Justice Joseph dispute: क्या है सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता निर्धारित करने का तरीका?
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों का आज शपथ ग्रहण समारोह होना है। शपथ ग्रहण से पहले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा से मौजूदा सुप्रीम कोर्ट के जजों ने मुलाकात की और अपना विरोध दर्ज कराया है। यह विरोध सरकार द्वारा जारी नोटिफिकेशन में जिन तीन जजों का शपथ ग्रहण होना है उसमे से एक जज की वरिष्ठता को घटाने के खिलाफ है। सरकार ने अपने नोटिफिकेशन में जस्टिस के एम जोसेफ को वरिष्ठता सूचि में तीसरे पायदान पर रखा है, जबकि जस्टिस इंदिरा बनर्जी और वीनीत सरन का नाम जस्टिस जोसेफ के नाम से उपर है। ऐसे में इस विवाद के बाद जजों की वरिष्ठता निर्धारित करने के तरीके पर सवाल खड़ा हो गया है।

शपथ ग्रहण अहम
जजों की वरिष्ठता सुप्रीम कोर्ट में इनके शामिल होने के बाद निर्धारित की जाती है। जो जज सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में पहले शपथ लेता है वह वरिष्ठ होता है, जबकि जो जज बाद में शपथ लेता है वह जूनियर होता है। लेकिन अगर सरकार की ओर से इन जजों के नाम की घोषणा अलग-अलग तारीख पर होती है, तो ऐसी स्थिति में जजों की वरिष्ठता अपने आप जो जज पहले शपथ लेता है उसके आधार पर निर्धारित होती है। हालांकि इस मामले में कोई लिखित नियम नहीं है। सरकार की ओर से जजों की नियुक्ति का नोटिफिकेशन अलग-अलग तारीख पर घोषित किया जाता है, उसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इन जजों के शपथ ग्रहण का क्रम तैयार करते हैं।

जस्टिस चेलमेश्वर और दीपक मिश्रा का चयन एक समय
उदाहरण के तौर पर सीजेाई दीपक मिश्रा और रिटायर्ड जस्टिस जे चेलमेश्वर के नाम की घोषणा एक ही तारीख पर हुई थी, लेकिन जस्टिस मिश्रा का नाम जस्टिस चेलमेश्वर से उपर, लिहाजा उन्हें पहले शपथ दिलाई गई थी। इसी वजह से जस्टिस दीपक मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था और जस्टिस मिश्रा को जस्टिस चेलमेश्वर से वरिष्ठ माना गया था। गौर करने वाली बात है कि ऐसी स्थिति में सरकार की ओर से नए जजों की नियुक्ति के लिए जारी किया जाने वाला वारंट काफी अहम हो जाता है।

सरकार पर होती है बाध्यता
सरकार की ओर से जजों की नियुक्ति का वारंट कॉलेजियम की प्रस्ताव के बाद किया जाता है। आपको बता दें कि कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ जज होते हैं। कॉलेजियम द्वारा भेजे गए किसी भी नाम को सरकार वापस कर सकती है, लेकिन अगर इसके बाद भी कॉलेजियम इस नाम को दोबारा भेजता है तो सरकार पर इस बात की बाध्यता होती है कि वह इस नाम को स्वीकार करे और उसकी नियुक्ति का आदेश जारी करे।

कॉलेजियम किस आधार पर करता है चयन
जजों के नाम को आगे बढ़ाने से पहले कॉलेजियम ना सिर्फ वरिष्ठता को देखता है बल्कि बल्कि उस व्यक्ति योग्यता को भी देखा जाता है कि क्या वह इस पद पर भेजा जा सकता है। इस नियुक्ति में कोशिश की जाती है कि देश के हर राज्य की कोर्ट का प्रतिनिधित्व हो। उदाहरण के तौर पर जस्टिस जेएस शेखर जस्टिस मिश्रा और जस्टिस चेलमेश्वर से हाई कोर्ट में जूनियर थे बावजूद इसके उन्हें दोनों जजों से दो महीने पहले सुप्रीम कोर्ट भेज दिया गया था। इसी वजह से उन्हें सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था, यह मुमकिन नहीं था अगर उन्हें दोनों जजों के साथ सुप्रीम कोर्ट भेजा जाता।

क्या है मौजूदा जस्टिस जोसेफ की वरिष्ठता का विवाद
दरअसल कॉलेजियम ने जस्टिस जोसेफ जोकि उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस हैं का नाम 10 जनवरी को सरकार के पास भेजा था। उनके साथ वरिष्ठ वकील इंदु मल्होत्रा के नाम को भी भेजा गया थ। लेकिन अप्रैल माह में सरकार ने इंदु मल्होत्रा की नियुक्ति का वारंट जारी कर दिया जबकि जस्टिस जोसेफ के नाम को वापस कर दिया। 16 जुलाई को कॉलेजियम ने जस्टिस जोसेफ के नाम को फिर से भेज दिया। इसी दिन कॉलेजियम ने जस्टिस बनर्जी और सरन के नाम का भी प्रस्ताव भेजा। इस प्रस्ताव में कॉलेजियम की ओर से कहा गया था कि जस्टिस जोसेफ के नामा को पहली फाइल के तौर पर आगे बढ़ाया जाए। शुक्रवार को सरकार ने तीनों ही जजों के नाम की नियुक्ति के लिए घोषणा कर दी। लेकिन जस्टिस जोसेफ की वरिष्ठता जस्टिस बनर्जी और सरन से नीचे कर दी गई, इसका साफ मतलब है कि जस्टिस जोसेफ इन दोनों से जूनियर होंगे।

सुप्रीम कोर्ट क्यों नाराज है
दरअसल कॉलेजियम ने एक साथ जनवरी माह में जस्टिस जोसेफ के नाम को पहले भेजा था, क्योंकि कॉलेजियम को लगता था कि वह इसके लिए योग्य उम्मीदवार हैं। कुछ जजों का मानना है कि वरिष्ठता को निर्धारित करने की पहले की व्यवस्था का सरकार द्वारा उल्लंघन किया गया है। ऐसा जानबूझकर किया गया है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि कोई भी इन तीनों में से सीजेआई नहीं बन सकता है। अगर नियुक्ति के समय में वरिष्ठता के नियम का पालन किया गया तो यह कॉलेजियम में सदस्यता को प्रभावित करता। अगर जस्टिस जोसेफ को वरिष्ठता प्रदान की गई होती तो वह बेंच की अध्यक्षता कर रहे होते।

क्या है सरकार का तर्क
सरकार का कहना है कि उसे तीनों नाम का प्रस्ताव मिला था, जिसमे से एक नाम को फिर से भेजा गया था, जबकि दो नाम को पहली बार भेजा गया था। उसी दिन हमने तीनों नाम को समानता के साथ स्वीकार कर लिया था। ऐसा ऑल इंडिया सीनियॉरिटी लिस्ट के आधार पर किया गया था। इसमे असल तारीखों को स्वीकार नहीं किया गया।
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