Temple cleanliness drive: पीएम मोदी के मंदिर स्वच्छता अभियान में क्या है अयोध्या से आगे का संदेश?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 जनवरी को महाराष्ट्र के नासिक में श्री कालाराम मंदिर से खुद साफ-सफाई की शुरुआत करके एक बार फिर से देश को स्वच्छता अभियान के लिए जगा दिया है। इसका असर ये हुआ है कि देशभर के मंदिरों और धर्म-स्थलों में स्वच्छता और ज्यादा बढ़ी है।

प्रधानमंत्री ने देश के हर व्यक्ति से आग्रह किया था कि मकर संक्रांति से मंदिरों और तीर्थस्थलों की साफ-सफाई के लिए आगे आएं। पीएम मोदी ने अयोध्या में 22 जनवरी को होने वाले भगवान राम लला के प्राण-प्रतिष्ठा से पहले तैयारी के तौर पर देश के नागरिकों को स्वच्छता के प्रति फिर से जगाने की कोशिश की है।

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तीर्थ स्थानों के महत्त्व के प्रति सामाजिक जागरूकता
पीएम मोदी ने जिस मौके पर खुद से मॉपिंग हाथ में लेकर यह अभियान शुरू किया है, उसमें एक बार फिर से बहुत बड़ा संदेश छिपा लग रहा है। पहली बात तो ये है कि वे इस माध्यम से पवित्र राम जन्मभूमि पर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को लेकर देशवासियों का उत्साह और बढ़ाना चाहते हैं। इस तरह से वह अन्य तीर्थ स्थानों की अहमियत के प्रति भी लोगों का ध्यान खींचना चाहते हैं।

एक बात और हो सकती है कि भगवान राम की प्राण-प्रतिष्ठा की वजह से देश में जो एक तरह का सकारात्मक माहौल बना है, उसकी गति को वह बनाए रखना चाहते हैं। क्योंकि, इसमें सिर्फ धार्मिक जुड़ाव नहीं है, यह विकास का भी एक बहुत बड़ा अभियान बनने जा रहा है। ऐसे मौके पर इंसानी जीवन के इस विशेष पहलु की अहमियत के प्रति लोगों को और ज्यादा जागरूक रखना चाहते हैं।

मंदिर स्वच्छता अभियान का सियासी संदेश?
भाजपा नेताओं और सरकार के मंत्रियों ने जिस तरह से इस अभियान को हाथों-हाथ लिया है, उसमें कुछ सियासी संकेत भी छिपा हो सकता है। मसलन, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इस देशव्यापी मंदिर स्वच्छता अभियान के लिए नई दिल्ली में करोल बाग स्थित संत रविदास मंदिर को चुना है।

पार्टी के नेता इस अभियान के तहत सिर्फ मंदिरों की सफाई पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। बल्कि मंदिर के परिसरों और आसपास की सफाई पर भी जोर दिया जा रहा है। नड्डा ने इसके लिए जिस गुरु रविदास मंदिर को चुना, वह दलित समाज के आदर्श हैं।

स्वच्छता अभियान से भी विपक्षी दलों की दूरी!
गौर करने वाली बात है कि कोई भी स्वच्छता अभियान किसी एक पार्टी का विषय नहीं हो सकता। यह तो पूरी मानवता से जुड़ा दृष्टिकोण है। प्रधानमंत्री ने सभी देशवासियों से इसमें शामिल होने को कहा भी है। लेकिन, अभी तक विपक्ष या विपक्षी इंडिया गठबंधन का कोई नेता इसमें शामिल होते नहीं दिखा है।

बड़ी बात ये है कि दिल्ली और पंजाब की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी का तो चुनाव निशान ही 'झाड़ू' है। लेकिन, फिर भी इस अभियान से उनकी दूरी में बीजेपी को अपने लिए फायदा दिख सकता है। भाजपा को लगता है कि बिना बताए ही इस स्वच्छता अभियान के माध्यम से विपक्षी दलों के बारे में जनता तक उनके रवैए को लेकर संदेश पहुंचाया जा सकता है।

अगर मंदिर स्वच्छता अभियान में छिपे राजनीतिक संदेश को और ज्यादा पढ़ने की कोशिश करें तो कुछ और बात निकलकर आती है। जैसे विपक्षी दल भाजपा और मोदी सरकार के खिलाफ हमेशा दलित और गरीब कार्ड चलने की ताक में रहते हैं। मोदी सरकार को सिर्फ अंबानी-अडानी के लिए काम करने वाली सरकार साबित करने की कोशिशों में रहते हैं।

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जब देश के प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट के मंत्रियों से लेकर दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाले दल के नेता भी पोछा और झाड़ू लगाते नजर आते हैं तो आरोपों और तथ्यों में साफ फर्क बताया जा सकता है।

इसके ठीक उलट विपक्षी दलों के नेता इस अभियन में जनता के बीच साफ-सफाई करते नजर नहीं आ रहे हैं। मतलब, भाजपा को लग सकता है कि इस अभियान के माध्यम से बिना प्रचार के विपक्ष के उन आरोपों की धार कम की जा सकती है।

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