Shibu Soren को क्यों मिली 'दिशोम गुरु' की पदवी? जानिए नाम के साथ कैसे जुड़ गया यह उपनाम
Shibu Soren News: झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन ने पांच दशक से ज्यादा लंबे राजनीतिक करियर में आदिवासियों के अधिकार की लड़ाई हर मोर्चे पर लड़ी। वह प्रदेश के सीएम रहने के साथ ही केंद्रीय मंत्री भी रहे। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के लिए चुने गए। लंबी बीमारी के बाद उनका निधन दिल्ली के एक अस्पताल में हो गया। उन्हें झारखंड ही नहीं पूरे देश में 'दिशोम गुरु' कहा जाता है। इसके पीछे उनका लंबा राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष रहा है।
शिबू सोरेन ने सिर्फ 13 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था। उनके पिता महाजनी व्यवस्था और सूदखोरी की वजह से मारे गए थे। पिता की हत्या ने उन्हें महाजनी व्यवस्था के उन्मूलन के लिए संघर्ष करने को प्रेरित किया और इसी उद्देश्य से उन्होंने जेएमएम की स्थापना की थी। बाद में बिहार से अलग झारखंड राज्य बनाने के लिए आंदोलन करने वाले अग्रणी नेताओं में भी रहे। उन्होंने 3 बार प्रदेश के सीएम पद की जिम्मेदारी भी संभाली।

Shibu Soren को कैसे मिला 'दिशोम गुरु' नाम
शिबू सोरेन के लिए उनके समर्थक दिशोम गुरु और गुरुजी जैसे नाम का इस्तेमाल करते हैं। 1970 के दशक से ही उन्होंने लगातार आदिवासी कल्याण के लिए काम किया और 70 के दशक में ही उन्हें समर्थकों ने दिशोम गुरु की उपाधि दी थी। यह आदिवासी समुदाय के उत्थान के लिए उनके संघर्ष को देखते हुए उन्हें आम जनता से मिला सम्मान है। यह नाम संथाली भाषा से लिया गया है। दिशोम का मतलब देश या समुदाय होता है और गुरु का मतलब मार्गदर्शक या नेता होता है। उन्हें संथाल परगना का निर्विवाद सबसे बड़ा नेता माना जाता है और इसलिए उन्हें दिशोम गुरु का नाम दिया गया। बाद में उन्हें सभी राजनीतिक दलों के नेता भी इसी नाम से पुकारने लगे।
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अलग झारखंड राज्य के लिए चलाया था आंदोलन
अलग झारखंड राज्य की मांग लंबे समय से हो रही थी, लेकिन 90 के आखिरी दशक में इस आंदोलन ने जोर पकड़ा। इसी संघर्ष का नतीजा है कि 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य की स्थापना हो सकी। अलग राज्य बनने के बाद शिबू सोरेन ने तीन बार मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली और फिलहाल उनके बेटे हेमंत सोरेन प्रदेश के सीएम हैं। इसके अलावा , उनकी बहू कल्पना सोरेन भी विधायक हैं। सोरेन परिवार की बड़ी बहू सीता सोरेन ने भी भाजपा के टिकट से पिछले विधानसभा चुनाव में इलेक्शन लड़ा था, लेकिन जीत नहीं पाईं।
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