अफ़ग़ानिस्तान से जीवन की डोर सुलझाने भारत आए लोगों की ज़िंदगी और उलझी
दिल्ली के लाजपत नगर के इलाक़े में हर तरफ़ चकाचौंध है. कोविड का लॉकडाउन झेल चुके इस बाज़ार में अब रौनक़ लौट आई है.
यहाँ के जे-ब्लॉक में महँगी-महँगी गाड़ियों से लोग अफ़ग़ान होटलों में खाने पहुँचते हैं. दिल्ली के संपन्न लोगों के लिए इस इलाक़े में मौजूद अफ़ग़ान होटलों में खाना एक 'फ़ैशन स्टेटमेंट' जैसा ही है.

लेकिन, अफ़ग़ान व्यंजनों की ख़ुशबू बिखेरते होटलों से सिर्फ़ 300 मीटर की दूरी पर 50 साल के रहमतुल्लाह भी रहते हैं जो इस चिंता में हैं कि वो और उनका नौजवान बेटा रात में क्या खाएँगे. सिर्फ़ दो महीने पहले जब वो अपने बेटे के साथ भारत इलाज के लिए आए थे, तो वो अपने साथ जमा पैसे लेते आए थे.
उन्हें इलाज के बाद वापस अफ़ग़ानिस्तान लौटना था. लेकिन इसी दौरान तालिबान ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया और उसके बदले हालात की वजह से भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच उड़ानों को रोक दिया गया.
न पैसे बचे हैं, न लौटने का ज़रिया
अब भारत में दो-तीन महीने पहले इलाज कराने आए अफ़ग़ान नागरिकों के पास न पैसे बचे हैं और ना ही वतन लौटने का कोई दूसरा ज़रिया. वो इन हालात में दूसरों से मदद मांग-मांग कर किसी तरह गुज़ारा कर रहे हैं.
दिल्ली में रह रहे अफ़ग़ान समाज के अहमद ज़िया ग़नी कहते हैं कि इलाज के लिए आए इन अफ़ग़ान नागरिकों की परेशानी को दूर करने का कोई साधन भी नहीं है. वो कहते हैं कि लोग आपस में पैसे जमा कर उनके खाने और दवाओं का इंतज़ाम कर रहे हैं. लेकिन ये बहुत दिनों तक नहीं हो सकता है.
इलाज कराने आए रहमतुल्लाह अफ़ग़ानिस्तान के हेलमंद प्रांत के अज़ार्जाओ गारामसील इलाक़े के सापार गाँव के रहने वाले हैं. वो पेशे से किसान हैं, लेकिन अपनी ज़मीन नहीं है. वो दूसरों की ज़मीन किराए पर लेकर ज्वार और गेहूँ की खेती करते रहे हैं.
18 महीने पहले उनकी दुनिया तब बदल गई, जब उनके बेटे अमानुल्लाह रोज़ी की तलाश में ईरान चले गए. वहाँ अमानुल्लाह एक भीषण दुर्घटना का शिकार हो गए, जिसकी वजह से उनके दोनों हाथ और दाहिने पैर को काटना पड़ा. इस हादसे में लगी चोट की वजह से उनकी दाहिनी आँख भी चली गई और दूसरे पैर की सभी उँगलियों को भी काटना पड़ गया.
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जब ज़ख़्म ठीक हुए, तब रहमतुल्लाह अपने बेटे को मेडिकल वीज़ा पर दिल्ली लेकर आए, जहाँ अमानुल्लाह को कृत्रिम पैर लगाए गए और उनकी नाक की प्लास्टिक सर्जरी भी हुई. सफल सर्जरी के बाद दोनों वतन वापसी की तैयारी कर रहे थे. लेकिन तब तक अफ़ग़ानिस्तान के हालात बिगड़ गए और पूरा देश हिंसा की चपेट में आ गया.
लाजपत नगर के एक छोटे से घर में किराए पर रहने वाले रहमतुल्लाह के पास न तो किराया चुकाने के पैसे हैं और ना ही अपने दुभाषिए को देने के लिए ही कुछ बचा है. ये लाजपत नगर में सालों से रह रहे दूसरे अफ़ग़ान नागरिकों की तरह हिंदी नहीं बोल पाते हैं क्योंकि वो हमेशा से ही अपने गाँव में ही रहे हैं. इसी वजह से उनकी शिक्षा भी नहीं हुई और वो लिख पढ़ भी नहीं सकते.
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बीबीसी से बातचीत में रहमतुल्लाह कहते हैं, "जब मेरा बेटा ईरान गया तो हम ख़ुश हो गए थे कि चलो अब वो कुछ कमा कर हमें भी भेजेगा और अपनी शादी का इंतज़ाम भी कर लेगा. अमानुल्लाह को एक प्लास्टिक की फ़ैक्टरी में काम मिल गया. लेकिन एक दिन वो फिसलकर बड़ी मशीन में गिर गया. हमने तो उम्मीद छोड़ दी थी. ख़ुदा ने बचा लिया."
अमानुल्लाह हादसे के बाद बुरी तरह ज़ख़्मी हुए और उनका 15 महीनों तक ईरान में ही इलाज चला.
गांव में परिवार कर रहा है इंतज़ार
रहमतुल्लाह कहते हैं, "मैंने 18 महीनों से कोई काम नहीं किया है. अपने बेटे के साथ ही हूँ. जो पैसे बचाए थे, उनसे और कुछ क़र्ज़ में लिए पैसों से इसका इलाज करवाया. कुछ बचे हुए पैसों को लेकर दिल्ली आए ताकि कृत्रिम पैर लग जाएँ. काम हो गया. लेकिन हम फँस गए हैं."
अमानुल्लाह ख़ुद कोई काम करने की स्थिति में नहीं हैं और उनके पिता ही उन्हें नहलाने, कपड़े पहनाने और खाना खिलाने का काम करते हैं. अब इनके सामने परेशानी ये है कि इनके परिवार के बाक़ी के लोग उनके गाँव में उनका इंतज़ार कर रहे हैं.
रहमतुल्लाह बताते हैं कि घर पर भी उनकी पत्नी और बच्चों के लिए अब पैसे नहीं बचे हैं. वो कहते हैं कि बस जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि अफ़ग़ानिस्तान में सब कुछ अचानक ही हो गया. वो दुआ कर रहे हैं कि भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच उड़ानें जल्द शुरू हो जाएँ ताकि वो घर लौट सकें.
तालिबान की सरकार ने भारत से उड़ानों को शुरू करने का आग्रह किया है. लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अपनी औपचारिक 'प्रेस ब्रीफ़िंग' में स्पष्ट किया कि अफ़ग़ानिस्तान में हालात अभी भी चिंताजनक बने हुए हैं. इसलिए तत्काल दोनों देशों के बीच उड़ानों को बहाल करना मुमकिन नहीं है.
भारत भी अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर नज़र बनाए हुए है क्योंकि अभी तक कई देश ऐसे हैं जिन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं दी है.
पिछले महीने तालिबान की सरकार में नागरिक उड्डयन और यातायात मंत्री हमीदुल्लाह अख़ुंदज़ादा ने भारत के सिविल एविएशन महानिदेशक अरुण कुमार को चिठ्ठी लिखी और काबुल से उड़ानों को फिर से चालू करने का अनुरोध किया. लेकिन भारत के नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि ये नीतिगत फ़ैसला है जिसमें कई पहलुओं को देखने की ज़रूरत है.
मोहिउद्दीन की भी मिलती-जुलती कहानी
अफ़ग़ानिस्तान से मोहिउद्दीन भी अपनी पत्नी को लेकर दिल्ली इलाज के लिए आए हैं. वो भी बैसाखी के सहारे ही हैं क्योंकि बम विस्फोट की चपेट में आने के कारण उनके दाहिने पैर को काटना पड़ गया था. मोहिउद्दीन कहते हैं कि उनकी पत्नी के दिल का ऑपरेशन हो चुका है और वो भी वापस लौटने ही वाले थे.
वो कहते हैं, "मेरे बच्चे वहाँ परेशान हैं. वो पूछते हैं अम्मी, अब्बू आप लोग कब आएँगे? वो वहाँ परेशान हैं. हम यहाँ बेबस हैं. कैसे अपने घर जाएँ? समझ में नहीं आ रहा है."
दिल्ली में इलाज कराने आए अफ़ग़ान नागरिकों की तादात 675 के आसपास है. ये आंकड़ा इसलिए सामने आया क्योंकि इन सभी लोगों ने अफ़ग़ानिस्तान के दूतावास से जब मदद मांगी थी, तो एक सूची वहाँ दी गई, जिसमें इतने लोगों के नाम हैं.
इनमें से ज़्यादातर लोग लगभग हर रोज़ अफ़ग़ानिस्तान के दूतावास का चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि वहाँ से उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिल रहा है. जलाल ख़ान सिनुज़ादा भी इनमें से एक हैं जो अफ़ग़ानिस्तान लौटने के लिए भारतीय विदेश मंत्रालय और अफ़ग़ानिस्तान के दूतावास के चक्कर लगा रहे हैं.
उड़ान बंद होने से दिक़्क़तें
बीबीसी से बात करते हुए जलाल ख़ान ने बताया कि दूतावास ने उन सबसे उनके इलाज के दस्तावेज़ मांगे. वो कहते हैं कि एक महीने पहले ही उन्होंने सारे काग़ज़ात जमा कर दिए थे, लेकिन कोई कुछ नहीं कर रहा है.
वो कहते हैं, "अगर भारत से काबुल की उड़ानें बंद हैं तो हमें ईरान के रास्ते या फिर पकिस्तान के रास्ते वापस अपने वतन लौटने में मदद मिलनी चाहिए. हम भारत के विदश मंत्रालय और अपने राजदूत से मदद की गुहार लगा रहे हैं. हमारे राजदूत को ही पहल करनी चाहिए. उन्हें चाहिए कि भारत के विदेश मंत्रालय से बातचीत कर हमें या तो ईरान भिजवा दें या फिर सड़क के रास्ते पाकिस्तान. हम वहाँ से अपने वतन लौट सकते हैं."
कैस यूसुफ़ज़ई को ब्रेन ट्यूमर है. वो अकेले ही इलाज के लिए दिल्ली आए थे. उनकी कीमोथेरपी हो चुकी है और वो भी अपने परिवार के पास लौटने के लिए बेचैन हो रहे हैं. उनका कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान के हालात ऐसे हो गए हैं कि उन्हें अपने परिवार की अब पहले से ज़्यादा चिंता हो रही है.
इलाज कराने आए इन सभी 675 अफ़ग़ान नागरिकों की हालत परेशानी वाली इसलिए है क्योंकि इनके पास पैसे ख़त्म हो गए हैं और उनके परिवार के लोग उन्हें वहाँ से पैसे भेजें, इसकी सुविधा अब नहीं है. इसलिए ये सभी लोग दिल्ली में पहले से रह रहे अफ़ग़ान नागरिकों से मदद मांग रहे हैं.
यूएन से भी नहीं मिल रही है मदद
दिल्ली के अफ़ग़ान समाज के प्रमुख अहमद ज़िया ग़नी का कहना है कि जो अफ़ग़ान पहले से रह रहे हैं उनकी हालत भी दयनीय ही है क्योंकि शरणार्थियों के लिए नियुक्त किए गए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त यानी 'यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फ़ॉर रिफ़्यूजीज़' के कार्यालय से किसी को मदद नहीं मिल रही है.
दिल्ली स्थित अफ़ग़ानिस्तान के दूतावास में काम पहले की तरह से शुरू हो गया है. तालिबान की सरकार ने दोबारा पासपोर्ट जारी करने की सुविधाएँ भी शुरू कर दी हैं. लेकिन अभी तक भारत ने नई सरकार को मान्यता नहीं दी है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया है कि इस काम में जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए.
ये बात भी सही है कि अगर भारत में अफ़ग़ान नागरिक फँसे हुए हैं तो वहाँ भी बहुत सारे भारतीय नागरिक फँसे हुए हैं, जो दोनों देशों के बीच उड़ानों के शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हैं. भारत में रह रहे अफ़ग़ान नागरिकों के पास विकल्प है कि वो पाकिस्तान के रास्ते अपने देश लौट सकते हैं.
लेकिन भारत के जो नागरिक अफ़ग़ानिस्तान में फँसे हुए हैं, उनके पास पाकिस्तान के रास्ते स्वदेश लौटने का विकल्प भी नहीं है और ईरान भी मौजूदा हालात में वहाँ फँसे भारतीय नागरिकों को वीज़ा नहीं दे रहा है.
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