Shiv Sena news: क्यों चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे को दी शिवसेना की कमान ? जानिए

चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र में शिवसेना की कमान और निशान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट को बहुत ही तथ्यात्मक आधार पर दिया है। आयोग ने दो चुनावों में पार्टी को मिले एक-एक वोट का विश्लेषण किया है।

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शिवसेना का करीब 8 महीने पुराना विवाद शुक्रवार को चुनाव आयोग ने हल कर दिया है। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाले गुट को बहुत बड़ी जीत मिली है। आयोग ने शिवसेना पार्टी और उसके चुनाव निशान पर उन्हीं का अधिकार माना है। जबकि, पूर्व मुख्यमंत्री और बालासाहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे को बहुत बड़ा रानीतिक झटका लगा है। उनके पिता की बनाई पार्टी ही अब हाथ से निकल चुकी है और उसकी कमान आधिकारिक रूप से एकनाथ शिंदे के हाथों में आ गई है। बीएमसी और अगले लोकसभा चुनावों से पहले यह ना केवल उद्धव गुट के लिए मायूसी वाला फैसला है, बल्कि महाविकास अघाड़ी की राजनीति का कद भी घटा है। आइए जानते हैं कि चुनाव आयोग ने आखिर किस आधार पर शिंदे के दावों को ही सही माना है और उद्धव की दलीलों की हवा निकाल दी है।

शिवसेना और धनुष-तीर निशान शिंदे गुट का- चुनाव आयोग

शिवसेना और धनुष-तीर निशान शिंदे गुट का- चुनाव आयोग

भारतीय चुनाव आयोग ने शुक्रवार को अपने ऐतिहासिक फैसले में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना के पूर्व सुप्रीमो उद्धव ठाकरे को जोरदार झटका दिया है। चुनाव आयोग ने आदेश दिया है कि 'शिवसेना' नाम और पार्टी के 'धनुष और तीर' वाला निशान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट के पास रहेगा। चुनाव आयोग ने पाया है कि 'शिवसेना का मौजूदा संविधान अलोकतांत्रिक है। इसे अलोकतांत्रिक तरीके से बिना चुनाव कराए एक मंडली को पार्टी पदाधिकारियों के रूप में अलोकतांत्रिक तरीके से नियुक्त करने के लिए विकृत कर दिया गया है। इस तरह की पार्टी संरचना भरोसा प्राप्त करने में विफल रहती है।'

चुनाव आयोग ने शिंदे को क्यों दी शिवसेना की कमान ?

चुनाव आयोग ने शिंदे को क्यों दी शिवसेना की कमान ?

चुनाव आयोग ने पाया है कि 'शिंदे गुट को समर्थन देने वाले 40 एमएलए को शिवसेना को मिले कुल 47,82,440 वोट में से 36,57,327 वोट मिले हैं, जो कि जीतने वाले 55 एमएलए को मिले वोटों के 76% हैं। उसके विपरीत ठाकरे गुट द्वारा जिन 15 एमएलए के समर्थन का दावा किया गया है, उन्हें 11,25,113 वोट मिले हैं। 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना के पक्ष में कुल 90,49,789 (हारने वाले उम्मीदवारों को मिले वोट को मिलाकर) वोट पड़े थे। याचिकाकर्ता को समर्थन करने वाले 40 विधायकों द्वारा डाले गए वोट 40% होते हैं, जबकि प्रतिवादी का समर्थन करने वाले 15 विधायकों द्वारा डाले गए वोट कुल वोटों के 12% होते हैं।'

ऐसे उद्धव के पिता की शिवसेना के सेनापति बने शिंदे

ऐसे उद्धव के पिता की शिवसेना के सेनापति बने शिंदे

वहीं चुनाव आयोग ने पाया कि मुख्यमंत्री एकनाथ 'शिंदे गुट को समर्थन दे रहे 13 सांसदों को लोकसभा चुनाव 2019 में शिवसेना के 18 सांसदों को मिले कुल 1,02,45143 वोट में से 74,88,634 वोट प्राप्त हुए थे, जो कि 73% है। जबकि, ठाकरे गुट को समर्थन दे रहे 5 सांसदों को 18 सांसदों के पक्ष में पड़े कुल वोट में से सिर्फ 27,56,509 वोट प्राप्त हुए थे, जो कि महज 27% है।' यानि चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे को उद्धव के पिता बाल ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना का सेनापति मानने के लिए लोकतंत्र के सबसे मजबूत आधार यानि मताधिकार को ही ठोस सबूत माना है।

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    'पार्टी एक जागीर की तरह हो गई'

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    चुनाव आयोग ने यह भी पाया है कि शिवसेना के मूल संविधान के अलोकतांत्रिक मानदंडों को, जिसे 1999 में आयोग ने स्वीकार नहीं किया था, उसे फिर से गुप्त तरीके से वापस ले आया गया है, जिससे पार्टी एक जागीर की तरह हो गई है। चुनाव आयोग ने यह भी पाया है कि 2018 में शिवसेना का जो संविधान संशोधित किया गया था, उसे भी चुनाव आयोग को नहीं दिया गया। आयोग के अनुरोध पर दिवंगत बालासाहेब ठाकरे की ओर से 1999 के पार्टी संविधान में लोकतांत्रिक मानदंडों को शामिल करने के कार्य को संशोधनों से फिर पहले की तरह कर दिया गया था।

    राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की सलाह

    अपने ऐतिहासिक फैसले में चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को सलाह दी है कि लोकतांत्रिक प्रकृति और सिद्धांतों को आंतरिक पार्टी लोकतंत्र में भी दिखाए और अपनी वेबसाइट पर इसके कामकाज के पहलुओं जैसे कि संगठन का ब्योरा, चुनाव का आयोजन, संविधान की कॉपी और पदाधिकारियों की लिस्ट भी लगातार जाहिर करे। चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों के संविधान में पार्टी पदाधिकारियों के लिए स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव की व्यवस्था उपलब्ध हो और पार्टी के आंतरिक मतभेदों को सुलझाने के लिए भी एक स्वतंत्र और निष्पक्ष समाधान की व्यवस्था हो। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि यह प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें संशोधन करना मुश्किल हो और तभी ही संशोधन हो सके जब संगठन के सदस्यों की बड़ी संख्या उसके लिए तैयार हो।


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