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Sitaram Yechury: देश की राजनीति में नया गठबंधन बनाने में येचुरी ने कब-कब निभाई बड़ी भूमिका?

Sitaram Yechury importance in politics: भारत में आगे भी जब गठबंधन की राजनीति की बात होगी तो सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी की चर्चा के बिना यह बहस अधूरी रहेगी। बीते लगभग तीन दशकों से उन्होंने खुद को एक ऐसे सियासी रणनीतिकार के रूप में पेश किया था, जो अलग-अलग विचारधाराओं का गठजोड़ बनाने में भी माहिर हो चुके थे।

नब्बे के दशक से ही येचुरी गठबंधन की राजनीति के पैरोकार बनकर उभरने लगे और उनका यह सिलसिला मौजूदा राजनीति तक भी नजर आता रहा। गठबंधन की राजनीति की ट्रेनिंग उन्हें अपने गुरु और पूर्व सीपीएम महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत से मिली थी।

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1996 से गठबंधन की राजनीति में निभाई भूमिका
अगर 1996 में सुरजीत ने एचडी देवगौड़ा की अगुवाई वाली यूनाइटेड फ्रंट सरकार बनाने में महत्वपूर्ण रोल निभाया तो उनके विद्यार्थी येजुरी उसी सरकार के लिए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार (न्यूनतम साझा कार्यक्रम) करने के लिए पूरी लगन से काम किया।

यूपीए-1 की सरकार बनाने में भी रहा बड़ा रोल
आगे चलकर जब 2004 में यूपीए-1 की सरकार बनी तो भी उन्होंने यह रोल बखूबी निभाया। बीजेपी को सत्ता से दूर रखने और मनमोहन सिंह की अगुवाई में यूपीए-1 की सरकार बनाने में येचुरी एक बड़े किरदार के रूप में का कर रहे थे।

भाजपा-विरोधी विपक्ष की एकजुटता के लिए करते रहे कोशिश
2019 में लोकसभा चुनाव से पहले सीताराम येचुरी ने बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के खिलाफ तमाम विपक्षी दलों को एकजुट करने की भरपूर कोशशिश की। हालांकि, तब इसमें उन्हें बहुत ज्यादा कामयाबी तो नहीं मिली, लेकिन जब 2023 में के चंद्रशेखर राव, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी की पहल पर विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की पहल शुरू हुई तो येचुरी फिर से ऐक्शन में आ गए।

इंडिया ब्लॉक बनाने में भी सक्रिय रहे सीताराम येचुरी
करीब दो दर्जन से ज्यादा विपक्षी दलों को इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (INDIA) की छतरी में एकजुट करने में सीताराम येचुरी विशेष रूप से सक्रिय रहे। उनकी खासियत यह थी कि वे अलग-अलग विचारों वाले नेताओं के अहं को मिटाकर खास लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एकसाथ लाने में सफल हो जाते थे।

इंदिरा का विरोध किया, सोनिया- राहुल के खास बन गए
विपरीत सियासी धाराओं को एक सूत्र में पिरोने का उनका तजुर्बा ही था कि कभी छात्र नेता के तौर पर आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी जैसे शख्सियत को चुनौती देने वाले ये लेफ्ट का नेता अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दशकों में उनकी बहू सोनिया गांधी और पोते राहुल गांधी के राइट हैंड बन चुके थे।

बंगाल में कांग्रेस से की दोस्ती, केरल में जारी रही दुश्मनी
सीपीएम महासचिव के तौर पर येचुरी ही थे जिनकी वजह से केरल में कांग्रेस से कट्टर दुश्मनी निभाने वाली उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल में मजबूत दोस्त बन गई। उनकी पार्टी की केरल यूनिट ने इसका काफी विरोध भी किया, लेकिन येचुरी उन्हें मनाने में कामयाब हो गए।

पहले एंटी-कांग्रेस फोर्स की बढ़ाई ताकत, फिर बीजेपी-विरोध वाली राजनीति को दी हवा
एक जमाने में कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए जिस येचुरी ने विभिन्न जनता दलों को एकजुट करने का काम किया था, अब वही एंटी-बीजेपी फोर्स तैयार करने के लिए उन्हीं जनता ताकतों को कांग्रेस के हाथ में जाने की जमीन तैयार करने में लगे रहे।

ज्योति बसु के 'ऐतिहासिक भूल' में भी निभाई भूमिका
1996 की बात है। गठबंधन सरकार में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री और सीपीएम दिग्गज ज्योति बसु को सहयोगियों की ओर से प्रधानमंत्री बनने का ऑफर था। लेकिन, इसके खिलाफ येचुरी ने तब अपने नेता प्रकाश करात का साथ दिया। सीपीएम पहली बार और शायद आखिरी बार चूक गई। बाद में बसु ने खुद ही उस ऑफर को ठुकराने को 'ऐतिहासिक भूल' बताया था।

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येचुरी सीपीएम के उस नेता में भी गिन जाएंगे, जिनकी सहयोगियों के साथ तो अच्छी बनती ही थी, बीजेपी के नेताओं तक भी उनकी अच्छी पहुंच थी। एक सीपीएम नेता के लिए यह बहुत ही विशेष गुण माना जा सकता है। 2022 में ऑल पार्टी मीटिंग की एक तस्वीर बहुत वायरल भी हुई थी, जिसमें वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हंसते हुए नजर आ रहे थे।

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