स्थापना के शताब्दी वर्ष कार्यक्रमों में सामाजिक समरसता पर जोर देगा आरएसएस
आरएसएस अपनी स्थापना की 100वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारियों में जुट चुका है। इस दौरान संघ की कार्य प्रणाली से लेकर संगठन तक में भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। संघ में जो पहले नहीं हुआ, अब होने की संभावना है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी बदलती परिस्थियों के अनुसार अपनी चाल-ढाल और संगठन में बदलाव की सोच रहा है। दो साल बाद आरएसएस की स्थापना के 100 साल पूरे होने जा रहे हैं। इस मौके पर संघ अपने संगठन के ढांचे को इस तरह से तैयार करना चाहता है, जो उसके संगठन में भी स्पष्ट तौर पर दिखाई भी पड़े। क्योंकि, उसे लगता है कि विरोधियों की ओर से उसके प्रति जो धारणा बनाई जा रही है, उसे बदलना अभी समय की मांग है।

व्यापक हिंदू समाज के समावेश पर संघ का जोर
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 2025 में 100 वर्ष पुराना संगठन होने जा रहा है। हाल ही में संघ के सर संघचालक और अन्य पदाधिकारों ने समान विचारधारा वाले बुद्धिजीवियों के साथ दो दिनों तक इस बात पर मंथन किया है कि किस तरह से व्यापक हिंदू समाज को संघ के साथ समावेश किया जाए और उनमें संघ को लेकर उनकी समझ को और स्पष्ट किया जाए। ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक जो लोग इस विचार मंथन से जुड़े रहे, उनके अनुसार आरएसएस इस बात पर फोकस कर रहा है कि कैसे इस 'राष्ट्रवादी-सामाजिक' संगठन के प्रति सही धारणा को मजबूत करना आवश्यक हो गया है।

'संघ का यह मुक्त चिंतन था'
इस वैचारिक मंथन से जुड़े सूत्रों ने कहा है कि 'यह एक मुक्त चिंतन था, इसमें संघ के 100 साल पूरे होने और इसे कैसे अधिक व्यापक हिंदू समाज के लिए अधिक स्पष्ट और समावेशी बनाया जा सकता है......इसपर खुलकर चर्चा हुई।' इसमें ऐसे भी विचार साझा किए गए कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में कैसे सही धारणा तैयार की जाए।

मोहन भागवत ने भी भविष्य के लिए पेश किया दृष्टिकोण
इस मौके पर मोहन भागवत ने इस बात को रखा कि संघ कैसे समय के साथ विकसित हुआ है और उन्होंने भविष्य के लिए भी अपना दृष्टिकोण पेश किया । कुल मिलाकर दो मुद्दों पर पूरी तरह से आम सहमति थी कि संघ का अपने व्यापक हिंदू समाज में समावेशिता के सिद्धांत और उसका इस संगठन पर भी असर निश्चित तौर पर दिखना चाहिए।

सामाजिक समरसता पर होगा फोकस
संघ हमेशा से हिंदू शब्द को बहुत ही व्यापकता के साथ सामने रखता रहा है। लेकिन, फिर अभी किस व्यापक हिंदू समाज में समावेशिता पर जोर दिया रहा है? किस तरह से सामाजिक समरसता पर फोकस रहेगा? यह सवाल संघ के विचारधारा से जुड़े एक व्यक्ति से पूछा गया। उन्होंने नाम नहीं जाहिर होने देने की शर्त पर कहा कि "मेरी समझ में इसका मतलब हुआ कि संघ में अब दलितों और पिछड़ों को भी व्यापक दायित्व दिया जा सकता है।"
Recommended Video

'एक बड़ा वर्ग छूट जाता है'
उनका कहना है कि "पहले संघ में जात-पात नहीं पूछा जाता था। जो योग्य होते थे, उन्हें ही जिम्मेदारी मिलती थी। लेकिन, इसमें एक बड़ा वर्ग छूट जाता है। संघ के विरोधी भी आरोप लगाते हैं कि ब्राह्मण-बनिया या ऊंची जातियों को प्राथमिकता मिलती है।" उनकी मानें तो संघ के विरोधियों के नरेटिव को बदलने के लिए ऐसे बदलाव समय की मांग है।

50 से ज्यादा बुद्धिजीवियों के बीच हुई चर्चा
संघ के इस मुक्त चिंतन बैठक में 50 से ज्यादा समान विचारधारा वाले बुद्धिजीवी शामिल हुए थे, उनमें पहले भाजपा के साथ भी जुड़े रह चुके बलबीर पुंज, शेषाद्री चारी, तरुण विजय जैसे लोग शामिल थे। इस बैठक में संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले भी शामिल हुए थे।












Click it and Unblock the Notifications