BJP में RLD का विलय होगा या नहीं, जानिए पूरा सच

उत्तर प्रदेश में 2017 विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी सभी पार्टियों के लिए भाजपा-आरएलडी के गठबंधन की सुर्खियों को पचा पाना इतना सहज नहीं था। हालांकि ये बात जितनी अन्य दलों के लिए चौंकाने वाली थी उतना ही रालोद के अंदरूनी खेमे के लिए भी स्तब्ध कराने वाली। लेकिन तमाम सुगबुगाहटों पर उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या ने फुल स्टॉप लगा दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा-रालोद का विलय कभी नहीं होगा।

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लेकिन फिर भी भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की मानें तो भाजपा दुनिया के सामने अपने पत्ते खोले या न खोले, लेकिन अंदर ही अंदर बात-चीत चल रही है। पूरा मामला संभावनाओं पर टिका हुआ है। हमने सियासी पार्टियों के भीतर से भी सच सामने लाने की कोशिश की।

आखिर कौन करेगा ये गलती?

गठबंधन के नजरिए से बात गर भाजपा की है तो उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी के लिए पार्टी इस मुद्दे को नजरंदाज करने की भूल नहीं कर सकती। वहीं अजीत सिंह की पार्टी यानि की आरएलडी 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में हाशिए पर चली गई। माना जा रहा था कि 2013 में मुजफ्फर नगर में हुए दंगों की वजह से दोनों पार्टियों के बीच की खाई और गहरी होती गई। लेकिन फिलवक्त जरूरत दोनों को एकदूसरे को है।

दिल्ली-बिहार सरीखे फिर से भाजपा हार का चेहरा देखना बिलकुल भी पसंद नहीं करेगी। जिसके बाद विकल्प के रूप में, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मजबूत वोट बैंक को साधने में सहायक होने वाली आरएलडी के साथ हाथ मिलाने में चूक शायद ही भाजपा करना पसंद करे।

सियासत में कौन, कितना सच्चा?

सूत्रों ने दावा किया कि दोनों ही दल अपनी राजनीतिक मजबूरी के चलते एक-दूसरे से समझौता करने को आतुर हैं, हालांकि इसका दारोमदार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर है।

विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे पर सहमति बनी तो रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह को केन्द्र में मंत्री बनाया जा सकता है। सूत्रों की मानें तो राष्ट्रीय लोकदल के भाजपा में विलय होने के बाद अजीत सिंह भाजपा की मदद से राज्यसभा में जा सकते हैं।

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आपको बताते चलें कि 4 जुलाई को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के 11 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इन सबके इतर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा इस बात को सिरे से खारिज किए जाने के बाद भी कयासें वहीं की वहीं हैं।

इनकी बढ़ जाएंगी मुश्किलें!

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता माने जाने वाले चौधरी अजीत सिंह के द्वारा राष्ट्रीय लोकदल के भाजपा में विलय की पुष्टि होने के साथ ही सियासी उलझनों का बढ़ना भी स्वाभाविक है।

क्योंकि एक ओर अगर जन विकास पार्टी का ख्वाब अपने आधे रास्ते में ही औंधे मुंह गिरकर टूट जाएगा वहीं समाजवादी पार्टी में बेनी की वापसी के बाद आंकड़ों में हुई तब्दीली, भाजपा के साथ आरएलडी आने के बाद भी इसी तर्ज पर देखी जाएगी। ऐसी स्थिति उत्तपन्न होने पर बसपा, सपा के लिए चिंता की बात है।

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