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Seema-Sachin: जब अंग्रेजी के एक शिक्षक भारतीय जासूस बन कर गये थे पाकिस्तान

Seema-Sachin: पाकिस्तान से नोएडा आयी सीमा हैदर क्या जासूस है ? क्या उसने किसी साजिश के तहत सचिन मीणा को अपना मोहरा बनाया है ? उसके पास चार मोबाइल और पांच पासपोर्ट मिले हैं। फिलहाल उत्तर प्रदेश एटीएस इन मामलों की जांच कर रहा है। कभी-कभी जासूस लो प्रोफाइल कैरेक्टर में भी होता है। जैसे सीमा हैदर खुद को पांचवीं फेल बता रही है लेकिन उसकी हिंदी का उच्चारण बेहद सधा हुआ है। वह देखने में साधारण घरेलू औरत लग रही है लेकिन कम्प्यूटर की अच्छी जानकार है। हो सकता है कि शक से बचने के लिए उसने यह सब किया हो। जासूस का काम ही है सुरक्षा एजेंसियों और आम लोगों की आंखों में धूल झोंकना। इसी तरह एक भारतीय जासूस ने पाकिस्तान में जासूसी करने के लिए अपना सब कुछ बदल लिया था।

अंग्रेजी के शिक्षक जब बन गये जासूस

हिंदू होते हुए भी उन्होंने खतना करा लिया था ताकि पकड़े जाने पर पुलिस उन्हें मुसलमान समझे। वे हायर सेंकेड्री स्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक थे। लेकिन देशहित में वे अय्यास का किरदार ओढ़ कर पाकिस्तान के रेडलाइट एरिया में दाखिल हुए थे। भारत के इस महान जासूस का नाम है मोहन लाल भास्कर। मोहनलाल भास्कर वैसे सौभाग्यशाली जासूस हैं जो पाकिस्तान की जेल में 14 साल सजा काट कर सकुशल भारत लौट पाए। उन्होंने अपने अभियान पर एक स्पाई थ्रिलर किताब लिखी है- मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था।

Indian RAW Agent Mohanlal Bhaskar

1967 के आसपास पाकिस्तान की हालत

साल 1967 । सैन्य तानाशाह जनरल अयूब खां का शासन डगमगा रहा है। सेनाध्यक्ष यहिया खां धीरे-धीरे शासन पर हावी हो रहे हैं। जुल्फिकार अली भुट्टो ने लोकतंत्र की बहाली का झंडा थाम रखा है। पाकिस्तान में मार्शल लॉ लग चुका था। सरकार के खिलाफ छिटपुट प्रदर्शन भी हो रहे हैं। राजनीतिक अराजकता का माहौल है। इसी उथल-पुथल के बीच मोहन लाल भास्कर पाकिस्तान में दाखिल होते हैं। जासूस बनने के लिए उन्होंने तीन-चार साल की कठिन ट्रेनिंग ली।

लाहौर छावनी, आरा बाजार

जासूस भास्कर लाहौर छावनी के आरा बाजार पहुंचते हैं। शाम के चार बजे हैं और कर्फ्यू तीन घंटे के लिए खुला है। लोग खरीदारी के लिए उमड़ पड़ते हैं। तभी कुछ लोग अचानक आ कर अयूब सरकार के खिलाफ और भुट्टो के समर्थन में नारेबाजी करने लगते हैं। पुलिस प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग शुरू कर देती है। सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। भास्कर जी एक गड्ढे में छिप कर सब कुछ देख रहे होते हैं। चारों तरफ पुलिस ही पुलिस है। लेकिन सबका ध्यान गोलीबारी में मारे गये लोगों पर है। भास्कर जी वहां से बच कर निकलते हैं। उन्हें लाहौर के गुलबर्ग इलाके में जाना है। गुलबर्ग उस समय लाहौर का वह इलाका था जहां हाईसोसाइटी कॉलगर्ल्स बड़ी-बड़ी कोठियों में अपना उड्डा चलाती थीं। भास्कर जी को शेख वहीद की कोठी में जाना में था। शेख वहीद जाली नोटों का व्यापार करते थे और उनकी कोठी में वहिदा बेगम कॉल गर्ल्स का अड्डा चलाती थीं।

सुराग के लिए पहुंचे तवायफ की कोठी

तवायफों की ये कोठियां पाकिस्तान की राजनीति में मजबूत दखल रखती थीं। सेना के बड़े बड़े अधिकारियों और नौकरशाहों की शाम यहीं गुजरती थी। ठेके पट्टे और लाइसेंस यहीं मिलते थे। जनरल अयूब खां के सेनाध्यक्ष यहिया खां की माशूका जनरल रानी (अकलीम अख्तर) की कोठी भी यहीं आबाद थी। भास्कर जी शेख वहीद की कोठी पर पहुंचे। दरबान को उन्होंने कोडवर्ड बोला तो उन्हें अंदर जाने की इजाजत मिली। उन्हें दूसरी लड़कियों में दिलचस्पी नही थी। इसलिए वहिदा बेगम के साथ रात गुजराने का फैसला किया। वहिदा बेगम जब शराब के नशे में बेसुघ गयी तो भास्कर जी ने उससे सवाल पूछने शुरु किये। वहिदा ने यहां आने वाले सैनिक अफसरों के नाम बताये। कुछ और अहम बातें बतायीं। भास्कर जी दो वजहों से कॉल गर्ल के अड्डे पर रुके थे। एक तो वे यहां रात भर सुरक्षित रहते और दूसरे उन्हें अपना काम शुरू करने के लिए कुछ प्रारंभिक जानकारियां चाहिए थीं।

फिल्म स्ट्रगलर का भेष

इसके बाद भास्कर जी ने एक वैसे युवक का भेष धारण कर लिया जो फिल्मों में काम पाने के लिए स्ट्रगल कर रहा है। वहिदा बेगम की कोठी से निकले तो वे लाहौर के शाहनूर स्टूडियो की तरफ चल दिये। वहां नौजवान लड़के लड़कियों की भीड़ लगी रहती थी। ये फिल्मों में काम पाने की तमन्ना में यहां जमे रहते थे। कोई किसी को अपना सही नाम और पता नहीं बताता था। भास्कर जी के लिए ये जगह मुफीद लगी। इसके बाद भास्कर जी ने मुल्तान छावनी जाने का कार्यक्रम बनाया। पाकिस्तान में उनके कुछ सम्पर्क सूत्र थे जिसकी जानकारी भारतीय गुप्तचर एजेंसी के जरिये मिली थी।

जेल गये, यातना सही लेकिन मुंह नहीं खोला

भास्कर जी पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की गुप्त जानकारी लेने के अभियान पर गये थे। वे कितने सफल रहे, इसकी जानकारी सुरक्षा कारणों से गोपनीय रखी गयी। लेकिन एक साथी की गद्दारी से वे पकड़े गये थे। उन्हें बहुत यातना दी गयी थी फिर भी राज से पर्दा नहीं उठाया था। पाकिस्तान ने उन्हें 14 साल की सजा सुनायी थी। वे जिस जेल में थे उसी में शेख मुजीबुर रहमान को रखा गया था। उसी जेल के जनाना वार्ड में यहिया खां की माशूका जनरल रानी को रखा गया था। प्रख्यात कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने उनकी रिहाई के लिए अथक प्रयास किया था।

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