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Saurabh Kirpal समेत 3 वकीलों की प्रोन्नति पर SC कॉलेजियम का जवाब, सरकारी आपत्तियों की बखिया उधेड़ी, जानिए कैसे

वकील सौरभ किरपाल सुप्रीम कोर्ट की नजर में न्यायाधीश जैसी योग्यता रखते हैं। एडवोकेट कृपाल समलैंगिक के रूप में भी पॉपुलर हैं। उनके बारे में देश की सबसे बड़ी अदालत को जज बनने की योग्यता वाली बात क्यों दोहरानी पड़ी ? जानिए

Saurabh Kirpal Delhi High Court

वकील Saurabh Kirpal Delhi High Court के न्यायाधीश बनेंगे या नहीं, इस सवाल का जवाब पिछले पांच साल से नहीं मिला है। वकील सौरभ किरपाल की पहचान समलैंगिक के रूप में भी है। दिलचस्प बात ये कि पांच साल के बाद एक बार फिर Supreme Court Collegium ने एक बार फिर वकील सौरभ किरपाल को दिल्ली हाईकोर्ट का जज नियुक्त करने की सिफारिश की है। तीन सीनियर वकीलों को जज के रूप में प्रोन्नत करने की सिफारिश कर चुकी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की आपत्तियों पर विस्तार से जवाब दिया है।

क्या दूसरी बार माननी ही होगी कॉलेजियम की सिफारिश ?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने तीन वरिष्ठ अधिवक्ताओं को न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने के संबंध में सरकार की आपत्तियों पर अपनी प्रतिक्रिया को पहली बार सार्वजनिक किया है। जिन कारणों के आधार पर सरकार ने समलैंगिक वकील सौरभ किरपाल, सीनियर एडवोकेट सोमशेखर सुंदरेसन और आर जॉन सत्यन को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश को मंजूर नहीं किया है, उसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने एक बार फिर तीनों को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है। नियमों के मुताबिक सरकार को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा दूसरी बार भेजे गए नामों को स्वीकार करना ही होता है।

सरकारी आपत्ति के बाद सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पांच साल पहले सीनियर वकील सौरभ कृपाल को दिल्ली उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की थी। इसके अलावा एडवोकेट सोमशेखर सुंदरेसन को बॉम्बे उच्च न्यायालय और आर जॉन सत्यन को मद्रास उच्च न्यायालय में पदोन्नत करने की सिफारिश की गई थी। हालांकि, तीनों की पदोन्नति पर सरकार ने सकारात्मक जवाब नहीं दिया। सरकारी आपत्तियों को खारिज करते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपनी वेबसाइट पर केंद्र को पत्र लिखा है। सभी आपत्तियों को खारिज करते हुए कोर्ट ने दूसरी बार भेजी गई सिफारिशों में तीनों को न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की है। अब नजरें सरकार के फैसले पर हैं।

Supreme Court collegium

क्या पहली बार न्यायाधीश बन पाएंगे समलैंगिक वकील ?

गौरतलब है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सरकार के साथ चल रही खींचतान के बीच सुप्रीम कोर्ट का गोपनीय दस्तावेज सुर्खियों में आ गया है। बता दें कि पिछले साल नवंबर में कई अन्य लोगों के साथ सरकार ने किरपाल का नाम भी खारिज कर दिया था। क्योंकि सौरभ किरपाल समलैंगिक हैं, उनके नाम की चर्चा सबसे अधिक हो रही है। उनके जज बनने पर भारत के इतिहास में पहली बार कोई समलैंगिक न्यायाधीश बनेगा।

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    सौरभ के पार्टनर स्विटजरलैंड के, आपत्ति का आधार ठीक नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की आपत्तियों के जवाब में कहा, सरकार द्वारा उद्धृत दोनों कारणों को खारिज कर दिया गया है। सरकार की पहली आपत्ति सौरभ किरपाल का समलैंगिक होना है, जबकि दूसरी आपत्ति किरपाल के समलैंगिक पार्टनर का स्विटजरलैंड का नागरिक होना है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में शामिल मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसेफ के संयुक्त पत्र में कहा गया है कि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) ने अपनी रिपोर्ट में सौरभ कृपाल के साथी के व्यक्तिगत आचरण या व्यवहार के राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर के संबंध में किसी भी तरह की आशंका जाहिर नहीं की है। SC Collegium ने साफ किया कि सौरभ के पार्टनर ऐसे देश से हैं जो भारत का 'एक मित्र राष्ट्र है' और कई दूसरे संवैधानिक पदों पर भी ऐसे लोग हैं जिनके पति या पत्नी विदेशी नागरिक हैं। ऐसे में इस आधार पर वकील किरपाल की उम्मीदवारी को खारिज नहीं किया जा सकता।

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    तेजी से करें किरपाल की पदोन्नती

    सुप्रीम कोर्ट के लेटर में कहा गया, तथ्य यह है कि सौरभ किरपाल अपने लैंगिक पहचान के बारे में मुखर हैं। उन्हें इसका श्रेय जाता है। स्पष्ट रूप से समलैंगिक होने के आधार पर किरपाल की उम्मीदवारी को खारिज करना सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से निर्धारित संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत होगा। एक पुराने इंटरव्यू का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा, किरपाल मीडिया प्लेटफॉर्म पर टिप्पणियां करने से बच सकते थे, लेकिन यह नकारात्मक भी नहीं है, क्योंकि पदोन्नति का मामला पांच साल से लंबित है। अदालत ने दो टूक कहा, उनकी पदोन्नति तेजी से की जानी चाहिए।

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    क्या बोले थे वकील सौरभ किरपाल

    बता दें कि पिछले साल नवंबर में एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में सीनियर एडवोकेट सौरभ किरपाल ने कहा था, मेरा मानना है कि उनके समलैंगिक होने के कारण पदोन्नति को तिरस्कार के साथ देखा गया। 50 वर्षीय वकील सौरभ किरपाल ने कहा था, मुझे नहीं लगता कि सरकार अनिवार्य और खुले तौर पर समलैंगिक व्यक्ति को न्यायाधीश नियुक्त करना चाहती है।

    जज में सक्षमता, योग्यता और सत्यनिष्ठा अहम

    दो अन्य सीनियर वकीलों- सोमशेखर सुंदरेसन और आर जॉन साथियान की पदोन्नति पर सरकारी आपत्तियों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बॉम्बे हाईकोर्ट के सोमशेखर सुंदरेसन के पास भी अभिव्यक्ति की आजादी है।

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    बता दें कि सोमशेखर की उम्मीदवारी को सरकार ने इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उन्होंने सोशल मीडिया पर "उन मामलों पर टिप्पणी की जो अदालतों में लंबित हैं।" शीर्ष अदालत ने कहा, "संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सभी नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। जजशिप के लिए चुने गए व्यक्ति में सक्षमता, योग्यता और सत्यनिष्ठा अहम होती है।

    IB की रिपोर्ट से कैरेक्टर प्रभावित नहीं

    सीनियर एडवोकेट आर जॉन साथियान ने भी सोशल मीडिया पर एक लेख पोस्ट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी की थी। इन्होंने अपनी पोस्ट में 2017 में NEET परीक्षा पास नहीं कर पाई मेडिकल उम्मीदवार अनीता की आत्महत्या पर टिप्पणी की थी। उन्होंने अपने बयान में सुसाइड को 'राजनीतिक विश्वासघात' बताते हुए पूरे देश को शर्मसार करने वाली घटना 'शेम ऑन यू इंडिया' (shame of you India) करार दिया था।

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    शीर्ष अदालत ने साथियान की पदोन्नति की दूसरी बार सिफारिश करते हुए कहा कि खुफिया ब्यूरो ने कहा है कि वह अच्छी व्यक्तिगत और पेशेवर छवि के वकील हैं। उनका कोई राजनीतिक झुकाव नहीं है। इस पृष्ठभूमि में, आईबी की प्रतिकूल टिप्पणी एडवोकेट आर जॉन साथियान की उपयुक्तता, चरित्र या अखंडता पर प्रभाव नहीं डालती।

    उपराष्ट्रपति के बयान के बाद विधायिका vs न्यायपालिका

    यह बात भी दिलचस्प है कि दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का शीर्ष अदालत का अभूतपूर्व कदम उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की टिप्पणियों के बाद आया है। उपराष्ट्रपति के बयान के बाद विधायिका बनाम न्यायपालिका की बहस तेज होती दिख रही है।

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    50 साल पुराना रेफरेंस क्यों दिया ?

    बता दें कि धनखड़ ने साल 1973 के केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का जिक्र कर इसके बाद संविधान के बुनियादी ढांचे वाले सिद्धांत पर सवाल उठाया था। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि न्यायपालिका को अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए। विपक्षी दल कांग्रेस ने धनखड़ के बयान को "न्यायपालिका पर असाधारण हमला" बताया है।

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