संसद में माइक्रोफोन चालू और बंद करने के क्या हैं नियम, कौन करता है ये काम ?
संसद सदस्यों के माइक्रोफोन को संचालित करने के लिए दोनों सदनों के सचिवालय के विशेष स्टाफ काम करते हैं। वह साउंड चैंबर में होते हैं, जहां से हर सदस्य का माइक जुड़ा रहता है।

संसद में माइक्रोफोन बंद करने का कथित मामला अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। लेकिन, सवाल है कि क्या ऐसा होता है? होता है तो इसके लिए क्या नियम हैं ? ऐसा करने की जिम्मेदारी किसकी होती है ? वह किन निर्देशों का पालन करते हैं? किन विशेष परिस्थितियों में माइक्रोफोन बंद करने का प्रावधान है ? दरअसल, कांग्रेस नेता राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि संसद में उन्हें बोलने नहीं दिया जाता है। बोलने दिया जाता है तो उनकी माइक बंद कर दी जाती है। इससे जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं के बारे में संसद की कार्यवाही को कवर करने वाले पत्रकारों और जानकारों ने बताया है।

संसद में माइक्रोफोन बंद करने के क्या नियम हैं ?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी आरोप लगा लगा रहे हैं कि संसद में उन्हें बोलने नहीं दिया जाता, उनके भाषण के दौरान उनकी माइक बंद करके उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जाती है। दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी के एक और नेता अधीर रंजन चौधरी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला को बुधवार को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उनका माइक्रोफोन तीन दिनों तक म्यूट रखा गया। सवाल गंभीर है कि संसद में माइक्रोफोन बंद कौन करता है, यह किसका अधिकार है और इसके लिए नियम या निर्धारित प्रोटोकॉल क्या हैं? क्योंकि, इस मुद्दे का कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश की गई है।

साउंड चैंबर में होती है माइक्रोफोन चालू-बंद करने की व्यवस्था
एक्सपर्ट और जो पत्रकार संसद की कार्यवाही को कवर करते रहे हैं, उनका कहना है दोनों सदनों में प्रत्येक सदस्यों के बैठने के लिए सीट निर्धारित रहती है। उनके डेस्क से ही माइक्रोफोन जुड़ा होता है और सीट के हिसाब से ही उसका नंबर भी निर्धारित रहता है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक साउंड चैंबर होता है, जहां साउंड इंजीनियर और टेक्निशियन बैठते हैं। इन चैंबरों में सभी सीट नंबर वाला एक इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड लगा होता है। सारे माइक्रोफोन को चालू और बंद करने की व्यवस्था यहीं पर होती है। चैंबर के अगले हिस्से में शीशा लगा है, जहां से ये लोग सदन के अंदर की कार्यवाही देख रहे होते हैं। वह स्पीकर और सभापति समेत बोलने वाले सभी सांसदों को भी देख सकते हैं।

सचिवालय स्टाफ निभाते हैं बड़ी जिम्मेदारी
प्रक्रिया के तहत माइक्रोफोन को चालू और बंद करने का काम लोकसभा और राज्यसभा के सचिवालयों के स्टाफ द्वारा किया जाता है। जानकारों के मुताबिक इसकी एक पूरी प्रक्रिया निर्धारित है और यह काम नियम के तहत ही किया जाता है। यह काम मैन्युअली होता है और तब किया जाता है, जब संसद की कार्यवाही किसी वजह से बाधित होती है। गौरतलब है कि लोकसभा की कार्यवाही को संचालित करने का पूर्ण अधिकार स्पीकर और राज्यसभा में सभापति के पास होता है। इन दोनों की अनुपस्थिति में डिप्टी स्पीकर और उपसभापति या फिर पीठासीन अधिकारी के निर्देशानुसार सदन की कार्यवाही संचालित होता है।

साउंड चैंबर के स्टाफ के पास ही स्विच होती है
शून्य काल के दौरान यानि प्रश्न काल के तत्काल बाद के समय में संसद के एक सदस्य को अपनी बात रखने के लिए सिर्फ 3 मिनट का समय मिलता है और उसके बाद उसका माइक्रोफोन खुद बंद हो जाता है। जबकि, बहस के दौरान आसन से दलों के लिए बोलने के वास्ते अलग-अलग समय आवंटित किया जाता है। आसन अपने अधिकार से किसी सदस्य को निर्धारित समय से कुछ समय ज्यादा भी आवंटित कर सकता है। किसी खास परिस्थिति में सांसदों के पास पढ़ने के लिए 250 शब्दों की सीमा निर्धारित है। जैसे ही यह शब्द संख्या पूरी होती है माइक कट हो जाता है। जो पत्रकार संसद की कार्यवाही को कवर करते रहे हैं, उनके मुताबिक माइक बंद करने का यह काम साउंड चैंबर में बैठे स्टाफ की ओर से किया जाता है।
Recommended Video

क्या कहते हैं एक्सपर्ट ?
एक्सपर्ट के मुताबिक यह सारा काम निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही होता रहता है। विशेष परिस्थितियों में स्पीकर या सभापति माइक्रोफोन को बंद करने के निर्देश देते हैं। यह उसी तरह से होता है, जैसे आसान से कुछ शब्दों को सदन के रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दिया जाता है। लोकसभा सचिवालय के एक वरिष्ठ पद से रिटायर हुए एक अधिकारी ने कहा है कि माइक्रोफोन बंद करने का दावा काफी चौंकाने वाला लगता है। मुझे नहीं लगता है कि ऐसा कुछ हुआ होगा। गौरतलब है कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ ने माइक्रोफोन बंद किए जाने के कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के आरोपों को 'सबसे बड़ा झूठ' बताते हुए, उन्हें इमरजेंसी के 'काले इतिहास' का अतीत याद दिलाया था।












Click it and Unblock the Notifications