बिहार में बरसों बाद नक्सलियों के हमले पर सरकार की चुप्पी
बिहार सरकार के अपराध और नक्सलवाद पर अंकुश पाने के दावों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.
पिछले शनिवार को एक तरफ़ बिहार के मधुबनी ज़िले में एक युवा पत्रकार की हत्या हुई, वहीं दूसरी ओर गया में कथित नक्सलियों ने चार लोगों की फांसी पर लटका कर हत्या कर दी.

इससे पहले फ़रवरी, 2010 में जमुई के फुलवरिया गाँव में ऐसी घटना हुई थी. तब पूरे गाँव को घेरकर गोलियां बरसाई गई थीं, जिसमें दो महिला, एक बच्चे समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी.
शनिवार को बिहार की राजधानी पटना से करीब सौ किलोमीटर दक्षिण में स्थित गया में प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) यानी नक्सलियों ने एक ही परिवार के दो भाई और उनकी पत्नियों को फांसी पर लटका दिया. 13 नवंबर शाम की यह घटना ज़िले के डुमरिया थाना के सोनबार गाँव के बघबोआ टोला की है.
बिहार की सामाजिक और राजनीतिक हलचलों पर नज़र रखने वाले कई लोगों का मानना है कि बिहार में नक्सली वारदात के इतिहास में यह पहली घटना है, जिसमें पुरुष ही नहीं महिलाओं को भी फांसी पर लटका दिया गया.
नक्सलियों की लिखी बताई जा रही एक चिट्ठी में कहा गया है ये हत्याएँ मुखबिरी की सज़ा देने के लिए की गईं, जिसकी वजह से इस साल 16 मार्च को चार नक्सलियों की मौत हुई थी.
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तीन घंटे गाँव में रहे नक्सली
स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के मुताबिक, शनिवार की रात लगभग तीन दर्जन से अधिक की संख्या में नक्सलियों का हथियारबंद दस्ता गाँव पहुँचा और अनुसूचित जनजाति समाज से आने वाले सरयू सिंह भोक्ता के घर को घेर लिया.
इसके बाद सरयू सिंह भोक्ता के दो बेटों सत्येन्द्र सिंह भोक्ता और महेंद्र सिंह भोक्ता समेत इनकी पत्नियों सुनीता देवी और मनोरमा देवी को अपने कब्ज़े में ले लिया.
पहले दस्ते में शामिल नक्सलियों ने लाठी-डंडे से पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और फिर चारों को दम घुट जाने तक फांसी पर लटकाये रखा.
घटनास्थल से जाने के पूर्व दस्ते ने सरयू सिंह भोक्ता के घर को डायनामाइट से ब्लास्ट कर उड़ा दिया. स्थानीय लोगों के अनुसार नक्सली गाँव में शाम करीब सात बजे आये और रात दस बजे तक वहां रहे.
गाँव में नक्सली लगभग तीन घंटे तक रहे लेकिन ज़िला पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी. स्थानीय मीडिया में इसे जन अदालत लगाकर सज़ा देने की बात भी कही जा रही है.
घटना को अंज़ाम देने के बाद दस्ता इसी थाने के कोंकड़ा गाँव निवासी समोद सिंह भोक्ता की तलाश में पहुंचे. वहां दस्ते ने समोद सिंह भोक्ता के घर के सामने मिल में आग लगा दी और उनके परिजनों को घरों से निकालकर ताला लगा दिया और तब तक घर में घुसने से मना कर दिया, जब तक कि वे समोद को उनके हवाले नहीं कर देते.
स्थानीय मीडिया में ख़बरें हैं कि समोद और उनका परिवार कुछ महीने पहले अपने परिवार समेत गाँव से जा चुके हैं.
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'पुलिस मुख़बिरी के शक़ में हुई घटना'
गया के वरीय पुलिस अधीक्षक आदित्य कुमार ने बताया, "इस घटना को पुलिस मुखबिरी के शक़ में अंजाम दिया गया है. हालाँकि ऐसी कोई बात नहीं थी. इसी साल फ़रवरी माह में इसी घर के अंदर पुलिस एनकाउंटर में माओवादियों के चार ज़ोनल कमांडर मारे गए थे.''
''शनिवार की घटना को प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) संगठन से जुड़े विवेक, इंदल आदि के नेतृत्व में अंजाम दिया गया है. सभी सरयू सिंह भोक्ता को तलाश रहे थे. मामले को लेकर 17 लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है. अभियुक्तों की खोजबीन की जा रही है. जन-अदालत लगने की बात बेबुनियाद है."
मृतक सत्येन्द्र और महेंद्र भोक्ता दोनों के पाँच बच्चे हैं. नक्सलियों ने पीड़ितों के जीवित परिजनों और बच्चों को गाँव छोड़ कर कहीं और चले जाने की धमकी दी है और यहाँ तक कहा है कि अगर ऐसा नहीं किया तो इनका हश्र भी कुछ ऐसा ही होगा.
पीड़ित परिवार छोटे किसान हैं. जंगल में उनके दो बीघा ज़मीन है, जिसमें धान पक चुके हैं. लेकिन नक्सलियों ने जाते-जाते फसल नहीं काटने का फरमान भी जारी कर दिया. साथ ही, घटनास्थल पर वे सात पन्ने का धमकी भरा परचा भी चिपका गए हैं.
बीते 11 साल के बाद हुई ऐसी जघन्य घटना के दो दिन बाद भी न तो सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया आई है और न ही विपक्षी दलों की ओर से इस पर कुछ कहा गया है. दोनों तरफ़ चुप्पी देखने को मिल रही है.
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