क्या इन कारणों के चलते अमित शाह की लिस्ट से गायब हुए वरुण?
[मयंक दीक्षित]- बीते दिनों आईं खबरों में जिस ज़ोर-शोर से वरुण गांधी को उच्च पद पर प्रोजेक्ट किया गया और हाल में आई खबर ने उतने ही झटके से इन अरमानों पर पानी फेर दिया। केंद्रीय मंत्रिमंडल के बाद अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की ओर से शनिवार को घोषित पार्टी पदाधिकारियों की नई टीम में कुछ उम्मीदें टूटीं तो कुछ आश्चर्य पैदा हुए।

शाह की ओर से जारी 54 पदाधिकारियों की सूची में वरुण गांधी से पार्टी महासचिव का पद वापस लिया गया वहीं उन उम्मीदों के पर कतर दिए गए जिनमें वरुण को यूपी सीएम की गद्दी का हक़दार प्रोजेक्ट किया जा रहा था। राजनैतिक जानकारों की मानें तो फग्गन सिंह कुलस्ते का विरोध भले ही शाम तक पुरानी खबर हो जाएगा पर वरुण के साथ यह दांव बेहद सूझबूझकर खेला गया है।
आइए समझें क्या हो सकते हैं खतरे अगर वरुण को अभी मिल जाती उत्तर प्रदेश की कमान-
वर्चस्व का सवाल-
लोकसभा चुनाव के बाद जिस छवि के साथ अमित शाह उभर कर आए वह थी 'थिंक टैंक'। कम से कम यूपी में मिली भाजपा को शानदार जीत का श्रेय शाह को ही दिया गया। अगले दौर में आने वाले विधानसभा चुनावों में यदि शाह अपना यह प्रभुत्व कायम रखना चाहते हैं तो उन्हें यूपी को अपने नेतृत्व की छांव में रखना जरूरी है। राजनैतिक जानकारों में सुगबुगाहट है कि 'पेड़ अमित शाह लगाएं और फल वरुण ले जाएं'। हो सकता है कि इस तरह के परिणामों के चलते भी वरुण को इस बार इंतज़ार करने की नसीहत मिली हो। गौरतलब है कि यूपी में अखिलेश यादव के मुकाबले यदि किसी युवा को सीएम प्रोजेक्ट किया जा सकता है तो वो लगभग सिर्फ वरुण गांधी ही थे। संघ और शाह की नज़र में हो सकता है वरुण का आगामी प्रभुत्व झलका हो व उन्हें अभी वेटिंग लिस्ट में डालकर स्वयं शाह ने यूपी पर राज का इरादा ज़ाहिर किया हो।
वरिष्ठता का सवाल-
एक कारण यह भी हो सकता है कि पार्टी में विचार बना हो कि वरुण से कहीं ज्यादा वरिष्ठ नेताओं को मौका दिया जा सकता है। हालांकि अनुभव के मायने में वरुण को कम नहीं आंका जा सकता पर फिर भी उन्होंने क्षेत्रीय धारा से अलग किसी पहल पर अपना विशेष नेतृत्व नहीं दिया है। इस तर्क पर भी वरुण को यूपी में प्रोजेक्ट नहीं किया गया। मुमकिन यह भी है कि वरुण को बड़ी कमान सौंपने का निर्णय हुआ हो पर महासचिव का पद इसीलिए वापस लिया गया हो। पहले भी कई अहम निर्णयों में युवाअों व कम अनुभवी सदस्यों के साथ इस तरह के कदम उठाए गए हैं। वरिष्ठता व युवावस्था के बीच का अंतर भी वरुण को साइडलाइन करने का कारण हो सकता है।
कट्टरवादिता का सवाल-
वरुण गांधी अपने चुनावी क्षेत्र से लेकर बाकी क्षेत्रों में अपनी स्पष्टवादिता की वजह से जाने जाते हैं। यह 'स्पष्टवादिता' विपक्ष की नज़र में 'कट्टरवादिता' रही है। इसी प्रोजेक्शन के चलते वरुण को अभी वेटिंग में बिठाया गया हो। अखिलेश जैसे 'समाजवादी पार्टी' की मुख्यधारा के नेता से अचानक 'भाजपाई' विचारधारा के युवा को शायद यूपी की जनता ना पचा पाए। इस आशंका के चलते भी संभव है कि वरुण को साइडलाइन कर अमित शाह ने अपने व अपनी पसंद के व्यक्ति के लिए ज़मीन तैयार की हो। हालांकि वरुण व उनके समर्थकों ने इस पर किसी भी तरह का ऐतराज व विरोध नहीं जताया है। यह छवि आगे चलकर वरुण को फायदा पहुंचाएगी। हालांकि सवाल अभी भी बना हुआ है कि यूपी में किस चेहरे को तैयार कर रहे हैं अमित शाह?
प्री-प्रोजेक्शन का भय-
अक्सर राजनीति में देखने को मिला है कि जिस चेहरे को पहले से काफी प्रोजेक्ट किया गया, उसका असर वक्त आते-आते फीका पड़ गया। वरुण के नाम पर मां मेनका गांधी पहले ही एक सभा में नारे लगवा चुकी हैं। ऐसे में यदि अभी से वरुण को प्राथमिकता मिल जाती तो हो सकता है कि जनता में छवि यह बने कि पार्टी के निर्णय को भी ले रहा है। इस प्री-प्रोजेक्शन के चलते वरुण को साइडलाइन कर संभव है अमित शाह ने नई सूझबूझ पेश की हो। आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी सरकार के कमज़ोर होने का फायदा भाजपा को मिलना तय है। ऐसे में यूपी में बतौर सीएम कंडीडेट भाजपा को एक ऐसे व्यक्तित्व की तलाश है जो सभी कसौटियाें पर खरी उतरे। इसी के चलते टीम चुनते वक्त फूक-फूक कर कदम रखा गया है।
रिस्क-टेकिंग फैक्टर-
हालांकि वरुण अपने चुनावी क्षेत्र से पार्टी को हमेशा फायदा ही देते आए हैं पर सियासी तौर पर संजीवनी कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश शायद उन्हें स्वीकार ना करे व पार्टी का 'सुपर प्लान' धरा का धरा रह जाए। इस तरह की आशंकाओं के चलते भी वरुण को अभी किसी प्रमुख जिम्मेदारी देने से दूर रखा गया हो। लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश बेहद अहम भूमिका निभाता है। यदि भाजपा को यूपी से सीटें निकालने में दिक्कत हुई तो उसका लंबे समय तक मैदान में बने रहना मुश्किल हो सकता है। इसलिए पार्टी के लिए अभी गहन मंथन का वक्त है कि उत्तर प्रदेश में किस चेहरे पर 'दांव' लगाया जाए व किसके कंधे पर रखकर 'रणनीति' की बंदूक चलाई जाए जिससे निशाना सीधा वोटों पर ही लगे।












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