नज़रिया: पत्रिका की ‘क्रांति’ क्या केवल दिखावा है?

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राजस्थान पत्रिका के संपादक और मालिक गुलाब कोठारी ने घोषणा कर दी है कि उनका अख़बार मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनसे जुड़ी ख़बरों का बहिष्कार करेगा. उनका ये ऐलान राजनीतिक एवं मीडिया दोनों ही हलकों में ज़बर्दस्त गर्मी पैदा कर दी है.

पत्रिका के इस फ़ैसले की आम तौर पर तारीफ़ हो रही है. ऐसे समय जब मीडिया सरकार के सामने दंडवत है, किसी मीडिया संस्थान का ऐसे तेवर अपनाना तारीफ़ के काबिल तो है ही. उसने मुद्दा भी ऐसा उठाया है जिसका सीधा संबंध मीडिया की स्वतंत्रता और लोकतंत्र से है.

वसुंधरा सरकार अफ़सरों और जजों को बचाने के लिए जो काला बिल पास करवाना चाहती थी, उस पर राजस्थान ही नहीं पूरे देशभर में विरोध का वातावरण बन गया था. इसी दबाव का नतीजा था कि उसने उसे पारित करवाने की कोशिश करने के बजाय प्रवर समिति के पास भेज दिया.

आभास ये दिया गया कि सरकार ने क़दम पीछे खींच लिए हैं और बिल को ठंडे बस्ते में चला गया है. लेकिन गुलाब कोठारी ने पहले पन्ने पर संपादकीय लिखकर इसे सरकारी पैंतरेबाज़ी बताया और ये भी कहा कि प्रदेश में इस कानून के बिना भी मीडिया पर हर तरह की सख़्ती बरती जा रही है.

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पीएम के ख़िलाफ़ भी मोर्चा खोला

उसने वसुंधरा राज को हिटलरशाही करार देते हुए सीधी लड़ाई का बिगुल फूँक दिया है. मीडिया बिरादरी उनके इस आकलन से सहमत नज़र आती है.

वैसे कोठारी की ये जंग राज्य सरकार तक ही सीमित नहीं है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर भी निशाना साधा है. कुछ समय पहले मुंबई में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि सरकार मीडिया हाउस को शार्ट लिस्ट करके जनता तक झूठी बात पहुंचा रही है.

उनके मुताबिक झूठ को सच बताकर जनता को दिग्भ्रमित किया जा रहा है. ये माना जा रहा है कि एक झूठ को सौ बार दोहराकर उसे सच साबित किया जा सकता है. उन्होंने किसानों की आत्महत्याओं और नोटबंदी के सवाल पर भी सरकार पर प्रहार किए थे.

वर्तमान राजनीतिक माहौल में ऐसी सरकार विरोधी मुद्रा अपनाना एक तरह का दुस्साहस भी माना जा रहा है. ये न केवल वसुंधरा सरकार के बल्कि केंद्र की सरकार और बीजेपी के ख़िलाफ़ भी ऐलान-ए-जंग जैसा है और इसके बहुत ही घातक परिणाम उसे झेलने पड़ सकते हैं.

वसुंधरा राजे सिंधिया
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संघ-बीजेपी से पुराना नाता

लेकिन जहां कोठारी और उनका अख़बार सरकार के ख़िलाफ़ अभियान चला रहा है, वहीँ उनकी मंशा पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. दुनिया जानती है कि उनका बीजेपी और संघ से पुराना अनुराग रहा है. वे हिंदुत्व की पैरोकारी करते रहे हैं और आरक्षण के भी विरोधी हैं.

सवाल उठ रहा है कि अचानक उनकी अपनों से ही क्यों ठन गई. पूछा जा रहा है कि कहीं उनकी ये आक्रामकता इसलिए तो नहीं कि उनके सरकारी विज्ञापन लगभग बंद कर दिए गए? उनके वकील अभिषेक सिंघवी ने उनके केस की पैरवी करते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि एक ही साल में अख़बार को मिलने वाले विज्ञापन चौंतीस फ़ीसदी से घटाकर डेढ़ फ़ीसदी कर दिए गए.

राजस्थान सरकार ने तो विज्ञापन बंद किए ही, केंद्र की ओर से मिलने वाले विज्ञापनों पर भी रोक लगा दी गई. इससे अख़बार की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गई. ज़ाहिर है कोई भी उद्योगपति जब इस स्थिति में पहुँचता है तो उसके सामने मरने या मारने की नौबत आ जाती है. यानी कोठारी की क्रांतिकारिता गिर पड़े तो हर हर गंगे वाली भी हो सकती है.

लेकिन इसके पहले सवाल ये उठता है कि जब दोनों एक ही घराने के हैं तो अलग-अलग राग क्यों अलापने लगे. इसके भी कई कारण गिनाए जा रहे हैं. गौशालाओं में गायों की मौत के बाद राजस्थान पत्रिका द्वारा चलाया गया अभियान उसमें से एक है. इससे वसुंधरा सरकार की बहुत किरकिरी हुई थी.

केसरगढ़ की प्रॉपर्टी का मामला भी एक वजह बताया जा रहा है. इसके अलावा पत्रकारों के वेतनमान के लिए मजीठिया की सिफारिशों को लागू न किए जाने पर पत्रिका में विरोध के स्वर उठे थे. उस समय वसुंधरा द्वारा उसका इस्तेमाल भी टकराव की वजह मानी जाती है.

वैसे भी वसुंधरा का मिजाज़ सामंती किस्म का है और उन्हें आलोचना बर्दाश्त नहीं होती इसलिए उनका पत्रिका के पीछे पड़ना कोई हैरतनाक़ बात तो नहीं ही है. मीडिया को नाथने के लिए जो बिल वे ला रही थीं, वह इसका ज़िंदा सबूत है.

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जारी रहेंगे कड़े तेवर?

किसी अख़बार के विज्ञापन बंद करके उसे अपने अनुकूल बनाने की जुगत नई नहीं है, मगर इस समय इसे राज्य और केंद्र की सरकारें बड़ी निर्लज्जता के साथ आज़मा रही हैं. बीजेपी शासित राज्यों में ये प्रवृत्ति ख़ास तौर पर देखी जा रही है. ये अलोकतांत्रिक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला भी, क्योंकि ये एक तरह से मीडिया को कमज़ोर करके उसे अपना काम करने से रोकना है.

लेकिन क्या किसी मुख्यमंत्री या सरकार की ख़बरों को रोकना लोकतांत्रिक माना जा सकता है? ये तो एक तरह से जनता को सूचनाओं से वंचित करना हुआ. पत्रिका अपनी लड़ाई वसुंधरा सरकार की कार्यशैली एवं नीतियों में कमियों को और भी बेबाकी से उजागर करते हुए लड़ सकता है मगर उसने ऐसा नहीं किया, क्यों?

वैसे लोगों को ये आशंका भी है कि अगर बीच-बचाव हुआ और विज्ञापन बहाल हो गए तो पत्रिका के वर्तमान तेवर बने रहेंगे या वह भी अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी अख़बार की ही तरह सरकार के महिमामंडन में जुट जाएगा? आमतौर पर आँखें दिखाने का खेल इसी तरह की सौदेबाज़ी पर जाकर ख़त्म होता है.

इस सबके बावजूद पत्रिका का जुझारू रूप मीडिया के उन हिस्सों के लिए ख़ुराक़ का काम भी कर रहा है जो सरकारी दबाव की वजह से घुटन महसूस कर रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि ये चिंगारी आगे चलकर आग बन सकती है और सरकार के लौह पंजे उससे झुलस सकते हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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