सुप्रिया सुले को शरद पवार ने किया आगे, अब क्या करेंगे अजित पवार?
शरद पवार ने पार्टी के दो कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को बनाने की घोषणा की है. क्या यह नया नेतृत्व महाविकास अघाड़ी और ख़ुद एनसीपी में स्वीकार्य होगा?
हर्षल आकुडे
बीबीसी संवाददाता, मराठी सेवा
राजनीतिक करियर पर एक नज़र
- शरद पवार ने 1960 में राजनीति शुरू की और छह दशकों तक महाराष्ट्र की राजनीति में धुरी बने रहे
- आपातकाल के बाद कांग्रेस में दो फाड़ हो गया और पवार 'रेड्डी कांग्रेस' के साथ चले गए
- जुलाई 1978 में उन्हें महाराष्ट्र के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिला
- साल 1986 में कांग्रेस में वापसी और 1988 में महाराष्ट्र के दूसरी बार मुख्यमंत्री बने
- साल 1993 में, पवार तीसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने
- 1999 में पवार ने सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया और कांग्रेस से अलग होकर 'राष्ट्रवादी कांग्रेस' बनाई
ना ना करते हुए आख़िरकार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष शरद पवार ने पार्टी की कमान नए नेतृत्व को सौंपने का एलान कर दिया है.
पिछले महीने ही शरद पवार के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े की घोषणा, नेताओं-कार्यकर्ताओं के विरोध और बाद में वापसी का नाटकीय घटनाक्रम हुआ था.
अब एनसीपी की 24वीं वर्षगांठ के मौक़े पर हुई घोषणा उसी नाटकीय घटनाक्रम का अगला पड़ाव है.
वर्षगांठ समारोह में शरद पवार ने सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की घोषणा की.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस नियुक्ति से शरद पवार का अगला उत्तराधिकारी कौन होगा, इस सवाल का जवाब मिल गया है.
हालांकि अजित पवार ने इस फ़ैसले पर औपचारिक बधाई दी है.
लेकिन ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस फ़ैसले के बाद पार्टी की राजनीति किस दिशा में जाएगी और चार साल पहले शरद पवार द्वारा गठित महाविकास अघाड़ी में अन्य दलों के नेता नए नेतृत्व को किस तरह लेते हैं.
बीबीसी मराठी ने राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों से बात कर इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है.
सुप्रिया सुले को बड़ी ज़िम्मेदारी
26 अप्रैल 2023 को मुंबई में एनसीपी यूथ कांग्रेस के एक कार्यक्रम में पवार ने कहा था,
“रोटी को पलटना है. अगर पलटी नहीं जाएगी तो जल जाएगी. अब रोटी पलटने का समय आ गया है, अब और देर नहीं.”
असल में उन्होंने पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन के बारे में संकेत दिया था.
उनके इस बयान की कई व्याख्याएं की गईं लेकिन अगले एक हफ़्ते के अंदर एक नाटकीय घटनाक्रम सामने आएगा ऐसा किसी ने सोचा नहीं था.
बीते दो मई को शरद पवार की राजनीतिक आत्मकथा 'लोक मांझे सांगाती’ के विमोचन समारोह में शरद पवार ने अचानक अध्यक्ष पद छोड़ने का एलान कर दिया.
उसके बाद जो नाटकीय घटनाक्रम शुरू हुआ, उसमें तीन चार दिनों तक नेता और कार्यकर्ता उनके इस्तीफ़े के ख़िलाफ़, धरना प्रदर्शन और भूख हड़ताल कर दिया. इसके बाद शरद पवार ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने का फैसला वापस ले लिया.
पवार ने कहा, “मैं कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए एनसीपी के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने का अपना फ़ैसला वापस ले रहा हूँ. अब मैं नया नेतृत्व बनाने पर ध्यान दूंगा. मैं पार्टी में संगठनात्मक बदलाव करूंगा. जो संगठन में किसी भी पद या ज़िम्मेदारी को संभाल सकते हैं, उन्हें नई ज़िम्मेदारी सौंपने का काम करूंगा."
इसके एक महीने के भीतर ही शरद पवार ने अपना उत्तराधिकारी चुन लिया. पार्टी के वार्षिकोत्सव कार्यक्रम में पवार ने इसकी विधिवत घोषणा भी कर दी.
प्रफुल्ल पटेल को राज्यसभा के साथ-साथ मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, झारखंड और गोवा की ज़िम्मेदारी दी गई.
जबकि सुप्रिया सुले को महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब के अलावा महिला, युवा और लोकसभा व केंद्रीय चुनाव अधिकार समिति की ज़िम्मेदारी दी गई है.
इसका मतलब यह है कि महाराष्ट्र में एनसीपी सुप्रिया सुले के नेतृत्व में काम करेगी.
मौजूदा राजनीतिक समीकरण को देखते हुए इस बदलाव का असर सिर्फ़ एनसीपी तक ही सीमित नहीं रहेगा. बल्कि महाविकास अघाड़ी में अन्य पार्टियों के लिए भी यह फ़ैसला अहम होने वाला है.
'अगर अजित पवार नहीं माने..'
शरद पवार द्वारा सुले और पटेल के नामों की घोषणा के कुछ देर बाद अजित पवार ने ट्विटर पर उन्हें बधाई दी.
लेकिन जब यह घोषणा की जा रही थी, तब अजित पवार गर्दन झुकाए बैठे थे, इससे जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुए.
लोगों ने कयास लगाना शुरू किया कि अब अजित पवार क्या करेंगे?
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मृणालिनी नानिवडेकर के अनुसार, “अगर शरद पवार का फ़ैसला अजीत पवार को पूरे दिल से स्वीकार्य है, तो एनसीपी की भविष्य की गति और ताक़त में कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा. लेकिन अगर अजित पवार इस फ़ैसले से सहमत नहीं होते हैं तो इसका एनसीपी के प्रदर्शन पर बड़ा असर पड़ सकता है.”
नानिवडेकर कहते हैं, “अजित पवार ने बधाई भले दी है लेकिन फिर भी यह पता नहीं चल पाया है कि उनकी असल प्रतिक्रिया क्या है. अगर उनके दिमाग़ में कुछ और चल रहा है, तो पहले से ही राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहे महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव से पहले एक अलग घटनाक्रम देखने को मिल सकता है.”
नानिवडेकर कहती हैं, “महाविकास अघाड़ी गठबंधन एनसीपी की अगुआई में काम कर रहा है. अगर उनमें बगावत होती है तो गठबंधन में उनकी स्थिति कमज़ोर हो सकती है. शायद महाविकास गठबंधन टूट जाए या गठबंधन बना रहे तो भी उन्हें इसमें गौण स्थान लेना पड़ सकता है.''
उन्होंने कहा, "इसे उद्धव ठाकरे द्वारा अपनी पार्टी में बगावत के बाद महाविकास अघाड़ी में बैकफुट पर जाने के उदाहरण से जोड़ा जा सकता है."
सुप्रिया सुले का नाम पहले से पक्का था?
राजनीतिक विश्लेषक सुजाता आनंदन की राय है कि यह पहले से ही निश्चित था कि सुप्रिया सुले को नेतृत्व मिलेगा.
वो कहती हैं, “सुप्रिया सुले को कार्यकारी अध्यक्ष का पद मिला. हमें पहले यह देखना होगा कि एनसीपी उन्हें कैसे स्वीकार करती है. अजित पवार भी जानते थे कि सुप्रिया सुले को नेतृत्व मिलेगा. क्योंकि शरद पवार ने 2008 से सुप्रिया सुले को सुनियोजित तरीके से पार्टी में आगे बढ़ाया. उस समय उनके सामने शिवसेना का उदाहरण था."
उनके मुताबिक़, "उद्धव ठाकरे के निर्वाचित होते ही राज ठाकरे ने बगावत कर दी. शरद पवार ने अपने उत्तराधिकारी को चुनने की जहमत नहीं उठाई ताकि उनके साथ ऐसा न हो. लेकिन उन्होंने सुप्रिया को यह नेतृत्व देने के बारे में पहले ही सोच लिया था. वो बस इंतजार कर रहे थे कि यह काम कैसे किया जाए."
वो कहती हैं, "पिछले महीने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देना का फ़ैसला दरअसल, इसकी शुरुआत थी. यह नाटक पूर्व नियोजित था, इसके माध्यम से उन्होंने राष्ट्रवादी पार्टी में अपनी ताक़त दिखाई."
सुजाता आनंदन ने यह भी कहा कि अब उनके नाम पर आधिकारिक मुहर लगाने के लिए सुप्रिया सुले को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है.
मृणालिनी नानिवडेकर कहती हैं, “सुप्रिया सुले राजनीति में एक दशक से अधिक समय से सक्रिय हैं. उन्होंने लोकसभा में अपने काम की छाप छोड़ी है. अब उनकी नज़र महाराष्ट्र पर भी है. इसलिए सभी को उम्मीद थी कि उन्हें नेतृत्व मिलेगा. ठीक यही अब हुआ है.”
क्या ये एनसीपी का अंदरूनी मामला है?
सुजाता आनंदन का कहना है, “सुप्रिया सुले को स्वीकार करना या नहीं करना एनसीपी पर निर्भर है. यह महाविकास अघाड़ी का मुद्दा नहीं है. क्योंकि भले ही कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया हो, लेकिन शरद पवार अब भी अध्यक्ष हैं. इसलिए यह तय है कि महाविकास अघाड़ी में अहम फ़ैसले उन्हीं के ज़रिए लिए जाएंगे.”
आनंदन के अनुसार, “जैसे कांग्रेस में मल्लिकार्जुन खड़गे पार्टी अध्यक्ष हैं. लेकिन अन्य पार्टियां निर्णय प्रक्रिया के मामले में राहुल गांधी की हैसियत को जानती हैं. वैसे महाविकास अघाड़ी की कमान आने वाले कुछ समय तक शरद पवार के पास ही रहने वाली है.”
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत दीक्षित के मुताबिक़, “यह कहना मुश्किल है कि शरद पवार के फ़ैसले का महाविकास अघाड़ी पर क्या असर पड़ेगा. उन्होंने प्रफुल्ल पटेल को दूसरा कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है, लेकिन वह बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं. अभी महाविकास अघाड़ी के नेताओं से शरद पवार ही चर्चा करेंगे, चूंकि वे अध्यक्ष हैं तो ये अधिकार उन्हीं के हाथ में होंगे.”
सुप्रिया सुले के सामने चुनौती और मौक़ा
प्रशांत दीक्षित ने कहा कि कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद सुप्रिया सुले के सामने चुनौतियां और अवसर दोनों हैं.
प्रशांत दीक्षित कहते हैं, “शरद पवार अगर सुप्रिया सुले को नेतृत्व सौंपना चाहते थे तो उन्हें चार-पांच साल पहले कर देना चाहिए था. अगर यह पहले हो जाता तो सुप्रिया सुले स्वतंत्र रूप से पार्टी पर पकड़ बना लेतीं.”
आज एनसीपी का कोई विधायक शरद पवार को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है. साथ ही वे अजित पवार के भी ऋणी हैं. इस फ़ैसले से विधायकों के मन में दुविधा पैदा हो सकता है.
उनके अनुसार, "प्रफुल्ल पटेल कभी भी एनसीपी के संगठनात्मक मामलों में शामिल नहीं रहे, और न ही कभी होंगे. तो सवाल यह है कि सुप्रिया सुले इन सभी चीजों को कैसे संभालती हैं.
मीडिया से प्रचार पाना, संसद में अच्छा काम करना एक बात है, लेकिन संगठनात्मक ढांचा और संगठन पर पकड़ दो अलग-अलग चीजें हैं."
क्या सुप्रिया सुले आगे चलकर पार्टी की कमान संभालेंगी, इस पर टिप्पणी करते हुए प्रशांत दीक्षित ने कहा वेट एंड वॉच.
जिस तरह मोदी-शाह की पकड़ सरकार के साथ-साथ पार्टी पर भी है, इसके साथ तुलना करने पर सवाल उठता है कि सुप्रिया सुले संगठन पर कितनी जल्दी पकड़ बना पाती हैं और क्या आने वाले चुनाव से पहले ऐसा कर सकती हैं.
प्रसांत कहते हैं कि 'लेकिन यह जानने में कम से कम छह महीने लगेंगे.’
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