इमरजेंसी की 50वीं बरसी: पत्रकार रजत शर्मा को याद आए जेल में बिताए 10 माह, DU में करते थे पढ़ाई
Rajat Sharma Emergency 1975 Jail Days: वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा ने इमरजेंसी की 50वीं बरसी पर 1975 की उस भयावह रात को याद करते हुए बताया कि कैसे 17 साल की उम्र में वे सत्ता की तानाशाही के खिलाफ खड़े हुए थे। उस वक्त दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रथम वर्ष के छात्र रहे रजत शर्मा को 10 माह जेल में बिताने पड़े थे।
रजत शर्मा ने बताया कि जयप्रकाश नारायण आंदोलन से वे और उनके कई साथी छात्र जुड़े थे, और उन्हें तब गिरफ्तार कर लिया गया जब देश की सत्ता पर आपातकाल के नाम पर पूरी तरह से सेंसरशिप और दमन थोप दिया गया।

रजत शर्मा ने कहा, "मुझे आज भी वो रात याद है जब इंदिरा गांधी ने सत्ता बचाने के लिए आपातकाल घोषित किया। उस वक्त देश के तमाम बड़े नेता जैसे जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, प्रकाश सिंह बादल, चौधरी चरण सिंह, राजनारायण, लालकृष्ण आडवाणी आदि गिरफ्तार कर लिए गए थे। उन्हें देश के अलग-अलग शहरों - अंबाला, रोहतक, बेंगलुरु आदि की जेलों में भेजा गया था।"
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उन्होंने बताया कि उस वक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) के अध्यक्ष अरुण जेटली थे, जो छात्र आंदोलन के अगुआ थे। पुलिस जब उन्हें पकड़ने उनके घर पहुंची, तो उनके पिता ने उनकी मदद की और वे यूनिवर्सिटी पहुंचे। वहां से छात्रों ने "तानाशाही मुर्दाबाद" और "हमारे नेताओं को रिहा करो" के नारे लगाते हुए जुलूस निकाला।
"हम सब जान गए थे कि अब हम भी गिरफ्तारी के निशाने पर हैं। अरुण जेटली को गिरफ्तार कर अंबाला जेल भेज दिया गया। मैं और विजय गोयल साथ थे। उस वक्त अखबारों पर सेंसरशिप लागू हो गई थी और हमें पता चला कि कल से कोई खबर छपकर नहीं आएगी। तब हमें BBC से पता चला कि देश में आपातकाल लागू हो चुका है।"
शर्मा ने बताया कि पुलिस उन्हें भी ढूंढ़ रही थी। ऐसे हालात में उन्होंने और विजय गोयल ने तय किया कि वे एक भूमिगत अखबार निकालेंगे। इसका नाम रखा गया 'मशाल'। "हम लोग उस अखबार को साइक्लोस्टाइल करके लिखते थे, जिसमें लिखा होता था कि हमारे नेता जेल में हैं, और फिर हम वो अखबार चुपचाप लोगों के घरों में डाल आते थे।"
25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की सिफारिश पर देश में आपातकाल (Emergency) घोषित किया था। इसकी वजह के तौर पर आंतरिक अशांति बताई गई थी, लेकिन असल में इसका मकसद सत्ता विरोधियों को कुचलना था।
भारत में आपातकाल के दौरान देश में नागरिक स्वतंत्रताओं पर रोक लग गई, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई। हजारों राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। यह दौर करीब 21 महीनों तक, यानी मार्च 1977 तक चला।
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसने यह साबित किया कि जब सत्ता बेलगाम हो जाती है, तो सबसे पहला निशाना बोलने और सोचने की आज़ादी बनती है।












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