सपा स्टार प्रचारकों की पहली सूची में दिखा नेता अखिलेश तो दूसरी में बेटा अखिलेश

नई दिल्ली। माता-पिता अपनी संतान को एकतरफा प्यार करते हैं। संतान उन्हें बदले में प्यार करे या न करे। माता-पिता से संतानों के मतभेद आम बात हैं। जो मां-बाप किसी के सामने नहीं झुकते, वे अपनी संतानों के सामने झुके नज़र आते हैं। इससे उन्हें कभी अपमान महसूस नहीं होता। मगर, जब वास्तव में सार्वजनिक जीवन में संतानें कुछ ऐसा कर देती हैं जिससे वे दुखी हों, तो उनके दुख, उनकी पीड़ा को मापने के लिए कोई पैमाना इस दुनिया में नहीं है। अखिलेश यादव संवेदनशील इंसान हैं और वे इस भावना को समझते हैं। यही वजह है कि अक्सर वे भूल-सुधार करते नज़र आते हैं।

पहली सूची में दिखा नेता अखिलेश तो दूसरी में बेटा अखिलेश

समाजवादी पार्टी के स्टार प्रचारकों की पहली सूची में पार्टी का अध्यक्ष अपने चुनावी सम्भावनाओं को देखता नज़र आता है तो इसी पार्टी की दूसरी सूची में एक बेटा अपने हाथों पिता की जगहंसाई और उनके मान-सम्मान पर लगी चोट के बाद प्रायश्चित करता नज़र आता है। यह जानना जरूरी है कि स्टार प्रचार की पहली सूची में मुलायम सिंह का नाम नहीं था, तो क्यों।

मुलायम की सोच से टकराना पड़ रहा है अखिलेश को

मुलायम की सोच से टकराना पड़ रहा है अखिलेश को

यह आम चुनाव है। संसदीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा चुनाव। इससे ठीक पहले मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा सत्र के अपने अंतिम भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दोबारा जीतकर आने वाला जो भाषण दिया था, उसे सिर्फ शुभकामना कतई नहीं माना जा सकता था। हालांकि मुलायम सिंह ने यह कदम समाजवादी पार्टी की भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए ही उठाया था। मगर, वे भूल गये कि पार्टी की भविष्य की राजनीति तय करने का अधिकार अब पार्टी के अध्यक्ष के पास है इसलिए तरीका भी उनसे पूछे बगैर या उनकी मर्जी के बगैर नहीं होना चाहिए। क्या अखिलेश ने अपने पिता से विरोध नहीं जताया होगा? क्या उन्होंने अपने पिता पर गुस्सा नहीं दिखाया होगा? मगर, वे बातें पब्लिक डोमेन में नहीं आ सकीं, तो इसलिए कि एक बेटे ने अपने पिता से यह गुस्सा दिखाया होगा।

अखिलेश यादव ने जो राजनीतिक की राह पकड़ी है या जो उनका तरीका है वह मुलायम से बिल्कुल अलग है। मुलायम की तरह वे कभी बीजेपी, कभी कांग्रेस खेमे में जाकर राजनीति नहीं करने वाले हैं। अखिलेश की राजनीति लालू प्रसाद वाली है। जिसका साथ देंगे, उसे वो नहीं छोड़ेंगे। अगला भले ही उनका साथ छोड़ दे। अखिलेश ने अपनी तरफ से कांग्रेस का साथ भी नहीं छोड़ा है। परिस्थितियां ऐसी बनी हैं कि दोनों एक-दूसरे से बस दूर हैं। इसलिए मुलायम की सोच में चुनाव बाद की राजनीति में बीजेपी के लिए जगह जरूर होगी, लेकिन अखिलेश की सोच में यह जगह नहीं बनती।

मुलायम के बदले खुद की सोच में लोच लाएं अखिलेश

मुलायम के बदले खुद की सोच में लोच लाएं अखिलेश

एक और विरोध साफ तौर पर है। अखिलेश ने मायावती को चुनावी साझीदार बना लिया है। मुलायम को यह बात हमेशा नागवार गुजरी है। अब इस गठबंधन के बाद जो कुछ घटनाएं होंगी, उस वजह से बाप-बेटे में तकरार होती रहने वाली है। मसलन मैनपुरी में अगर मुलायम चुनाव लड़ेंगे तो वहां साझा रैली में मायावती होंगी, तो मुलायम के लिए मुश्किल रहेगी। इस वजह से सार्वजनिक तू-तू मैं-मैं की आशंका भी बनी रहेगी। ऐसे में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर अखिलेश की भूमिका बढ़ जाती है। यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि वे अपने पिता का ऐसी परिस्थिति से बचाव करें।

मुलायम सिंह यादव कभी हार्दिक पटेल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेन्स के वक्त अखिलेश के लिए असहज स्थिति पैदा करते हैं तो कभी सार्वजनिक मंच पर अखिलेश को लताड़ भी लगा चुके हैं। अखिलेश यादव ऐसी घटनाओं को रोक नहीं सकते। मगर, जिस तरीके से उन्होंने शालीनता से अपने पिता की ओर से इन अपमानजनक घटनाओँ को आशीर्वाद के रूप में लिया है वह दूसरी संतानों के लिए प्रेरणा है। ऐसा कर पाना वाकई मुश्किल काम है।

अखिलेश के लिए मुलायम का प्यार है बरकरार

अखिलेश के लिए मुलायम का प्यार है बरकरार

मुलायम सिंह ने अपनी लोकसभा सीट छोड़कर अखिलेश को सांसद बनाया था। 2012 के विधानसभा चुनाव में जीत परोसकर अखिलेश को सीएम की कुर्सी पर बिठाया था। ऐसा करते हुए पारिवारिक विवाद का उन्होंने बखूबी सामना किया। मगर, अखिलेश पारिवारिक विवाद को सम्भाल नहीं सके। हो सकता है कि इसकी वजह वाजिब हो क्योंकि मोटे तौर पर वे भी परिवार को समेट कर चले हैं। शिवपाल ज़रूर अपवाद हैं।

2019 के आम चुनाव में भी अखिलेश को अपने पिता वाला संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ ही अधिक सुरक्षित लगा तो उन्हें अपने पिता का ही अहसानमंद होना चाहिए कि उन्होंने इस सीट को सुरक्षित रखा है। मुलायम कहीं से भी लड़ते तो वह सीट सुरक्षित हो जाती। यही तो अहमियत है मुलायम सिंह यादव की। यही वजह है कि जैसे ही स्टार प्रचारकों की सूची में मुलायम का नाम नहीं दिखा, एक बड़ी बहस छिड़ गयी। यह बहस ही मुलायम के राजनीतिक वजूद के वजन को बताता है। इस वजन के सामने अखिलेश हल्के दिखे। बुद्धिमानी से उन्होंने इस सूची को संशोधित करने में देर नहीं लगायी और भूल-सुधार कर दिया।

अखिलेश की ज़िम्मेदारी और भी ज्यादा इसलिए हो गयी है क्योंकि राजनीतिक रूप से आज वे जो कुछ भी हैं अपने पिता की वजह से है। उन्हें अपनी पार्टी को नयी राजनीतिक सोच के सांचे में ढालना भी है और अपने पिता का सम्मान भी बरकरार रखना है। मगर, किसी भी सूरत में मुलायम का सार्वजनिक अपमान न करें अखिलेश, यह हिदायत इस तथ्य के बावजूद बनती है कि उन्होंने हमेशा ऐसी आशंकाओं को दूर रखने की कोशिश की है।

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