राहुल गांधी के 'करीबी' ने ही उठाए कांग्रेस अध्यक्ष की चयन प्रक्रिया पर सवाल

नई दिल्ली- राहुल गांधी की जगह नए कांग्रेस अध्यक्ष की तलाश में हो रही देरी पर तो सवाल उठ ही रहे थे, अब इसके लिए अपनाई जा रही चयन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि यह सवाल कोई और नहीं उठा रहा है, बल्कि एक ऐसे नेता ने उठाया है, जिसे राहुल गांधी खुद टैलेंट हंट के जरिए 'खोज' कर लाए थे। राहुल गांधी के जिस 'करीबी' नेता सचिन राव ने चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल किए हैं, उसे राहुल गांधी ने ही कांग्रेस वर्किंग कमिटी में परमानेंट इंवाइटी का दर्जा दिया था। जानकारी के मुताबिक उन्होंने ही अब सभी सीडब्ल्यूसी सदस्यों को खत लिखकर एक बैठक बुलाने की मांग की है, ताकि अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया को औपचारिक और पारदर्शी स्वरूप दिया जा सके। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि सचिन राव की चिट्ठी में जो सवाल उठाए गए हैं, उसके मायने क्या हैं?

राहुल की 'खोज' को पारदर्शिता पर शक

राहुल की 'खोज' को पारदर्शिता पर शक

इकोनॉमिक टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से जो खबर दी है उसके मुताबिक सचिन राव ने अपनी चिट्ठी में सीडब्ल्यूसी सदस्यों को लिखा है कि मौजूदा समय में कांग्रेस अध्यक्ष को चुनने को लेकर जो प्रक्रिया चल रही है उसका सिर्फ 'अंदाजा' भर लगाया जा सकता है, क्योंकि उन्हें इसके बारे में कुछ पता नहीं चल पा रहा है। इस स्थिति के कारण राव काफी नाराज हैं और उनकी शिकायत है कि उन्हें लूप में क्यों नहीं रखा जा रहा है।

राहुल की टीम के रहे 'रणनीतिक सलाहकार'

राहुल की टीम के रहे 'रणनीतिक सलाहकार'

सचिन राव की तकलीफ को इससे महसूस किया जा सकता है कि राहुल गांधी ने न केवल उन्हें सीडब्ल्यूसी का स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया था, बल्कि उन्हें एआईसीसी में 'ट्रेनिंग' और पार्टी के मुखपत्र 'संदेश' का इंचार्ज भी बनाया था। इस हैसियत से राहुल ने उन्हें अपनी जगह पार्टी में कुछ महत्वपूर्ण 'प्रयोग' करने की भी खुली छूट दी थी। यही नहीं जब राहुल ने राव को इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी, तब पार्टी की वेबसाइट पर उन्हें राहुल गांधी की टीम का 'रणनीतिक सलाहकार' बताया गया था। इसी वेबसाइट में राव के बारे में जानकारी दी गई थी कि वे मिशिगन बिजनेस स्कूल से कॉर्पोरेट स्ट्रैटजी और इंटरनेशनल बिजनेस में एमबीए हैं। मतलब, राहुल ने उनके इसी टैलेंट से प्रभावित होकर अपना 'करीबी' नेता चुना था और पार्टी की टॉप जिम्मेदारियों से नवाजा था। लेकिन, आज जब राहुल की जगह नए अध्यक्ष की तलाश हो रही है, तो उन्हें अंधेरे में क्यों रखा जा रहा है।

राहुल के 'करीबी' के सवालों के पीछे कौन?

राहुल के 'करीबी' के सवालों के पीछे कौन?

कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं के मन में अब यह सवाल उठ रहे हैं कि सचिन राव ने जो सवाल उठाए हैं, वह उनके मन में खुद से अचानक पैदा हुए हैं या कुछ 'बड़े नेता' उनके कंधे पर रखकर बंदूक चला रहे हैं? क्योंकि, उन्होंने ऐसे समय में चिट्ठी लिखी है, जब कुछ बड़े नेता सीडब्ल्यूसी सदस्यों को नए कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अपने निजी पसंदों की सलाह देने में जुटे हैं। खास बात ये है कि इसी दौरान राहुल ब्रिगेड के तौर पर पहचाने वाले कुछ युवा नेताओं के सुर भी बदलते दिख रहे हैं। मसलन, बताया जा रहा है कि जो युवा नेता कुछ समय पहले तक राहुल से इस्तीफा नहीं देने और वरिष्ठ नेताओं की छुट्टी कर देने पर जोर दे रहे थे, अब नए अध्यक्ष के नाम पर सीडब्ल्यूसी सदस्यों (वरिष्ठों) की राय लेने वाली 'सर्च टीम' के हिस्सा (रणदीप सुरजेवाला और दीपेंद्र हूडा) बन चुके हैं। ऐसा ही एक नाम आरपीएन सिंह का भी है, जो पहले युवाओं को कमान सौंपने की वकालत करते नहीं थकते थे, अब महाराष्ट्र के एक दलित नेता की उम्मीदवारी को संभव बनाने की कोशिशों में लगे दिख रहे हैं। माना जा रहा है कि ये युवा नेता (जो राहुल गांधी के करीबी रहे हैं) पार्टी में अपने भविष्य की अनिश्चितता से परेशान हैं, इसलिए अनौपचारिक तौर पर बीच-बीच में प्रियंका गांधी का नाम भी उछाल रहे हैं।

कहां फंस गई है कांग्रेस?

कहां फंस गई है कांग्रेस?

कांग्रेस में जो अनिश्चितता की स्थिति पैदा हुई है, उसके कुछ कारण ज्यादा गंभीर हैं। पहला तो ये कि इस्तीफा देने के बाद राहुल गांधी ने खुद को अपने उत्तराधिकारी की चयन प्रक्रिया से भी अलग (औपचारिक तौर पर) कर लिया है। गौरतलब है कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी भी ये सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि राहुल को अगर पद छोड़ना ही था, तो उन्हें नए अध्यक्ष का नाम तय करने के लिए एक औपचारिक प्रक्रिया तय कर देना चाहिए था, जो कि उन्होंने नहीं किया। दूसरा, एके एंटनी और अंबिका सोनी जैसे वरिष्ठ कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य भी नए अध्यक्ष की तलाशी अभियान से खुद को अलग कर चुके हैं। यही वजह है कि कांग्रेसी इस समय खुद को 'नेतृत्वहीन' महसूस कर रहे हैं, जिस पर शशि थरूर जैसे सांसद भी चिंता जता चुके हैं।

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