रोहिणी आयोग की OBC सब-कोटा रिपोर्ट, मोदी सरकार के लिए आफत या अवसर?

ओबीसी सब-कोटा तय करने के लिए बनाए गए जस्टिस रोहिणी आयोग ने करीब 6 वर्ष पूरे होने और 14 बार कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद आखिरकार सोमवार को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी है। 31 जुलाई, 2023 को इसके आखिरी विस्तार का अंतिम दिन था।

अब यह केंद्र में सत्ताधारी मोदी सरकार को तय करना है कि क्या वह ओबीसी आरक्षण के अंदर इसके अनुसार कोटा में बदलाव करने का फैसला करती है। देश में ओबीसी को 27% आरक्षण उपलब्ध है। लेकिन, यह शिकायतें रही हैं कि इसका फायदा असल में कुछ मुट्ठी भर प्रभावशाली ओबीसी जातियों को ही मिली हैं। अधिकतर इससे वंचित रह जाते हैं।

rohini commission report on obc sub quota

सभी ओबीसी जातियों को उचित लाभ देना है मकसद
हालांकि, रोहिणी आयोग की ओर से क्या सिफारिशें की गई हैं, यह जानकारी अभी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आई हैं। लेकिन, इसको लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। इस आयोग का गठन 2017 के अक्टूबर में किया गया था। तब यह संभावना जताई जा रही थी कि केंद्र सरकार ओबीसी को मिले 27% आरक्षण का लाभ इसमें सब-कोटा निर्धारित करके उन अति-जातियों तक भी पहुंचाना चाहती है, जो अबतक इससे वंचित रहती आई हैं।

ओबीसी कोटा के उप-वर्गीकरण का मकसद ही यही है कि ओबीसी लिस्ट में शामिल सभी जातियों को इसका उचित लाभ प्राप्त हो सके, ये नहीं कि कुछ सीमित जातियां ही इसका फायदा उठाती रह जाएं। क्योंकि, शिकायतें रही हैं कि ओबीसी में भी आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक तौर पर सशक्त जातियों को बेहतर प्रतियोगी क्षमताओं की वजह से इस वर्ग में भी अधिकतर पिछड़ी जातियों की तुलना में इसका ज्यादा लाभ मिलता है।

अति-पिछड़ी जातियां बीजेपी के लिए अवसर?
कई जानकारों का मानना रहा है कि भाजपा की रणनीति इसके माध्यम से 'अति-पिछड़ी' जातियों को लुभाने की है। गौरतलब है कि यूपी, बिहार समेत अधिकतर हिंदी-भाषी राज्यों में अति-पिछड़ी जातियां एक बहुत बड़ा वोट बैंक हैं और पिछले कुछ चुनावों से यह पार्टी के कोर-वोटर बनकर भी उभर रही हैं।

बीजेपी के सामने क्या हो सकती है चुनौती?
लेकिन, तथ्य यह भी है कि बीजेपी इस मसले पर शुरू में जितनी सक्रिय नजर आई थी, बाद में उसके उत्साह में थोड़ी कमी नजर आने लगी। जानकारों की मानें तो 2018 के दिसंबर में तीन हिंदी-भाषी राज्यों में पार्टी को जो हार मिली थी, उसके बाद अंदर ही अंदर एक यह चिंता पैदा हुई थी कि कहीं ओबीसी को सब-कोटा में विभाजित करने से विवाद न खड़ा हो जाए; और पार्टी ऐसा हरगिज नहीं चाहेगी।

इन प्रभावशाली ओबीसी जातियों की नाराजगी का खतरा
यह तय है कि ओबीसी कोटा के उप-वर्गीकरण से जो कुछ प्रभावशाली पिछड़ी जातियां 27% आरक्षण का पूरा फायदा उठाती रही हैं, वह नाराज हो सकती हैं। ये ओबीसी जातियां इतनी प्रभावशाली हैं कि उनकी नाराजगी चुनावों पर भी असर डाल सकता है। इन जातियों की न सिर्फ आबादी अच्छी-खासी है, बल्कि यह संसाधनों से भी भरपूर हैं और इनका राजनीतिक वर्चस्व भी रहा है।

तथ्य ये है कि कुछ प्रभावशाली राजनीतिक पार्टियां मंडलवादी सियासत के लिए ही मशहूर रही हैं और यही उनकी सियासत का आधार रहा है। उदाहरण के लिए बिहार में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और यूपी में समाजवादी पार्टी का नाम लिया जा सकता है।

यही वजह है कि जबसे ओबीसी के सब-कोटा की चर्चा शुरू हुई है, बिहार में सत्ताधारी आरजेडी ने जातिगत जनगणना पर जोर देना शुरू कर दिया है। इन पार्टियों की दलील है कि जातियों की गिनती के बाद ही सरकार नौकरी देने के वक्त उप-वर्गीकरण का सही लाभ दे सकती है। ऐसे में देखने वाली बात है कि मोदी सरकार रोहिणी आयोग की रिपोर्ट पर क्या कदम उठाती है।

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