Refuge In India: शरण देना भारत की पुरानी परंपरा, जानें हसीना से पहले कौन-कौनसे विश्व के नेता ले चुके हैं आसरा?
Bangladesh Crisis: बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना हिंसक प्रदर्शन के बीच इस्तीफा देकर भारत की शरण में हैं। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि अंतरराष्ट्रीय विरोध को देखते हुए भारत उन्हें लंबे समय तक अपने यहां रखने की संभावना के लिए तैयारी कर रहा है।
हसीना की प्लानिंग भारत से लंदन पहुंचकर शरण लेने की थी। लेकिन, कुछ 'अनिश्चितताओं' के कारण योजना में अड़चन आ गई। अगले कुछ दिनों तक उनके भारत से बाहर जाने की संभावना नहीं है। यह पहली बार नहीं है, जब भारत ने किसी नेता को शरण दी हो।

राजनीतिक नेताओं और अपने देश में उत्पीड़न का सामना कर रहे व्यक्तियों को शरण देने की भारत की पुरानी परंपरा है। दशकों से, भारत ने पड़ोसी देशों के विभिन्न नेताओं के लिए अपने दरवाजे खोले हैं, उन्हें जरूरत के समय शरण और सहायता प्रदान की है। आइए जानते हैं इस लिस्ट में हसीना से पहले कौन-कौन सी शख्सियतें शामिल?
दलाई लामा (1959)
तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने भारत में पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में 30 मार्च, 1959 को शरण दी थी। चीनी सेना द्वारा तिब्बत पर कब्जा किए जाने के बाद लामा को शरण की जरूरत पडी। उन्हें हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में शरण दी गई, जहां वे आज भी रहते हैं।
4 अप्रैल, 1959 को, नेहरू ने सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत की नीति तीन कारकों द्वारा संचालित थी। भारत की सुरक्षा और अखंडता का संरक्षण, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने की भारत की इच्छा।
शेख हसीना (1981)
15 अगस्त, 1975 में शेख हसीना के पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की बांग्लादेश में हत्या कर दी गई। उस वक्त रहमान देश के प्रधानमंत्री थे। रहमान की उनके परिवार के 18 सदस्यों के साथ हत्या कर दी गई थी। इस नरसंहार के कारण बांग्लादेश में भारी राजनीतिक उथल-पुथल मच गई और कई सालों तक देश पर सैन्य प्रतिष्ठान का शासन रहा। 1981 में शेख हसीना को सुरक्षा के लिए शरण की जरूरत पडी। भारत ने शेख हसीना को शरण दी, जिन्होंने 1981 तक अपने बच्चों के साथ दिल्ली के पंडारा रोड में छह साल निर्वासन में बिताए।
मालदीव के मोहम्मद नशीद (2013)
मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने 2013 में माले में भारतीय उच्चायोग में शरण मांगी थी, जब मालदीव की एक अदालत ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था।
मालदीव के अहमद अदीब अब्दुल गफूर (2019)
मालदीव के पूर्व उपराष्ट्रपति अहमद अदीब अब्दुल गफूर ने भारत में राजनीतिक शरण मांगी थी, लेकिन भारतीय अधिकारियों द्वारा उन्हें वापस भेजे जाने के बाद 2019 में मालदीव पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। गफूर तमिलनाडु में नौ चालक दल के सदस्यों के साथ एक मालवाहक जहाज में पहुंचे थे। उन्हें जहाज से उतरने की अनुमति नहीं दी गई और विभिन्न केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जहाज पर उनसे पूछताछ की गई।
अफगानिस्तान के अब्दुल्ला अब्दुल्ला (2022)
अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुलह के लिए उच्च परिषद के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल्ला अब्दुल्ला को भारत में शरण दी गई थी। फरवरी 2022 में, अब्दुल्ला को अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा अस्थायी रूप से नजरबंद कर दिया गया था। 4 मई, 2022 को, उन्हें ईद-उल-फितर के दौरान अपने परिवार के साथ रहने के लिए भारत जाने की अनुमति दी गई और वे छह सप्ताह तक भारत में रहे।
श्रीलंका के वर्धराज पेरुमल (1989)
श्रीलंका के वर्धराज पेरुमल ने 1989 में भारत में शरण ली थी। वर्धराज ईलम पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (EPRLF) के नेता और श्रीलंका के उत्तर-पूर्वी प्रांत के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने 1989 में अपने प्रांत की स्वायत्तता की घोषणा की, जिसे श्रीलंकाई सरकार ने अस्वीकार कर दिया। जब श्रीलंकाई सेना ने उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की, तो वर्धराज पेरुमल और उनके सहयोगियों ने अपनी सुरक्षा के लिए भारत में शरण मांगी। भारत ने उन्हें और उनके करीब 200 समर्थकों को शरण दी, जिससे उनकी जान बच सकी। उनका शरण लेना श्रीलंका में तमिल संघर्ष और श्रीलंकाई सरकार के साथ उनकी असहमति का परिणाम था।












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