी गुरुदत्त कहते हैं, नई पहल करने के लिए कई दृष्टिकोण हैं। दानदाताओं के सहयोग से इन पर भी काम कर टारगेट अचीव किया जा सकता है। प्रबंधन का लक्ष्य एक आत्मनिर्भर मॉडल और कॉर्पस फंड स्थापित करना है। इससे इन विशेष बच्चों के बेहतर एकीकरण के लिए और कार्यक्रम बनाने में मदद मिलेगी।

कला के कद्रदान, उत्पादों की खरीदारी
2020 में पहली बार संस्था ने कैंपस में बने उत्पादों की बिक्री का आयोजन किया। होनहार कलाकारों की कला को मिले कद्रदान और ग्राहकों के रिस्पॉन्स से उत्साहित KVOS धन जुटाने और विशेष बच्चों की प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिए उत्पादों की बिक्री हर साल आयोजित करने की योजना बना रहा है। बहरहाल, पूरे प्रसंग से इतनी बात तो जरूर स्पष्ट हो जाती है कि मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है। शायद इसी मौजूं पर अल्लामा इकबाल जैसे शायर ने लिखा,
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।












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