सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण के फैसले में ये हैं 5 बड़ी चुनौतियां
नई दिल्ली। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बड़ा सियासी दांव चलते हुए आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने का ऐलान किया है। केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव पर मुहर भी लग चुकी है। कैबिनेट के इस फैसले पर गौर करें तो आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को नौकरी और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। इतना ही नहीं सरकार संविधान में संशोधन के जरिए आरक्षण का कोटा बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। भले ही सरकार इस फैसले को लेकर बेहद गंभीर नजर आ रही हो लेकिन जानकारों के मुताबिक ये इतना आसान नहीं होगा। इस फैसले को लागू करने में राजनीतिक और कानूनी दोनों ही मोर्चों पर कई चुनौतियां सामने आ सकती हैं। जानिए, इस फैसले को लेकर कौन-कौन सी पेचीदगियां आ सकती हैं...

संसद में सबसे बड़ा टेस्ट
मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने का फैसला तो कर लिया है, हालांकि उसके रास्ते में मुश्किलें भी कई हैं। पहली समस्या, संसद के दोनों सदनों से इसे दो-तिहाई बहुमत से पास कराने की चुनौती है। ज्यादातर पार्टियां वैसे तो इसका विरोध तो नहीं करेंगी, लेकिन उनकी कोशिश ये जरूर होगी कि इसे टाला जा सके। जिससे आम चुनाव में बीजेपी इसका श्रेय नहीं उठा सके।

सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा
अगर ये मान भी लें कि ये बिल संसद से पास भी हो गया तो सुप्रीम कोर्ट में क्या यह संविधान संशोधन टिक पाएगा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय कर रखी है। आखिर सरकार सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बारे में क्या तर्क रखेगी, जिसमें बराबरी के अधिकार की रक्षा के लिए कोर्ट ने तय किया था कि आरक्षण की सीमा पचास फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती है।

क्या कहते हैं कानूनी जानकार
आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण के केंद्र सरकार के फैसले पर कानूनी जानकारों की राय बिल्कुल जुदा है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय कर रखी है। अगर आरक्षण का आंकड़ा इसे पार करता है तो मामला समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने जाएगा। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस फैसले पर स्टे लग सकता है। इसकी अहम वजह ये है कि सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा है कि 50 फीसदी की सीमा से ज्यादा आरक्षण कतई नहीं हो सकता है। कोर्ट के फैसले के अनुसार अगर आरक्षण में कोई सरकार 50 फीसदी की सीमा पार करती है तो ये जूडिशल स्क्रूटनी के दायरे में आएगा। कुल मिलाकर मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में केंद्र का फैसला आगे बढ़ पाना बेहद मुश्किल नजर आ रहा है।

लोकसभा चुनाव पर असर
केंद्र सरकार आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण के संबंध में संविधान संशोधन विधेयक संसद में लाएगी, इस पर क्या फैसला होगा ये तो पता नहीं लेकिन यह तय है कि यह मुद्दा आगामी लोकसभा चुनाव के प्रमुख मुद्दों में से एक होगा। बीजेपी को आम चुनाव के लिए एक अहम मुद्दा मिल गया है। यह पास हो गया तो भारतीय जनता पार्टी को चुनावी फायदा जरूर मिलेगा। अगर नहीं पास हुआ तो पार्टी इसे भी भुनाने की कोशिश जरूर करेगी। ऐसे में फैसला आम जनता को करना होगा।

क्या है आरक्षण का नियम
संविधान के अनुसार, आरक्षण का पैमाना सिर्फ और सिर्फ सामाजिक असमानता पर निर्भर है। किसी की आर्थिक स्थिति और संपत्ति के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार, कोटा किसी समूह को दिया जाता है, किसी व्यक्ति को नहीं। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है। इस आधार पर पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने कई बार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के फैसलों पर रोक लगा चुका है।

कब-कब खारिज हुए हैं आरक्षण से जुड़े फैसले?
* अप्रैल, 2016 में गुजरात सरकार ने सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 फीसदी आरक्षण का ऐलान किया था। इस फैसले में 6 लाख रुपये से कम वार्षिक आय वाले परिवारों को इसके अधीन लाने की बात कही गई थी। हालांकि अगस्त 2016 में हाईकोर्ट ने इसे गैरकानूनी और असंवैधानिक बताया था।
* सितंबर, 2015 में राजस्थान सरकार ने अनारक्षित वर्ग के आर्थिक पिछड़ों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 14 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया था। हालांकि दिसंबर, 2016 में राजस्थान हाईकोर्ट ने इस आरक्षण बिल को रद्द कर दिया था। हरियाणा में भी ऐसा ही हुआ था।
* 1978 में बिहार में पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण देने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने आर्थिक आधार पर सवर्णों को तीन फीसदी आरक्षण दिया था। हालांकि बाद में कोर्ट ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया।
* 1991 में मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने के ठीक बाद पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया था और 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी, हालांकि 1992 में कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था।

ये पार्टियां कर चुकी हैं गरीब सवर्णों को आरक्षण की मांग
- केंद्र की एनडीए सरकार में शामिल एलजेपी के मुखिया राम विलास पासवान और आरपीआई के अध्यक्ष रामदास अठावले भी आर्थिक आधार पर सवर्णों को आरक्षण की मांग कर चुके हैं।
- टीडीपी अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने भी 2016 में कहा था कि सर्वे करा के अपने प्रदेश में सवर्ण गरीबों को आरक्षण देंगे।
- साल 2007 में जब बीएसपी की सरकार यूपी में आई और मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने सवर्ण गरीबों के लिए आरक्षण की मांग की थी। कांग्रेस ने भी इसका समर्थन किया था। इसके बाद भी मायावती ने एक कई बार गरीब सवर्णों को आरक्षण की मांग दोहराई थी।
- 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने भी सवर्ण आयोग के गठन का वादा किया था। इसमें कहा गया था कि आयोग ऊंची जातियों के गरीब लोगों के उत्थान पर काम करेगी, इसमें आरक्षण भी शामिल है।
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