Ryan school: अनपढ़ ही सही ज़िंदा रहें हमारे बच्चे
नई दिल्ली। बहुत पुरानी बात है। पड़ोस में पढ़ाने आते एक टीचर ने जब बच्चे को थप्पड़ से पीटा और उसके गाल फूल गये और आंखों तक सूजन पहुंच गयी, तो अगले दिन बच्चे की मां उस टीचर का इंतज़ार कर रही थी। आते ही मां ने टीचर से पूछा- "आपने मेरे बच्चे की ये क्या हालत कर दी है देखिए।" टीचर ने सहमते हुए बताया था कि बच्चे का पढ़ने में मन ही नहीं लगता। तब मां ने बात काटते हुए पूछा था - "क्या करेगा वो पढ़ लिखकर?" वह आगे बोली, " जब बच्चे का आंख-कान नहीं रहेगा, तो पढ़ कर ही बच्चा क्या कर लेगा?" टीचर की वहीं छुट्टी हो गयी।

शिक्षा के मंदिर में चढ़ रही है बच्चों की बलि
वह बच्चा खुशकिस्मत था, जिसकी मां पढ़ाई से ज्यादा ज़िन्दगी को अहमियत दे रही थी। वर्ना वह टीचर आगे और भी ऐसी घटनाओं को मासूम पर थोप सकता था। चाहे कोई भी पढ़ाई हो, कितने भी नामचीन स्कूल में मिल रही शिक्षा हो- मगर, वो ज़िन्दगी से बेशकीमती नहीं हो सकता। मगर, आज के मां-बाप अपने बच्चे की ज़िन्दगी नहीं बचा पा रहे हैं। शिक्षा के मंदिर में बच्चों की बलि चढ़ रही है। एक के बाद एक घटनाएं रोंगटे खड़े कर रही हैं। लेकिन, घटनाएं नहीं रुक रहीं।
गुरुग्राम स्कूल के टॉयलेट में 7 साल के बच्चे की कान और गला रेतकर हुई हत्या में शिक्षक शामिल नहीं हैं, ऐसा दिखता ज़रूर है लेकिन क्या वाकई ऐसा है? रेयान जैसा प्रतिष्ठित स्कूल, जहां एसी बस, एसी क्लास की फीस ली जाती है, डेवलपमेंट फी के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है, वहां कोई बच्चा किसी क्रूर कातिल के हाथों में कैसे पड़ गया? कैसे वह किसी हवसी के चंगुल में आ गया? स्कूल परिसर में हवसी हों, कातिल हो तो दोष टीचर का नहीं, स्कूल प्रबंधन का नहीं तो क्या बच्चे और बच्चों के मां-बाप का है?

चाकू लेकर टॉयलेट तक कैसे पहुंचा कंडक्टर
यह सवाल बहुत तकनीकी है कि हत्यारा हवसी कंडक्टर चाकू लेकर टॉयलेट तक कैसे पहुंचा, सुरक्षा एजेंसियां क्या कर रही थीं? मूल सवाल ये है कि बच्चा अकेले में कैसे अपने हत्यारे के हाथों में पड़ गया? बच्चों के इस्तेमाल में आने वाले टॉयलेट में कोई कंडक्टर नियमित रूप से कैसे आता रहा? मां-बाप जब अपने बच्चे को स्कूल भेजते हैं तो वो अपने बच्चे को टीचर के हवाले करते हैं। यही वजह है कि स्कूल बसों में भी टीचर की मौजूदगी के बिना बच्चों को नहीं भेजा जाता। ऐसे में स्कूल परिसर के भीतर हत्यारे को इतनी महफूज जगह कैसे मिली कि वह अपनी हवस पूरी करने की सोच सके और उसकी निर्मम हत्या कर दे?
यह हमारी सोच ही होती है जो घटनाओं को बढ़ावा भी देती है और उस पर लगाम भी लगाती है। रेयान स्कूल की सोच तो देखिए। बच्चे को उसके पिता 7.50 बजे सुबह स्कूल छोड़ते हैं, 8.15 बजे सुबह उनके पास हादसे के बारे में फ़ोन आ जाता है। 9 बजे तक वे अस्पताल पहुंच पाते हैं जहां उन्हें मौत की ख़बर दी जाती है। लेकिन, मौत की ख़बर पुष्ट हो जाने के बाद भी अगले 2 घंटे तक यानी 11 बजे तक क्लास चल रहा होता है! ये कौन सी पढ़ाई है! स्कूल परिसर में 7 साल का मासूम हवसी और हत्यारे का शिकार होता है, अपनी जान खो देता है लेकिन वहां माहौल पढ़ाई का बना रहता है! ये कैसे शिक्षक हैं! कौन सी शिक्षा दे रहे हैं! स्कूल का बच्चा-बच्चा घटना से वाकिफ हो जाता है, परिसर में पुलिस है, भारी भीड़ है, बाहर मां-बाप का हुजूम है, बच्चों को पता है कि स्कूल में अनहोनी हुई है। फिर भी क्लास चल रहा है! जाहिर है पढ़ाई के नाम पर इस दौरान जो कुछ भी हुआ होगा, वह बच्चों को अच्छी सीख देने वाला कतई नहीं होगा। यह पढ़ाई हो ही नहीं सकती।

चाकू लेकर घुसे कंडक्टर की चेकिंग क्यों नहीं हुई
बच्चों के मां-बाप को अंदर आने से रोकने के लिए गेट बंद कर दिए गये। पुलिस भी उन्हें अंदर आने से मना कर रही थी। लेकिन, जिनके कलेजे के टुकड़े कैम्पस में हों और कैम्पस में ख़ौफ़ पैदा करने वाली वर्दी टहल रही हो, तो मां-बाप अपनी जान देने को भी तैयार हो जाते हैं लेकिन बच्चे को कैम्पस में इस हाल में कतई नहीं छोड़ सकते। झड़प के बाद अभिभावक जबरदस्ती स्कूल में घुसते हैं और तभी स्कूल में छुट्टी हो पाती है। अगर ये लोग ऐसा नहीं करते, तो स्कूल में ‘पढ़ाई' चल रही होती। हत्या की बात कबूल कर चुके कंडक्टर के हाथों में सब्जी वाली चाकू थी, वह सिक्योरिटी गार्ड के लिए जाना-पहचाना था इसलिए उसकी चेकिंग नहीं हुई, स्कूल प्रबंधन या शिक्षकों को क्या पता कि टॉयलेट में कोई हत्यारा है...ये सब ऐसी बातें हैं जो स्कूल का बचाव नहीं करतीं, उसकी लापरवाही को सामने लाती है। सीसीटीवी है, लेकिन वह ख़राब है। तो इसका ज़िम्मेदार स्कूल प्रबंधन के अलावा भी कोई हो सकता है?

बच्चे का ख़ून को साफ कराने में बच्चों की मदद ली गई
स्कूल प्रबंधन की सोच तो देखिए। एक बच्चे के ख़ून को साफ कराने में भी बच्चों की मदद ली गयी, उसके बैग भी बच्चे से ही सर्च कराया गया। सोचिए उन बच्चों की मानसिक अवस्था क्या होगी! लेकिन ये भी सोचिए कि जिन लोगों ने ऐसा किया, उनकी मानसिक अवस्था को क्या कहेंगे? दरअसल मां-बाप ने अपने कलेजे के टुकड़े को जिन हाथों में स्कूल के भीतर सौंपा, उन्होंने उन्हें ‘कलेजी' समझा। मोटी फीस का स्वाद, बच्चों से अमानवीय बर्ताव और उनके साथ लापरवाही इसी सोच का नतीजा है। ये वही रायन स्कूल है जिसके नोएडा ब्रांच में इसी साल 12 मई को एक बच्चे की लाश मिली थी। उस मामले में भी बच्चे की हत्या की बात सामने आयी। खूब हंगामा हुआ। मगर, रेयान प्रबंधन की सोच नहीं बदली। तब भी किसी तरह मामले में नहीं फंसने का रुख, अब भी वही रुख। अपने बचाव में हर तरह की अमानवीयता।

अकसर स्कूल मौत के असली कारणों को छिपाते हैं
बात सिर्फ रायन स्कूल की नहीं, हर स्कूल का रवैया एक जैसा रहा है। इंदिरापुरम के जीडी गोयनका स्कूल में अरमान की मौत ऊंचाई से गिरने की वजह से होती है। मौत के असली कारणों को छिपाया जाता है। अरमान की मां स्वाति सहगल की मानें तो पुलिस स्कूल प्रबंधन के साथ मिलकर मनमाने तरीके से जांच को दबा रही है। सीसीटीवी फुटेज दिखाने तक को स्कूल प्रबंधन अभिभावक को तैयार नहीं है। स्वाति मौत की इन घटनाओं के पीछे शिक्षा माफिया को जिम्मेदार बताती हैं। 14 जुलाई 2017 की एक और घटना है जो दिल्ली के रोहिणी में बेगमपुर में घटी। यहां पांचवीं क्लास के स्टूडेंट विशाल को क्लास के ही बच्चों ने इतना पीटा कि वह सीधे घर जाकर सो गया और अगले दिन स्कूल जाने के लिए उठने लायक नहीं था। गम्भीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया और रास्ते में उसकी मौत हो गयी। नोएडा के सेक्टर 63 में 5 साल के बच्चे को स्कूल की महिला टीचर ने बेरहमी से पीटा। फिर, अस्पताल में भी इलाज के दौरान लापरवाही हुई, ऐसा परिजनों का आरोप है। आखिरकार इस मासूम की मौत हो गयी। देश ने लखनऊ के जॉन व्यानी स्कूल का नज़ारा भी टीवी पर देखा है। किस तरह एक महिला टीचर बच्चे के गाल पर एक के बाद एक 50 चाटे जड़ रही हैं। 27 चाटों की तो सीसीटीवी फुटेज सामने आ गयी। ऐसी लोमहर्षक घटनाएं लगातार हो रही हैं। हर घटना में शिकार है मासूम बच्चा, शिकार हैं मासूम के परिजन जो अपने कलेजे के टुकड़े को भेजते तो हैं शिक्षा लेने, लेकिन सबक ऐसा मिल जाता है कि सुधार का भी मौका नहीं मिलता। बस आंसू ही ज़िन्दगी के हिस्से में बच जाते हैं। आखिर बच्चे स्कूल कैम्पस में सुरक्षित कैसे रहें? अगर ऐसा नहीं हो सकता है तो इस पढ़ाई की ज़रूरत ही क्यों है? इससे तो अच्छा है कि बच्चे निरक्षर रहें। लानत है ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर, ऐसे स्कूलों पर और उनकी सोच पर।












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