सत्या नडेला की वजह से ग्लोबल लेवल पर इंडियन सीईओ की डिमांड बढ़ी

भारत में जन्‍मे और पले-बढ़े सत्‍या नडेला के माइक्रोसॉफ्ट में सीईओ बनने के बाद ग्‍लोबल लेवल पर एक बार फिर से इंडिया के लोगों की धूम मच गई है। वर्तमान में कई उच्‍च विदेशी कम्‍पनियों जैसे - पेप्‍सी, मास्‍टरकार्ड, एडॉब सिस्‍टम, ड्यूश बैंक, डाईगिओ आदि में भारत के जन्‍मे और पले-बढ़े लोग ही सीईओ बने हैं।

ड्यूश बैंक के सीईओ अंशु जैन जयपुर के रहने वाले है, पेप्‍सी की सीईओ इंदिरा नुई का जन्‍म चेन्‍नई से 1300 किमी. दूर एक स्‍थान पर हुआ था। जबकि मास्‍टरकार्ड के सीईओ अजय बंगा और डिआगिओ के सीईओ इवान मेनेजेस, आईआईएम के पढ़े हुए है। वहीं रेकिट्ट बेन्‍ककिसर के सीईओ राकेश कपूर है जो दिल्‍ली से ताल्‍लुक रखते है और उनकी सारी शिक्षा - दीक्षा भारत में ही हुई।

देखा जाएं तो इन विदेशी कम्‍पनियों में बनने वाले सभी भारतीय सीईओ, 40 से 50 की उम्र के बीच के हैं जिन्‍होने अपनी स्‍कूलिंग, इंडिया से और बाकी की शिक्षा, किसी विदेशी यूनीवर्सिटी या भारतीय संस्‍थान से ली। दो अलग संस्‍कृतियों में रहने के कारण ही उनकी सोच और समझ में वो सारी बातें आती हैं जिसकी जरूरत हर आम आदमी को होती है और वह कॉरपोरेट सेक्‍टर या इंडस्‍ट्रियल फील्‍ड में छा जाते है। हर कम्‍पनी को इसी तरह की क्‍वालिटी की तलाश होती है और उनकी खोज, भारत पर आकर ठहर जाती है।

स्‍वीट्जरलैंड की सेंट गैल्‍लन यूनीवर्सिटी में की गई एक रिसर्च के मुताबिक, इंडियन एक्‍जीक्‍यूटिव, पार्टिशिपेटेड मैनेजमेंट में अच्‍छे होते है और वह अपने सबऑर्डिनेट के साथ रिश्‍तों को मजबूत बनाते है। उनकी लीडरशिप क्‍वालिटी ही उन्‍हे आगे ले जाती है। भारतीय सुपीरियर, हमेशा अपने सबऑर्डिनेट के साथ अच्छे संबंधों को बनाने में ही भलाई समझता है ताकि हर प्रकार से विन-विन सिच्‍युएशन हों।

''इंडियन क्‍लब'' में किसी भी एक्‍सक्‍यूटिव को तानाशाह के रूप में नहीं जाना जाता है। इस बारे में इंदिरा नूई भी कहती है कि ''किसी भी कर्मचारी को कर्मचारी के रूप में न देखकर एक इंसान के रूप में देखना ज्‍यादा फायदेमंद होता है। आप ये सोचिए कि ये पेप्‍सिको का वर्कर नहीं बल्कि इससे परे भी उसकी जिंदगी होगी, उसकी पहचान सिर्फ एम्‍पलॉय न. 4,5 67 तक ही सीमित नहीं है।''

आईए जानते हैं कि हर बेहतर कम्‍पनी को इंडियन सीईओ ही क्‍यूं चाहिये?

मेहनती

मेहनती

ये बात कहना गलत नहीं होगा कि हिंदुस्‍तान में सबसे ज्‍यादा मेहनती वर्ग रहता है। यहां के लोग अन्‍य देशों की अपेक्षा ज्‍यादा मेहनती होते है और पूरे डेडीकेशन के साथ काम करते है। अधिकांश: विदेशी कम्‍पनियां सिर्फ इसी कारण के चलते भारतीयों का चयन करती हैं।

बुद्धिमान

बुद्धिमान

भारतीय लोगों में या भारतीय परिवेश में बढ़े हुए लोग, काफी बुद्धिमान होते है क्‍योंकि इस देश का शिक्षा का स्‍तर अधिक उच्‍च है। भारतीयों लोगों की तीव्र बुद्धि का कारण, हर कॉन्‍सेप्‍ट का क्‍लीयर होना है क्‍योंकि वह पढ़ाई के दिनों में सिर्फ पढ़ाई करते है, बच्‍चों को आत्‍म-निर्भर बनाने के लिए उनकी पढ़ाई से किसी भी प्रकार का समझौता भारत में नहीं होता है।

समझ

समझ

भारतीय लोगों की तर्क शक्ति बहुत अच्‍छी होती है। जिसके चलते उनकी बातें सभी को लॉजिकली समझ में आती है।

पार्टिशिपे‍टेड मैनेजमेंट

पार्टिशिपे‍टेड मैनेजमेंट

भारतीय लोगों में पार्टिशिपेटेड मैनेजमेंट की क्षमता ज्‍यादा होती है। प्राचीनकाल से ही भारत में नेतृत्‍व शैली में पारंपरिक तरीके से काम होता आया है जिसका साफ-साफ असर भारतीय लोगों पर दिखता है।

सबऑर्डिनेट के साथ रिलेशन

सबऑर्डिनेट के साथ रिलेशन

भारतीय सीईओ में अपने सबऑर्डिनेट के साथ मैनेज करने और अच्‍छे प्रोफेशनल रिलेशन को बनाएं रखने की क्‍व‍ालिटी होती है, जिससे सिस्‍टम में कोई भी समस्‍या नहीं आती है।

भावनात्‍मक जुडाव

भावनात्‍मक जुडाव

भारतीय लोगों में भावनात्‍मक जुडाव बहुत ज्‍यादा होता है, वह अपने कर्मचारियों को सिर्फ कर्मचारी नहीं बल्कि एक इंसान भी मानते है और उसी हिसाब से रिस्‍पेक्‍ट भी करते है, जिससे सभी कर्मचारी अच्‍छी तरह अपनी परफार्मेंस देते है।

धैर्य

धैर्य

भारतीय लोगों में घबराने की प्रवृत्ति कम होती है वह आर या पार वाले एटीट्यूड को रखते है, अगर कम्‍पनी कभी किसी घाटे या नुकसान में पहुंच जाती है तो वह एकदम से घबराकर किसी भी नए काम या नीति को न लागू करने के बारे में नहीं सोचते है, रिस्‍क लेते है और करके दिखाते है।

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