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SC ने नोटबंदी के फैसले को बताया सही, 58 याचिकाओं को खारिज करते हुए मोदी सरकार को दी क्‍लीन चिट

SC Verdict on Demonetisation Judgment :सुप्रीम कोर्ट नोटबंदी के फैसले पर उठे सवालों संबंधी याचिकाओं को खारिज करते हुए केंद्र के नोटबंदी के फैसले को सही बताया इसेके साथ ही सरकार को क्‍लीन चिट दे दी

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    SC verdict on Demonetisation: सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी पर सुनाया बड़ा फैसला | वनइंडिया हिंदी *Legal

    मोदी सरकार द्वारा 2016 में की गई नोटबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना आखिरी फैसला सुना दिया है। नोटबंदी पर उठे सवालों संबंधी दर्जनों याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने 2026 में पांच सौ और एक हजार रुपये की नोटबंदी को सही ठहराया। इन नोटों को अमान्‍य करने के सरकार के फैसले को कोर्ट ने सही बताया।

    58 याचिकाओं को खारिज कर दिया

    सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी के खिलाफ दायर 58 याचिकाओं को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरबीआई के पास विमुद्रीकरण लाने की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है और केंद्र और आरबीआई के बीच परामर्श के बाद ही निर्णय लिया गया। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने ये फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरबीआई के पास विमुद्रीकरण लाने की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है और केंद्र और आरबीआई के बीच सलाह के बाद ही निर्णय लिया गया।

    मोदी सरकार के के पक्ष में फैसला सुनाया

    सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में लिए गए एक फैसले में बैंकों के विमुद्रीकरण की वैधता को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट की 5-जजों की बेंच ने कॉन्सपिरेसी थ्योरी को खत्म करते हुए मोदी सरकार के के पक्ष में फैसला सुनाया। केवल न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने असहमति व्यक्त की। उन्‍होंने कहा गजट अधिसूचना के बजाय एक कानून की आवश्यकता है! न्यायमूर्ति बी.आर. बहुमत में कहा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अधिनियम की धारा 26 (2), जो केंद्र को विमुद्रीकरण करने का अधिकार देती है, की व्याख्या केवल बैंक नोटों की विशिष्ट श्रृंखला के संबंध में नहीं की जा सकती है।

    पीठ ने कहा कि धारा को बैंक नोटों की सभी सीरीज के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। जजों की बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड से ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार और आरबीआई के बीच छह महीने की अवधि के लिए परामर्श हुआ था। इसलिए यह माना गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 26(2) में अंतर्निहित सुरक्षा उपायों के मद्देनजर अत्यधिक प्रतिनिधिमंडल के आधार पर इसे रद्द नहीं किया जा सकता है। आगे कहा है कि नोटों के आदान-प्रदान की अवधि, जो 52 दिन थी, को अनुचित नहीं कहा जा सकता है। न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में दोष नहीं हो सकता क्योंकि प्रपोजल केंद्र सरकार से आया था। उन्होंने यह कहकर निष्कर्ष निकाला कि अधिसूचना में कोई दोष नहीं है और यह अनुचित नहीं है।

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