इतिहास के पन्नों से- याद रखना 10 मई,1857 और मंगल पांडे को
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) दिन- 10 मई, 1857। उस दिन दिल्ली से करीब 60 किलोमीटर दूर मेरठ में अंग्रेजों के खिलाफ पहली जंग लड़ी गई थी। ब्रिटिश सेना में काम करने वाले भारत माता के वीरों ने 50 अंग्रेज सिपाहियों को मार डाला था। ये घटना मेरठ कैंट में हुई थी।

उस विद्रोह की भूमिका काफी दिन पहले से बन रही थी। भारतीय सैनिक नाराज थे गोरों से। नाराजगी की एक वजह ये भी थी कि उन्हें उन कारतूसों को चलाने के लिए कहा जा रहा था जो गाय और सूअर के मांस से बने थे।
गोरों से खफा
इसके चलते हिन्दू-मुसलमान सभी गोरों से बेहद नाराज थे। वे उबल रहे थे। उन्हें कहीं न कहीं लग रहा था कि गोरे जान-बूझकर ये सब कर रहे हैं। इन्हें लगा कि गोरे उनके धर्म को भ्रष्ट कर रहे हैं।
मंगल पांडे को मत भूलो
मेरठ में क्रांति का बिगुल बजने से पहले मंगल पांडे बंगाल में शहीद हो चुके थे। पांडे को 29 मार्च,1857 के दिन फांसी पर लटकाया गया था। उनका कसूर था अपने गोरे अफसरों पर हमला बोलना। बहरहाल, 29 अप्रैल,1857 को भारतीय सिपाहियों ने उन कारतूसों का इस्तेमाल करने से मना किया। इस आरोप में 85 को डिसमिस किया गया। इससे भड़क गए थे बाकी भी भारतीय सैनिक। उन्होंने ही 10 मई, 1857 को गोरों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था।
विद्रोही दिल्ली में
अगले दिन विद्रोही दिल्ली पहुंचने लगे। इनका नेतृत्व करने के लिए आखिरी मुगल बादशाह बहादुशाह जफर तैयार हो गए। तब तक मुगल सल्तनत अपने अंतिम दिन गिन रही थी। विद्रोह की आग सारे देश में फैलने लगी थी। विद्रोह के चलते गोरी सरकार के हाथ-पैर फूल गए।
हिन्दू-मुसलमान मिलकर लड़े
अब मेरठ का चप्पा-चप्पा उस दौर की गवाही देता है। 1857 की क्रांति को आजादी की पहली जंग माना जाता है। सबसे बड़ी बात ये है कि तब गोरों के खिलाफ हिन्दू-मुसलमान मिलकर लड़े थे। उनका नेतृत्व बहादुरशाह जफर ने किया था। उस क्रांति को कभी देश को भूलना नहीं चाहिए।












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