इमरजेंसी पर कांग्रेस के अंदर से ही उठी विद्रोह की आवाज, शशि थरूर ने साधा इंदिरा-संजय गांधी पर निशाना
Shashi Tharoor Slams Emergency: आपातकाल की कड़वी यादें एक बार फिर चर्चा में हैं, और इस बार आवाज खुद कांग्रेस के भीतर से उठी है। देश के वरिष्ठ नेता और कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर ने अपने हालिया लेख में 1975 में लगाए गए आपातकाल को 'भारतीय लोकतंत्र का सबसे भयावह दौर' करार दिया है। उन्होंने न सिर्फ उस समय के हालात का विश्लेषण किया, बल्कि इंदिरा गांधी सरकार द्वारा किए गए फैसलों की भी खुलकर आलोचना की है।
थरूर का यह लेख उस समय आया है जब वे पार्टी लाइन से हटकर केंद्र सरकार की नीतियों की तारीफ कर चुके हैं और कांग्रेस नेतृत्व के साथ उनके मतभेद साफ हो चुके हैं। उनके इस लेख से न सिर्फ राजनीतिक हलकों में हलचल है, बल्कि यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या यह कांग्रेस के अंदर आत्मचिंतन की शुरुआत है या फिर एक नई बहस की दस्तक?

आपातकाल पर लिखा विशेष लेख
कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने आपातकाल पर एक तीखा लेख लिखकर उस दौर में हुई ज्यादतियों और मानवाधिकार हनन को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि जून 1975 से मार्च 1977 तक चला आपातकाल भारत के लोकतंत्र पर एक काला धब्बा था, जहां आम लोगों की आजादी छीन ली गई थी और पूरे देश में डर का माहौल बन गया था।
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'1975 जैसा नहीं है आज का भारत'
थरूर ने अपने लेख में साफ किया कि आज का भारत 1975 वाला भारत नहीं है। उन्होंने कहा कि उस वक्त की सरकार ने तानाशाही रवैया अपनाया और सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर दिया था, लेकिन आज स्थितियां अलग हैं।
इंदिरा गांधी पर निशाना
थरूर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने आपातकाल को आंतरिक अस्थिरता और बाहरी खतरे का हवाला देकर सही ठहराया, लेकिन असल में इससे देश में अनुशासन के नाम पर डर और दमन का माहौल बना दिया गया।
मौलिक अधिकारों का हुआ हनन
लेख में उन्होंने बताया कि कैसे उस दौर में नागरिकों के मौलिक अधिकार जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने का हक और प्रेस की आजादी को खत्म कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट तक ने Habeas Corpus (न्यायिक हिरासत के अधिकार) को नकार दिया।
संजय गांधी की नीतियों पर तीखा हमला
थरूर ने संजय गांधी द्वारा चलाई गई नसबंदी मुहिम को 'अत्याचार का उदाहरण' बताया। उन्होंने लिखा कि गरीबों और ग्रामीण इलाकों में जबरन नसबंदी कराई गई, जो सत्ता के गलत इस्तेमाल की मिसाल है।
पत्रकार, कार्यकर्ता और विपक्षी नेता हुए थे बंद
थरूर ने लिखा कि उस समय पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी नेता जेल में डाल दिए गए थे। पूरे देश में भय और सेंसरशिप का माहौल था, और जो भी आवाज उठाता था, उसे दबा दिया जाता था।
न्यायपालिका भी आई थी दबाव में
उन्होंने यह भी बताया कि कैसे न्यायपालिका भी सरकार के दबाव में आ गई थी और संविधान की धारा को ताक पर रख दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी उस वक्त नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा नहीं की।
वर्तमान सरकार पर भी तंज
थरूर ने लेख में अप्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को बचाने के लिए प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता और सत्ता पर संतुलन जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब कोई सरकार खुद को सर्वोच्च मानने लगे और आलोचना से परहेज करने लगे, तो लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा हो जाता है।
प्रियंका गांधी ने किया टिप्पणी से किनारा
थरूर का यह लेख ऐसे समय आया है जब वे पार्टी लाइन से हटकर कई मुद्दों पर केंद्र सरकार की सराहना कर चुके हैं, जिससे कांग्रेस नेतृत्व के साथ उनके मतभेद साफ नजर आते हैं। ऐसे में जब कांग्रेस सांसद से इस लेख पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, "मैंने यह लेख नहीं पढ़ा है।"
#WATCH | Delhi | On Vadodara bridge collapse, Congress MP Priyanka Gandhi says, "It is extremely unfortunate... Such incidents should be thoroughly investigated."
On Congress MP Dr Shashi Tharoor's article on the Emergency, she says, "I have not read the article." pic.twitter.com/81z1pB1ICx
— ANI (@ANI) July 10, 2025
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