राजीव गांधी हत्याकांड के तीनों दोषियों को भारत ने किया आजाद, रिहाई के 2 साल बाद श्रीलंका लौटे

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी ठहराए गए 3 लोगों को भारत ने आजाद कर दिया है। रिहा किए गए तीनों दोषी मुरुगन उर्फ श्रीहरन, जयकुमार और रॉबर्ट पायस बुधवार को श्रीलंका लौट गए हैं। ये सभी उन 6 लोगों में से हैं जिन्हें 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने रिहा कर दिया था।

रिहाई के बाद इन्हें तिरुचिरापल्ली के स्पेशल कैंप में रखा गया था। वे मंगलवार की रात में चेन्नई पहुंचे और आज सुबह कोलंबो के लिए रवाना हुए। इससे पहले श्रीलंकाई उच्चायोग ने उनकी घर वापसी के लिए यात्रा दस्तावेज जारी किया था।

Rajiv Gandhi assassination case

तमिलनाडु सरकार ने इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट को बताया था कि फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (एफआरआरओ) से डिपोर्टेशन के आदेश मिलने के बाद वे श्रीलंका लौट सकते हैं। इन्हें हाल ही में श्रीलंका ने पासपोर्ट प्रदान किए थे।

बता दें कि राजीव गांधी हत्या मामले में एक अन्य श्रीलंकाई नागरिक संथन की मौत हो गई थी। इसके अलावा जिन अन्य लोगों को राजीव गांधी हत्या मामले में रिहा किया गया था, वे पेरारिवलन, रविचंद्रन और नलिनी हैं। ये सभी भारतीय नागरिक हैं। नलिनी के पति का नाम मुरुगन उर्फ श्रीहरण है। नलिनी अपने पति मुरुगन को छोड़ने के लिए वह हवाई अड्डे तक आई थीं और काफी देर वहां बैठीं।

बता दें कि नलिनी समेत सभी 6 दोषियों को मौत की सजा हुई थी, लेकिन 3 दशक पहले नलिनी के गर्भवती की जानकारी होने पर राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से उनकी जान बच गई। इन सभी आरोपियों ने करीबन 30 साल जेल में समय बिताया। आपको बता दें कि नलिनी की बेटी ब्रिटेन में डॉक्टर है।

कैसे हुई थी राजीव गांधी की हत्या?

21 मई 1991 को एक चुनावी रैली के दौरान तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी। उन्हें एक महिला ने माला पहनाई थी, इसके बाद धमाका हो गया। इसमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी मारे गए थे। राजीव को माला पहनाने वाली महिला की पहचान धनु के तौर पर हुई थी।

इस हादसे में 18 लोगों की मौत हुई थी। पुलिस ने इस मामले में कुल 41 लोगों को आरोपी बनाया गया था। इसमें से 12 लोगों की मौत हो चुकी थी और तीन फरार हो गए थे। बाकी 26 पकड़े गए थे। इसमें श्रीलंकाई और भारतीय नागरिक थे। फरार आरोपियों में प्रभाकरण, पोट्टू ओम्मान और अकीला थे।

आरोपियों पर टाडा कानून के तहत कार्रवाई की गई। 7 साल तक चली कानूनी कार्यवाही के बाद 28 जनवरी 1998 को टाडा कोर्ट ने हजार पन्नों का फैसला सुनाया। इसमें सभी 26 आरोपियों को मौत की सजा सुनाई गई। साल 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे फैसले को ही पलट दिया। कोर्ट ने 19 दोषियों को रिहा कर दिया वहीं बाकी की सजा बरकरार रखी। हालांकि 2014 में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया।

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