संदेशखाली के जख्मों के बीच बंगाल में 'खालिस्तानी' विवाद के सियासी मायने?

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली की पीड़ित महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चियों की सिसकियां कम होने की नाम नहीं ले रही हैं। लेकिन, उनके जख्मों पर सियासी नमक छिंटकर फायदा उठाने की कोशिशों में कहीं से कोई कमी नजर नहीं आ रही है। विवाद एक आईपीएस अधिकारी को कथित रूप से 'खालिस्तानी' कह जाने को लेकर हो रहा है।

पहले यह स्पष्ट करना बहुत ही आवश्यक है कि किसी भी भारतीय नागरिक को 'खालिस्तानी' कह देना अपने आप में बहुत बड़ा गुनाह है और कोई इसका अपराधी है तो उसपर कार्रवाई भी जरूर होनी चाहिए।

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संदेशखाली के गुनहगारों को सजा मिलेगी?
लेकिन, सवाल है कि किसी की इस गलती की सजा क्या संदेशखाली के गुनहगारों को बचाकर दिया जा सकता है? लेकिन, बंगाल में एक आईपीएस अधिकारी पर की गई कथित अमर्यादित टिप्पणी को लेकर जिस तरह राजनीति शुरू है, उससे यह आशंका पैदा हो रही है कि कहीं यह सब संदेशखाली के अपराधियों को बचाने के लिए तो नहीं हो रहा है?

संदेशखाली कांड के लिए बंगाल पुलिस नहीं है जिम्मेदार?
राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग तक ने संदेशखाली के प्रमुख आरोपी शाहजहां शेख और उसके गुर्गों को संरक्षण देने के लिए बंगाल पुलिस पर उंगली उठाई है। बल्कि कुछ रिपोर्ट में तो पुलिस पर सीधे-सीधे गुनहगारों का सक्रिय संरक्षक बताया गया है।

शाहजहां शेख मामूली अपराधों का अपराधी नहीं है। उसपर केंद्रीय जांच एजेंसियों के अधिकारियों तक पर जानलेवा हमले करवाने से लेकर दलित और आदिवासियों की जमीन हड़पने और उनकी महिलाओं के साथ व्यवस्थित यौन शोषण के आरोप हैं। लेकिन, इतना बड़ा सरगना आजतक फरार है और बंगाल पुलिस क्या कर रही है, यह शायद उसके अलावा किसी को कुछ नहीं पता।

कथित 'खालिस्तानी' टिप्पणी पर सीएम से लेकर पुलिस तक है नाराज
बंगाल पुलिस के अफसर पर जो भी कथित आपत्तिजनक टिप्पणी की गई है, उसको लेकर बंगाल पुलिस बहुत ही भड़की हुई है और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस घटना के लिए बीजेपी की 'विभाजनकारी राजनीति' पर दोष मढ़ने की कोशिश की है।

ममता ने यहां तक कह दिया कि 'बीजेपी के हिसाब से पगड़ी पहनने वाला हर व्यक्ति खालिस्तानी है...' 'मैं हमारे सिख भाइयों और बहनों की प्रतिष्ठा को खराब करने की इस कोशिश की कड़ी निंदा करती हूं, जो कि हमारे राष्ट्र के लिए उनके बलिदान और अटूट दृढ़ संकल्प के प्रतीक हैं।'

एक राज्य की मुख्यमंत्री होने के नाते तृणमूल सुप्रीमो का यह बयान बहुत ही उचित है। लेकिन, न तो सीएम और न तो बंगाल पुलिस यह बताने को तैयार है कि शाहजहां शेख के गुनाहों का साम्राज्य कैसे बना और किसने बनने दिया? खासकर तब जब वह टीएमसी का ही सदस्य है।

संदेशखाली से ध्यान भटकाने की कोशिश तो नहीं हो रही?
ऐसे में आशंका पैदा होती है कि क्या किसी एक शख्स की अमर्यादित और आपत्तिजनक टिप्पणी की आड़ में संदेशखाली की महिलाओं के साथ जो कुछ हुआ, उससे ध्यान हटाने की कोशिश तो नहीं हो रही है?

संदेशखाली में जितना बड़ा कांड हुआ, उसपर शायद कांग्रेस नेता राहुल गांधी का वह अंदाज अभी तक नहीं दिखा, जिन्होंने नए विवाद को लेकर भाजपा पर आरोप लगाने में जरा भी देरी नहीं की है। उन्होंने कहा है कि 'नफरत के विष ने उन्हें अंधा बना दिया है।'

खास बात ये है यह विवाद उस वक्त तूल पकड़ रहा है, जब हरियाणा-पंजाब के बॉर्डर पर किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली कूच की कोशिशों में जुटे हैं। इन प्रदर्शनकारियों में अधिकतर पंजाब से आए सिख किसान ही शामिल हैं।

आईपीएस अधिकारी ने तत्काल क्या दी थी प्रतिक्रिया?
जब आईपीएस अधिकारी जसप्रीत सिंह के खिलाफ वह कथित आपत्तिजनक टिप्पणी की तो उन्होंने उसका तत्काल प्रतिरोध भी किया था। उन्होंने कहा, 'मैं आपके खिलाफ कार्रवाई करूंगा। आप ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि मैंने पगड़ी पहन रखी है। अगर मैंने पगड़ी नहीं पहनी होती तो क्या आप मुझे खालिस्तानी कहते?'

बीजेपी नेता का आरोपों पर क्या कहना है?
इसके बाद भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा, 'हम पाकिस्तानी-खालिस्तानी क्यों कहेंगे? उस अफसर ने (हमारे साथ) दुर्व्यवहार किया था। वह मुख्यमंत्री को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं। न तो मैंने और न ही मेरे साथ मौजूद किसी ने किसी धर्म को ठेस पहुंचाने के लिए कुछ कहा है। हम कभी कहेंगे भी नहीं। हम गुरु नानक का सम्मान करते हैं, हम सिखों का सम्मान करते हैं।'

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