व्हिप के उलझन से कैसे बचे राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश? नीतीश की पार्टी ने जारी किया था फरमान

सोमवार को जब राज्यसभा से दिल्ली सेवा विधेयक पास हुआ, तब आसन पर उपसभापति हरिवंश मौजूद थे। उनकी निगरानी में ही सदन में इस बिल पर वोटिंग हुई और उन्होंने ही सदन का फैसला सुनाया।

दरअसल, तकनीकी तौर पर हरिवंश बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के सांसद हैं। इस पार्टी ने दिल्ली सेवा विधेयक पर वोटिंग लिए अपने सांसदों को व्हिप जारी किया था। जेडीयू इस विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, जिसने इस विधेयक के खिलाफ वोटिंग की है।

rajya sabha deputy chairman harivansh

व्हिप के उल्लंघन से बच गए हरिवंश!
वोटिंग के दौरान आसन पर मौजूद होने की वजह से हरिवंश को मतदान में शामिल होने की जरूरत नहीं पड़ी। वह इसके लिए तभी बाध्य होते जब बिल के पक्ष और विरोध में बराबर वोट डाले जाते। संविधान के आर्टिकल 89 के अनुसार जब उपसभापति सदन का संचालन कर रहे हों, तो वह मतदान की प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सकते। वह सिर्फ तभी वोट दे सकते हैं, जब टाइ की स्थित पैदा होती है।

तकनीकी तौर पर जेडीयू के सांसद हैं हरिवंश
बता दें कि हरिवंश जब 2018 में राज्यसभा के उसभापति चुने गए थे, जब उनकी पार्टी जेडीयू सत्ताधारी बीजेपी गठबंधन में शामिल था। लेकिन, पिछले साल अगस्त में नीतीश की पार्टी एनडीए से अलग हो गई, लेकिन हरिवंश अपने पद पर बने रहे। इसको लेकर जदयू के भीतर कई बार चर्चाएं हो चुकी हैं। उनकी राजनीतिक नैतिकता को लेकर तंज भी कसे गए हैं।

वोटिंग का हिस्सा बनने पर विचित्र स्थिति पैदा हो सकती थी
अगर वोटिंग के दौरान राज्यसभा सभापति जगदीप धनकड़ सदन का संचालन कर रहे होते तो हरिवंश के सामने विचित्र स्थिति पैदा हो सकती थी। वह मतदान के दौरान बिल के विरोध में वोट डालते या मतदान से अनुपस्थित रहते, तब शायद ऐसा पहली बार होता कि एक पीठासीन पदाधिकारी सदन की सदस्यता से अयोग्यता की चपेट में आ सकता था।

उपसभापति ने जिन परिस्थितियों में मतदान के समय सदन का संचालन किया, वह एक दिलचस्प संयोग है। इस विधेयक पर देर तक चली गरमागरम बहस के दौरान खुद सभापति जगदीप धनकड़ सदन का संचालन कर रहे थे। जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विधेयक के समर्थन में अपना पक्ष पूरा किया, तो धनकड़ ने सदन से जाने का फैसला किया। अगर सभापति आगे की प्रक्रिया के लिए भी मौजूद रहते तो शायद हरिवंश के सामने अजीब स्थिति पैदा हो सकती थी।

2008 में सामने आया था एक विवाद
इस तरह का एक विवाद 2008 में भी सामने आ चुका है। तब सीपीएम के दिवगंत नेता सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के स्पीकर थे। उस समय अमेरिका के साथ परमाणु संधि पर उनकी पार्टी ने सत्ताधारी यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। लेकिन, उन्होंने स्पीकर पद नहीं छोड़ा। बाद में बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आया।

सोमनाथ चटर्जी को पार्टी ने बाहर कर दिया था
चटर्जी ने इस प्रस्ताव पर पार्टी लाइन मानने से इनकार कर दिया था। हालांकि, तब सीपीएम ने व्हिप जारी नहीं किया था। लेकिन, पार्टी की बात नहीं मानने के चलते सीपीएम ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।

राज्यसभा सचिवालय के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के मुताबिक पहले कांग्रेस जब लंबे समय तक केंद्र में सत्ता में थी, तब एक यह परंपरा सी बन गई थी कि संवैधानिक पदों को पार्टी व्हिप के दायरे से अलग रखा जाता था। उन्होंने यह भी दावा किया कि संसदीय रिकॉर्ड से लगता है कि यह पहला मामला है, जब संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति के लिए पार्टी व्हिप जारी करने की घटना हुई हो।

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