राजस्थान: क्या बसपा के विधायक करेंगे कांग्रेस के ख़िलाफ़ वोटिंग

राजस्थान में जारी उठापटक के बीच बहुजन समाज पार्टी के व्हिप ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है.
एक तरफ विधानसभा सत्र बुलाने के लिए राजस्थान सरकार और राज्यपाल के बीच विवाद है, तो दूसरी तरफ बसपा ने व्हिप ज़ारी कर अपने विधायकों को संभावित विश्वासमत प्रस्ताव की स्थिति में कांग्रेस के ख़िलाफ वोट देने का आदेश दिया है.
राजस्थान सरकार के प्रस्ताव पर राज्यपाल ने तीन शर्तों के साथ विधानसभा सत्र बुलाने की सहमति दे दी है. चर्चा है कि इस सत्र के दौरान विश्वासमत प्रस्ताव पेश किया जा सकता है.
ऐसे में सचिन पायलट के विद्रोह और अब बसपा के छह विधायकों पर मंडराते संकट के चलते गहलोत सरकार के लिए नई चुनौती पैदा हो गई है.
बसपा के इस व्हिप ने कई क़ानूनी सवाल खड़े दिए हैं और दोनों पार्टियां अपने-अपने तर्क दे रही हैं. कांग्रेस का कहना है कि कांग्रेस में विलय होने के बाद ये विधायक कांग्रेस के हैं इसलिए बसपा उनके लिए व्हिप ज़ारी नहीं कर सकती.
जबकि बसपा का तर्क है कि दल-बदल क़ानून (10वीं अनुसूची) के पैरा 4 के अनुसार राष्ट्रीय पार्टी जब तक विलय नहीं करती तब तक राज्य इकाई विलय नहीं कर सकती.
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ये मामला इसलिए इतना पेचीदा बन गया है क्योंकि 2019 में राजस्थान में बसपा के छह विधायकों ने कांग्रेस में विलय कर लिया था. विधानसभा चुनाव में बसपा के छह उम्मीदवार जीते थे- संदीप यादव, वाजिब अली, दीपचंद खेरिया, लखन मीणा, जोग्रेंद्र अवाना और राजेंद्र गुधा.
लेकिन, सभी छह विधायकों ने सितंबर 2019 में कांग्रेस में एक समूह के रूप में विलय कर लिया. विधानसभा स्पीकर ने उनकी विलय की अर्जी पर आदेश दिया था कि इन छह विधायकों से कांग्रेस के सदस्य की तरह व्यवहार किया जाए.
अब बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीष चंद्र मिश्र ने व्हिप ज़ारी कर छह विधायकों को कांग्रेस के ख़िलाफ़ वोट देने का आदेश दिया है.
व्हिप में कहा गया है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा चार के तहत पूरे देश में हर जगह समूची पार्टी (बसपा) का विलय हुए बगैर राज्य स्तर पर विलय नहीं हो सकता है. बसपा एक राष्ट्रीय पार्टी है इसलिए राज्य इकाई अकेले किसी अन्य पार्टी में विलय नहीं कर सकती.
बसपा के मुताबिक विधायक ना तो पार्टी छोड़कर गए, ना ही अलग पार्टी बनाई बल्कि उन्होंने विलय किया है जो क़ानूनी रूप से ग़लत है.
अब सवाल है कि ये छह विधायक किस पार्टी के हैं और बसपा का व्हिप इन विधायकों के लिए कितना बाध्यकारी है.
क्या होता है व्हिप
व्हिप एक लिखित आदेश है कि पार्टी के सदस्य एक महत्वपूर्ण वोट के लिए उपस्थित हों, या वे केवल एक विशेष तरीके से मतदान करें. भारत में सभी पार्टियां अपने सदस्यों को व्हिप जारी कर सकती हैं.
पार्टियां व्हिप जारी करने के लिए अपने सदन के सदस्यों में से एक वरिष्ठ सदस्य की नियुक्ति करती हैं. इस सदस्य को मुख्य व्हिप कहा जाता है. व्हिप का उल्लंघन करने वाले सदस्य अयोग्य घोषित किए जा सकते हैं. लेकिन ऐसे सदस्यों का वोट गिना जाता है.
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क्या लागू होगा बसपा का व्हिप
इस संबंध में राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश शिव कुमार शर्मा कहते हैं, ''पहले तो ये समझना ज़रूरी है कि ये मामला दल-बदल क़ानून के तहत नहीं आता. अगर किसी भी दल के दो-तिहाई सदस्य दूसरे दल में विलय करना चाहते हैं तो दसवीं अनुसूची उन्हें अधिकार देती है. राजस्थान में तो सभी सदस्यों ने ही विलय कर लिया था. स्पीकर ने उन्हें विलय की अनुमति भी दे दी थी.''
''लेकिन, फिर भी बसपा इन विधायकों के विलय को लेकर स्पीकर के फैसले को चुनौती दे सकती है. ऐसे में बसपा के लिए बेहतर होता कि वो व्हिप ज़ारी करने के बजाए विलय के फैसले को चुनौती देती. ''
शिव कुमार शर्मा ने बताया कि व्हिप में सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्णयों का हवाला दिया गया है. एक 2006 का जगजीत सिंह बनाम हरियाणा राज्य और दूसरा 2007 का राजेंद्र सिंह राणा मामला. मैंने उन दोनों फैसलों को अच्छी तरह से पड़ा. वो मामले अलग थे. उनमें दो-तिहाई सदस्यों की बात भी नहीं थी.
वह कहते हैं कि उन मामलों में स्पीकर के निर्णयों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. यहां स्पीकर के निर्णय को चुनौती नहीं दी गई और ना ही कोई आपत्ति जताई गई. इसलिए इस परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट के पिछले दो निर्णय लागू नहीं होते हैं.
बसपा ने विलय के समय इस पर कोई क़ानूनी आपत्ति नहीं जताई थी. हालांकि, राज्य सभा चुनावों के दौरान भी बसपा ने निर्वाचन आयोग से संपर्क किया था कि इन विधायकों को बसपा का माना जाए लेकिन तब आयोग ने ये कहते हुए दख़ल देने से इनकार कर दिया था कि यह विषय विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है.
अगर व्हिप ज़ारी करने के बावजूद भी छह विधायक कांग्रेस के पक्ष में वोट देते हैं तो भी बसपा के पास क्या विकल्प हैं. इस पर शिव कुमार शर्मा ने बताया कि व्हिप के उल्लंघन के बावजूद भी सदस्यों का वोट गिना जाता है. हालांकि, विधायकों की अयोग्यता की कार्रवाई शुरू की जा सकती है. इसमें भी बसपा विधानसभा स्पीकर से ही अपील कर सकती है.
कोर्ट जा सकती है बसपा
संविधान विशेषज्ञ फैज़ान मुस्तफा कहते हैं कि दल-बदल विरोधी क़ानून संसद और विधानसभा के सदस्यों के दल-बदल को रोकने के लिए बना है. लेकिन 10वीं अनुसूची के पैरा 1 में दी गई शब्दों की परिभाषाओं के मुताबिक उनका संदर्भ स्थानीय है, राष्ट्रीय नहीं है.
वह कहते हैं, "गोवा में कांग्रेस के 15 में से 10 विधायक बीजेपी में शामिल हो गए और उसको विलय माना गया. तेलंगाना में ही कांग्रेस के विधायक टीआरएस में शामिल हो गए. उसे विलय माना गया. उस समय ये मसला क्यों नहीं उठा कि कांग्रेस के देशभर में जितने विधायक हैं उनके आधार पर देखा जाए. विधायक दल का विलय होता है इसलिए उसे स्थानीय स्तर पर देखा जाएगा.''
''दल-बदल विरोधी क़ानून में उस सदन में मौजूद पार्टी के सदस्यों की संख्या देखी जाती है. इसमें लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तीनों शामिल हैं. बसपा जो बात कह रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर विधायक देखें जाएंगे तो ये सही नहीं है.''
फैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि बसपा इस वक़्त बीजेपी को सहयोग देने के लिए ये मसला उठा रही है. बसपा अपने विधायकों के विलय के चलते भी कांग्रेस से नाराज़ रही है. बसपा के पास इस मामले को लेकर कोर्ट जाने का विकल्प है और हो सकता है कि कोर्ट विलय पूर्व की स्थिति को बनाए रखते हुए इस मामले पर समय ले ले.
क्या कहते हैं आंकड़े

200 सदस्यों वाली राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के इस वक़्त 107 विधायक हैं. जिनमें छह विधायक वो हैं जो बसपा से आए हैं. अगर ये विधायक कांग्रेस के पक्ष में मतदान नहीं देते हैं तो कांग्रेस के पास 101 विधायक ही रह जाएंगे.
पार्टी से विद्रोह कर चुके सचिन पायलट पहले ही 18 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं. ऐसे में बसपा के व्हिप ने कांग्रेस में हलचल पैदा कर दी है.
वहीं, इस संबंध में बीजेपी विधायक मदन दिलावर ने बसपा के विधायकों के कांग्रेस में विलय के ख़िलाफ़ हार्ई कोर्ट में याचिका दायर की थी. बसपा ने भी इस याचिका में पार्टी बनने के लिए याचिका दायर की थी. लेकिन, कोर्ट ने मदन दिलावर की याचिका को ख़ारिज कर दिया. हालांकि, बसपा ने अलग से रिट याचिका दायर करने का विकल्प भी खुला रखा है.












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