आरएसएस से जुड़े बीकेएस की रैली क्या किसान आंदोलन की मांगों की हवा निकालने के लिए हुई?
किसानों की मांगों का झंडा एक बार फिर से बुलंद हुआ है. अगस्त में दिल्ली के जंतर-मंतर के बाद सोमवार को रामलीला मैदान में किसान जुटे.
दोनों स्थानों पर उठाए गए मुद्दे भी अधिकतर एक जैसे ही थे, लेकिन कुछ मुद्दे थोड़े अलग भी थे.
सोमवार की किसान गर्जना रैली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस से जुड़े संगठन भारतीय किसान संघ ने बुलाई गई थी.
जबकि अगस्त में जंतर मंतर पर जमा खेतिहर उन किसान समूहों से जुड़े थे, जिन्होंने दिल्ली के बार्डर पर तक़रीबन साल भर तक आंदोलन किया था.
उस आंदोलन के बाद ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को विवादित कृषि क़ानूनों को वापस लेना पड़ा था.
इसके बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने अपना आंदोलन वापस ले लिया था.
तबसे केंद्र सरकार और एसकेएम के बीच कुछ मुद्दों पर रस्साकशी जारी है, जिसमें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को पद से हटाए जाने की मांग भी शामिल है.
दिल्ली में साल भर पहले लंबे समय तक चले किसान आंदोलन से बीकेएस दूर रहा था. और सोमवार को दिल्ली में हुई रैली से संयुक्त किसान मोर्चा दूर था.
बीकेएस की प्रेस रिलीज़ के अनुसार उनकी प्रमुख मांग है
- लागत के आधार पर किसानों को मुनाफ़ा के साथ भुगतान
- खेती के सामानों पर जीएसटी की पूरी समाप्ति
- केंद्र सरकार द्वारा किसानों की छह हज़ार रुपयों की दी जानेवाली सम्मान निधि में बढ़ोतरी
- जीएम फ़सलों की अनुमति को वापस लिया जाना.
भारतीय किसान संघ ने गर्जना रैली में देश के 600 ज़िलों से 30 से 50 हज़ार किसानों के दिल्ली पहुँचने का ऐलान किया था.
शामियाने में हालाँकि ख़ालीपन दिखा. लेकिन रैली में जम्मू-कश्मीर से लेकर आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र तक के किसान दिखे.
किसानों की मांगें
जम्मू के रियासी से 200 लोगों के साथ बसों से आए रोमेल सिंह का कहना था कि उनके क्षेत्र की दिक्क़त है मंडियों का न होना. इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से ख़रीद संभव ही नहीं हो पाती.
रोमेल सिंह राज्य की बीकेएस ईकाई के उपाध्यक्ष हैं.
उनके साथ मौजूद महेश्वर सिंह कहते हैं, "राज्य में गवर्नर शासन लगने के बाद वो कई दफ़ा शासन के शीर्ष लोगों से मामले को उठा चुके हैं लेकिन किसी तरह की कार्रवाई नहीं हुई."
कुछ किसान नेताओं ने मंच से ऐसी बातें भी कहीं, जिसे राजनीतिक चेतावनी भी कहा जा सकता है.
जैसे मंच से ये भी कहा गया- जो किसान पहाड़ों को काटकर खेती योग्य बना सकता है, उसे सरकार को उखाड़ने में देर नहीं लगेगी. लगता है सरकारों को किसानों की ताक़त का अंदाज़ा नहीं, लगता है प्रधानमंत्री को गणित नहीं आती तो हमसे पूछ लें हम बता देंगे.
राजस्थान के झालावर के नानौर गाँव से आए बालू सिंह चौहान ने पारंपरिक राजस्थानी पगड़ी बांध रखी थी. उन्होंने कहा कि सरकार विदेशी कंपनियों को बीज बेचने की जो छूट दे रही है, वो किसानों की पगड़ी सिर से खींच लेगी.
बालू सिंह चौहान कहते हैं, "भारत के बाहर से जो बीज आ रहा है वो ग़लत है, बीज जो किसान पैदा करे वही लगाए. बाहर की कंपनियों की फ़सल से हम बीज नहीं निकाल सकते जिसके नतीजे हर साल हमें मंहगे दामों पर बीज ख़रीदने को मजबूर होना पड़ता है."
फ़सल बीमा और बीमा कंपनियों की कथित धांधली का मामला यहाँ भी गर्म रहा.
किसान बीमा पर सवाल
राजस्थान से ही आए एक किसान का कहना था,"बीमा के मामलों में प्रीमियम की अठारह प्रतिशत राशि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर देते हैं जबकि दो प्रतिशत किसान. जो पैसा सरकार कंपनी के खाते में डालती है वो सीधे किसानों के खाते में डाल दे तो किसान के किसी बीमा प्रीमियम की ज़रूरत नहीं होगी."
लेकिन क्या इससे ये डर नहीं रहेगा कि किसान बीमा कराएगा ही नहीं.
इस पर उत्तर प्रदेश के एक किसान कहते हैं कि सबसे ग़लत नीति है कई इकाइयों को मिलाकर बीमा किया जाना जिसका नतीजा ये होता है कि जब तक कई गाँवों में फ़सलों का नुक़सान नहीं होता है किसान को बीमा का पैसा नहीं मिलता है. हर इकाई का अलग-अलग बीमा किया जाना चाहिए.
कांति भाई पटेल गुजरात के खेड़ा से आए हैं और उनके अनुसार हाल में कई मांगों को लेकर '48 दिनों धरने पर बैठे थे लेकिन उन्हें यक़ीन है कि नरेंद्र मोदी उनकी बात ज़रूर सुनेंगे.'
झालावर से आए बालचंद नाई कहते हैं, "एक आलू से कंपनियाँ 30-35 रुपया कमा रही हैं, पॉकेट में भरकर जो चिप्स बनाकर बेचती हैं जबकि किसानों को एक किलो आलू के लिए पाँच रुपये मिलते हैं."
मध्य प्रदेश के एक किसान का कहना था कि कांग्रेस वायदे के मुताबिक़ हमारी क़र्ज़ तो माफ़ न कर सकी लेकिन शिवराज जी की सरकार कम से कम उस पर ब्याज लेना तो बंद करे.
जब किसानों से ये पूछा गया कि कुछ इसी क़िस्म की मांगें तो संयुक्त मोर्चा की भी रही है लेकिन फिर वो लोग इससे दूर क्यों रहे?
इस पर कुछ लोगों का कहना था कि उस आंदोलन में देश भर के किसान शामिल नहीं थे.
बीकेएस के ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी मोहनी मोहन मिश्र ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री को याद दिलाया कि साल 2022 आ गया है वायदे पूरा करने को बहुत समय नहीं बचा है. उनके ऐसा कहते ही नारे लगते हैं- हम अपना अधिकार मांगते, नहीं किसी से भीख मांगते.
बीकेएस की रैली पर सवाल
जब बीबीसी ने उनसे ये सवाल पूछा कि इतनी नाराज़गी के बाद भी हर चुनाव में तो बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी की ही जीत हो रही है, इसके जवाब में वो कहते हैं कि 'किसानों की आवाज़ टूट टूटकर उठ रही है कुछ लोग मान रहे हैं कि सिर्फ़ पंजाब-हरियाणा ही देश है, इस देश में सिर्फ़ धान, गेहूँ, गन्ना ही नहीं उगता, यहाँ फूल उगता है, मछली, दूध की भी खेती होती है.
यह पूछने पर कि अलग रहने का फ़ैसला किसका था, बीकेएस का या मोर्चे का, इस पर उन्होंने आंदोलन को अराजनैतिक और अहिंसक रखने की अपनी शर्त की बात की और कहा कि मोर्चा ये नहीं कर पाया.
संयुक्त किसान मोर्चा हर दिन की प्रेस कांफ्रेस में अपने अराजनीतिक होने की बात दोहराता रहता था. हालाँकि उसके कुछ सदस्य पश्चिम बंगाल के चुनाव में गए थे. बाद में समूह से जुड़े चंद लोगों ने अपने राजनीतिक दल भी तैयार किए हालांकि उन्हें बहुत कामयाबी हासिल नहीं हुई.
किसान नेता पुष्पेंद्र सिंह ने बीबीसी से फोन पर बातचीत करते हुए कहते हैं कि बीकेएस की गर्जना रैली कुछ नहीं सरकार के ख़िलाफ़ किसानों के भीतर चल रही स्टीम को कम करना है.
वे कहते हैं, "अब जब ये रैली हो गई तो बहुत सारे किसानों को ये थोड़े ही न मालूम होगा कि किसने करवाई है वो सोचेगा कि किसान संगठन ने हमारी बात उठा दी है अब हम बार-बार सड़कों पर क्यों उतरें?"
पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं, "सरकार ने जो बातें कृषि क़ानूनों को वापस लेते समय कही थीं जैसे किसानों के विरूद्ध लगाए गए मुक़दमों की वापसी या एसएसपी पर क़ानूनी गारंटी वो ही पूरी करने को तैयार नहीं तो आगे बात कैसे बढ़ेगी."
मोहनी मोहन मिश्र मानते हैं कि तीन विवादित कृषि क़ानूनों में से कई को उनका समर्थन था और वो चाहते थे कि इसमें कुछ संशोधन के बाद उन्हें लागू कर दिया जाए.
बीकेएस के एक के बाद दूसरे नेताओं ने संगठन के ग़ैर-राजनीतिक होने की बात को बार-बार दोहराया
बीकेएस की मांगों में सरकार के मंत्री को हटाए जाने और उनके बेटे के ख़िलाफ़ केस या पिछले आंदोलन में मोर्चे के दावे के मुताबिक़ मारे गए 750 किसानों की मौत का मुआवज़ा जैसी मांग नहीं है, न ही एमएसपी को क़ानूनों गारंटी देने की.
गर्जना रैली को लेकर जानकार कहते हैं कि किसान निधि को सालों से बढ़ाने की बात चल रही है और संभव है कि सरकार इसे बढ़ा भी दे. लेकिन इसका श्रेय इन हालात में किसको मिलेगा ये सबको मालूम है.
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