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गुजरात के कुछ दंगा पीड़ित मुसलमानों का बीजेपी से सवाल- दाऊद की बेटी को टिकट मिलता, तो कैसा लगता

पायल कुकरानी
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पायल कुकरानी

साल 2002 के गुजरात दंगों में पायल कुकरानी आठ साल की थीं.

2002 के दंगों में भूमिका को लेकर पायल के पिता मनोज कुकरानी को अदालत ने उम्र क़ैद की सज़ा 2012 में सुनाई थी.

28 फ़रवरी 2002 को अहमदाबाद के नरोदा पाटिया की मुस्लिम बस्ती में 97 लोगों की हत्या कर दी गई थी. इस जनसंहार के दोषियों में मनोज कुकरानी भी शामिल हैं.

क़रीब 20 साल बाद इसी नरोदा पाटिया विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी ने मनोज कुकरानी की बेटी पायल को उम्मीदवार बनाया है.

मनोज कुकरानी अभी स्वास्थ्य कारणों से ज़मानत पर बाहर हैं और अपनी बेटी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं.

28 फ़रवरी 2002 को एक हिंसक भीड़ ने नरोदा पाटिया के मुस्लिम बहुल इलाक़े में हमला कर दिया था और 97 लोगों की जान ले ली थी.

इसमें रेप और आगज़नी के भी कुछ मामले दर्ज किए गए थे. 2002 के गुजरात में दंगे में किसी एक जगह पर इतने लोगों की जान कहीं और नहीं गई थी.

पायल कुकरानी
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पायल कुकरानी

पीड़ित मुस्लिम परिवार नाराज़

पायल कुकरानी को बीजेपी से टिकट मिलने पर नरोदा पाटिया के कुछ पीड़ित मुस्लिम परिवार काफ़ी नाराज़ हैं.

दंगाइयों ने सलीम शेख़ की बहन की एक लड़की और उनके दो बच्चों की जान ले ली थी. सलीम शेख़ से पूछा कि वह पायल कुकरानी को बीजेपी से टिकट मिलने को किस रूप में देखते हैं?

सलीम शेख़ कहते हैं, ''मैं तो मनोज के ख़िलाफ़ गवाह भी बना था. उसे सज़ा भी मिली. अब वह अपनी बेटी के लिए चुनाव प्रचार कर रहा है. मनोज कुकरानी एक दोषी है इसलिए बीजेपी उसको टिकट नहीं दे सकती है. ऐसे में बीजेपी ने परिवार वालों को टिकट दिया. मनोज कुकरानी ने 2002 में ग़रीब मुसलमानों को मारने में मेहनत की थी. बीजेपी उसे एक क्रांतिकारी के रूप में देखती है. बीजेपी ने इसीलिए प्रोत्साहन के तौर पर मनोज की बेटी को टिकट दिया है.''

सलीम शेख़ ने कहा, ''बीजेपी वालों से आपकी बात हो तो पूछिएगा कि दाऊद इब्राहिम की बेटी को यहाँ की कोई पार्टी टिकट देती तो कैसा लगता?''

सलीम शेख़ के इस सवाल को बीजेपी गुजरात के प्रवक्ता यमल व्यास से पूछा तो उनका जवाब था, ''पायल ख़ुद एक एमडी डॉक्टर हैं. युवा हैं और पार्टी में काफ़ी मेहनत करती हैं. पार्टी की कार्यकर्ता हैं और उनको टिकट दिया गया है. यह विषय बहुत पुराना है और गुजरात उसे भूल चुका है."

उन्होंने कहा- गुजरात के सारे लोग भूल चुके हैं. 20 साल हो गए. मैं समझता हूँ कि पायल के उम्मीदवार बनने में कोई दिक़्क़त नहीं है. कोर्ट ने जो भी प्रक्रिया करनी थी कर दी है और दोषियों को सज़ा भी मिली है. अब गुजरात के लोग इससे आगे निकल चुके हैं. गुजरात ने बहुत विकास किया है.''

नरोदा पाटिया बस्ती
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नरोदा पाटिया बस्ती

यमल व्यास ने कहा कि गुजरात में हर समुदाय का बहुत विकास हुआ है. लेकिन आप नरोदा पाटिया के दंगा प्रभावित मुस्लिम इलाक़े में जाएं तो यहां विकास कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखता है.

आज भी यह इलाक़ा किसी मलिन बस्ती की तरह है. यमल से पूछा कि क्या उन्होंने कभी नरोदा पाटिया के मुस्लिम बस्ती में जाकर देखा है कि कितना विकास हुआ है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ''देखिए ये आपका विचार हो सकता है लेकिन गुजरात को लोग हमें जिस तरह से आशीर्वाद दे रहे हैं, वह विकास के दम पर ही है. पूरे गुजरात का विकास हुआ है. भारतीय जनता पार्टी अपने उम्मीदवार का चयन एक प्रक्रिया के आधार पर करती है.''

शख़्स
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शख़्स

'यह इंसाफ़ नहीं'

इसी इलाक़े की 70 साल की फ़ातिमा बीबी बताती हैं, ''मेरे कुल 19 रिश्तेदारों की जान गई थी. गुनाहगार को टिकट दिया जा रहा है. यह कैसा इंसाफ़ है? जिसने गुनाह किया, उसे इनाम दिया जा रहा है.

उन्हें केवल गुनाह करने वालों की बेटी ही दिखती है. जिसके ख़िलाफ़ अन्याय हुआ, उसके घर के लोगों के लिए इन्हें कुछ नहीं दिखता? ये कौन सा अंधा क़ानून है. ये हमारे ज़ख़्मों पर नमक छिड़क रहे हैं.''

फ़ातिमा यह सब बात कहते हुए रोने लगती हैं.

वह रोते हुए कहती हैं, ''लोग जानवरों को मारने में सोचते हैं. लेकिन उन्होंने इंसानों को मारा है. बच्चों को इन्होंने ज़िंदा जला दिया. हमें अब भी रात में कई बार नींद नहीं आती है. कहाँ गोधरा और कहाँ पाटिया. हम तो आज तक गोधरा गए भी नहीं. पता भी नहीं किस इलाक़े में है.''

स्थानीय महिलाएं
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स्थानीय महिलाएं

इसी इलाक़े की जुलेखा बानो कहती हैं, ''पाटिया में 50 सालों से हूँ. हमने मदद की इतनी गुहार लगाई थी. जिसे अभी टिकट दिया है, उसके बाप को दंगों में अपनी आँखों से देखा है. ये लोग कह रहे थे कि पाकिस्तान भागो अब यहाँ रहने का कोई अधिकार नहीं है. क्या हम हिन्दुस्तान की नारी नहीं हैं? हिन्दुस्तान को आज़ादी दिलाने में हमने क्या कम क़ुर्बानी दी है? हमने वो दृश्य देखा है, जो अब भी अंधेरे में लेकर चला जाता है.''

जुलेखा कहती हैं, ''चाहे बीजेपी आए या कांग्रेस हमें किसी से उम्मीद नहीं है. क्या हमारे लोगों को टिकट नहीं मिल सकता. पीड़ितों को टिकट नहीं मिलेगा? क्या जुल्म करने वाले ही यहाँ रह सकते हैं?''

पाटिया के ही बाबू सैयद कहते हैं, ''मैं गुजरात दंगे में 20 साल का था. मेरे छोटा भाई तब स्कूल में पढ़ता था और वह विकलांग था. दंगाइयों ने उस पर भी रहम नहीं खाया था. देखिए मनोज कुकरानी जैसे लोग बीजेपी के सैनिक हैं. भले ये दूसरों के लिए बुरे हैं लेकिन बीजेपी के लिए तो उन्होंने अच्छा काम किया है. ऐसे में इन्हें इनाम तो मिलेगा ही.''

2002 के दंगे में नरोदा पाटिया के मुसलमानों की रोज़ी रोटी को भी निशाना बनाया गया था.

बाबू सैयद तब एक होटल चलाते थे और उनके होटल में भी आग लगा दी गई थी. अब पिछले दस सालों से वह एक गुमटी चला रहे हैं.

नरोदा पाटिया जनसंहार मामले में कुल 32 लोगों को अहमदाबाद की विशेष अदालत ने दोषी ठहराया था, जिनमें प्रदेश की नरेंद्र मोदी सरकार की मंत्री माया कोडनानी और बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी भी शामिल थे.

पायल कुकरानी
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पायल कुकरानी

बीजेपी मुसलमानों को क्या संदेश देना चाहती है

पिछले हफ़्ते कांग्रेस ने सिखों के ख़िलाफ़ 1984 के दंगों में अभियुक्त रहे जगदीश टाइटलर को दिल्ली नगर निगम चुनाव में उम्मीदवारों को लेकर फ़ैसला करने वाली समिति में रखा, तो बीजेपी ने कहा कि यह सिखों के ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने की तरह है.

लेकिन अब बीजेपी मनोज कुकरानी की बेटी को टिकट देने के फ़ैसले को सही ठहरा रही है.

मनोज कुकरानी की बेटी को टिकट देकर बीजेपी क्या संदेश देना चाहती है?

चिमनभाई पटेल इंस्टिट्यूट के निदेशक डॉ हरि देसाई कहते हैं, ''सरदार पटेल कहते थे कि हिन्दू राष्ट्र का ख़्याल पागलों का है. पायल कुकरानी को टिकट देकर बीजेपी स्पष्ट संदेश दे रही है कि वह किसी भी हद तक जा सकती है. बिलकिस बानो के बलात्कारियों को छोड़ने का समर्थन इन्होंने उसी तरह से किया. ये साफ़ संदेश दे रहे हैं कि इस देश में व्यवस्था केवल उनके वफ़ादारों के लिए है. जो उनके वफ़ादार नहीं हैं, उन्हें अलग-थलग रहना होगा.''

बीजेपी पिछले कई विधानसभा चुनावों से गुजरात में मुसलमानों को टिकट नहीं दे रही है. बीजेपी ने 1980 से अब तक 1998 में केवल एक मुसलमान प्रत्याशी को टिकट दिया था.

गुजरात में मुसलमानों की आबादी 9.97 फ़ीसदी है. अगर आबादी के अनुपात के हिसाब से देखें तो कम से कम 18 मुसलमान विधायक होने चाहिए जो कि कभी नहीं हुआ.

गुजरात में 1980 में सबसे ज़्यादा 12 मुसलमान विधायक चुने गए थे. गुजरात की 182 सीटों वाली विधानसभा में 25 ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं, जहाँ मुसलमान मतदाता अच्छी संख्या में हैं.

गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद मुसलमानों को अल्पसंख्यक के रूप में नहीं देखा गया.

मोदी ने प्रदेश में अल्पसंख्यक विभाग भी नहीं बनाया था. इस बार भी बीजेपी ने अब तक किसी मुसलमान को टिकट नहीं दिया है.

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