जानें भारत के ऐतिहासिक 'मंगल मिशन' से जुड़ी रोचक बातें-

जानें भारत के 'मिशन मंगल' से जुड़ी रोचक बातें-- अभी तक अमेरिका और रूस ही मंगल ग्रह पर अपने यान भेज पाए हैं और अगर भारत इसमें कामयाब होता है तो इतिहास रचते हुए तीसरा स्थान अर्जित कर लेगा।
- भारत के इस अभियान को 'मार्श ऑर्बिटर मिशन' नाम दिया गया है।
- इसरो को इस मिशन पर काम करने के लिए 3 अगस्त 2012 को मंजूरी मिल गयी थी।
- मंगलयान को इसरो के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से पीएसएलवी सी-25 की मदद से छोड़ा जाएगा।
- इस यान का वजन 1350 किलो है। जो कि पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकल कर अगले दस महीने तक अंतरिक्ष में भ्रमण करता रहेगा और सितंबर 2014 तक मंगलग्रह की कक्षा में पहुंचेगा। इस दौरान इसकी स्पीड 11 किलोमीटर प्रति
सेकंड रखा गया है। हालांकि मंगल ग्रह कक्षा में प्रवेश करते समय इसकी स्पीड को कम किया जाएगा।
- मंगलग्रह धरती से करीब 40 करोड़ किलोमीटर दूर है।
- इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने कहा, "मंगल को रहने योग्य माना जाता है। कई प्रकार से यह धरती जैसा ही है।"
- धरती के लगभग समान मंगल भी अपनी धुरी पर 24 घंटे 37 मिनट में एक घुर्णन लगाती है। हालांकि धरती जहां 365 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है, वहीं मंगल को इसमें 687 दिन लगते हैं।
- इस अभियान पर 450 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।
- इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन का कहना है कि वैज्ञानिकों के पास इस अभियान की तैयारी के लिए सिर्फ 15 महीने का वक्त था, क्योंकि अगला अवसर 780 दिन के बाद जनवरी 2016 में ही मिल सकता था।
- अभी तक मंगल ग्रह तक जाने के लिए चलाये गये 51 में से 21 अभियान ही सफल रहे हैं। चीन ने पिछले वर्ष अपना अभियान प्रारम्भ किया था पर उसे असफलता ही हाथ लगी।
- अंतरिक्ष कार्यक्रम हालांकि 1960 से ही इसरो के अभियानों का हिस्सा रहा है, लेकिन इस क्षेत्र में पहला बड़ा कदम 2008 में चंद्रयान-1 के साथ रखा गया। चंद्रयान-1 अभियान में ही पहली बार चांद पर पानी का पता चला था।












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