राहुल पर कांग्रेस की यह चूक उसे भारी पड़ सकती है

गया।
कांग्रेस का हाल पानीपत की लड़ाई जैसा
कांग्रेस में आज जो माहौल है, आप उसकी तुलना 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई, जो मराठों और अब्दाली के बीच लड़ी गई, से कर सकते हैं। 1761 में हुई इस जंग में मराठों की सेना बड़ी थी, संसाधन भी ज्यादा थे। लेकिन जब सेना कुरुक्षेत्र में जाकर फंस गई तो उसके सेनापति संभावित हार के खिलाफ रणनीति बनाने में इतने दिन तक उलझे रहे कि सेना भूख प्यास से मरने लगी तब उन्होंने लडऩे का फैसला किया।
लड़ाई पर जाते समय भी वह यह सोचकर निकले की हार जाएंगे, इसी सोच के चलते उन्होंने अपने साथ आई महिलाओं (राहुल गांधी) को सुरक्षित निकालने की योजना बनाई, उनकी इस योजनाओं से सेना में और बैचेनी फैल गई, अपनी से आधी सेना के सामने वह एक घंटे भी नहीं टिॅक सके और इतिहास में मराठों की सबसे बड़ी हार हुई। आज मैं इस लड़ाई से कांग्रेस की तुलना इसलिए कर रहा हूं। क्योंकि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने पिछले दो साल निकाल दिए जब वह राहुल को पीएम बनाकर उनके वोटिंग की बात को बदल सकते थे।
राहुल गांधी का मजाक ना बन जाये
लेकिन उन्होंने राहुल को सामने न लाकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह हारी हुई लड़ाई को क्यों लड़े। जहां उनका संभावित सेनापति ही पलायन कर रहा हैं वहां कार्यकर्ताओं की सेना का क्या हाल होगा। क्या कोई आम कांग्रेसी कार्यकर्ता भाजपा के कार्यकर्ताओं के इस कटाक्ष को झेल पाएगा जब वो राहुल गांधी के भाग जाने पर उससे मजाक करेंगे। कांग्रेस के नेताओं की अक्ल को क्या हो गया हैं समझ में नहीं आता।
कांग्रेस ने की गलती?
कांग्रेस नहीं भी चाहेंगी तब भी लड़ाई राहुल और मोदी के बीच ही रहेगी। मैंने ऊपर कांग्रेस में इंदिरा युग के किसी कार्यकर्ता के न होने की बात इसलिए कही क्योंकि इंदिरा गांधी का युग होता तो इसका हल बड़ा आसान था। चार राज्यों की हार के बाद मनमोहनसिंह का इस्तीफा हो जाता राहुल गांधी प्रधानमंत्री नियुक्त होते, पाक से किसी बात पर तनातनी होती (ऐसा होना कोई मुश्किल काम नहीं है, अधिकारी ऐसी योजनाओं को बड़ी आसानी से अंजाम दे लेते हैं।) राहुल गांधी पाक को चेतावनी देते।
लोगों को लगता कि राहुल गरम खून हैं। पाक को कठोर चेतावनी के साथ राहुल कहते कि पाक याद रखे कि मैं इंदिरा गांधी का पोता हूं जिन्होने पाक दो फाड़ कर दिया था। सोचिए भाजपा की सोच पर यह कितना बड़ा हमला होता। भाजपा का तरफ जा रहा एक बड़ा तबका राहुल की तरफ देखने लगता। इसी तनातनी में राहुल की एक कठोर शासक और प्रशासक की छवि बन जाती और कांग्रेस हारी हुई बाजी फिर जीत जाती।
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